

असहनीय गर्मी अब सिर्फ मौसम की मार नहीं, बल्कि लाखों सड़क विक्रेताओं की आजीविका पर सीधी चोट बन चुकी है। इसका असर देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी दिख रहा है। 2025 की गर्मियों में आई भीषण हीटवेव ने इन मेहनतकश लोगों के सामने ऐसी चुनौतियां खड़ी कर दीं, जो पहले कभी इतनी गंभीर नहीं रहीं। अधिकांश सड़क विक्रेता असहनीय गर्मी में खुद को लाचार पा रहे हैं और यह भीषण गर्मी न सिर्फ उनसे उनका रोजगार छीन रही बल्कि इस दौरान वह जरूरी और बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित रहते हैं।
वूमेन इन इन्फोर्मल एमप्लॉयमेंट : ग्लोबलाइजिंग एंड ऑर्गेनाइजिंग (डब्ल्यूआईईजीओ) के एक सर्वे अध्ययन ने देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सड़क विक्रेताओं पर इस गर्मी के विनाशकारी प्रभावों का सर्वेक्षण और अध्ययन किया। इस रिपोर्ट को डब्ल्यूआईईजीओ में होम-बेस्ड वर्क सेक्टर की एक्सपर्ट और एशिया स्ट्रैटजी एक्सपर्ट शालिनी सिन्हा, शहरी मामलों के शोधकर्ता अरविंद उन्नी, संस्था की ऋतुराज पेगू और मार्सेला वाल्डिविया ने तैयार किया है।दो राउंड सर्वे में पाया गया कि दिल्ली की सड़क विक्रेताओं में पुरुषों की संख्या महिलाओं से अधिक है। साथ ही अधिकांश उत्तरदाता 36-55 वर्ष आयु वर्ग में थे। इसके बाद 26-35 वर्ष के विक्रेता आते हैं। युवा विक्रेता (25 वर्ष या उससे कम) और वृद्ध विक्रेता (55 वर्ष से ऊपर) नमूने का छोटा हिस्सा यानी 20 फीसदी थे। आयु वितरण यह संकेत करता है कि सड़क विक्रय मुख्य रूप से उन वयस्कों के लिए एक आजीविका है जो अपने कामकाजी जीवन के प्रमुख उम्र में होते हैं।
सर्वेक्षण के मुताबिक, दिल्ली में 25 से 54 वर्ष की आयु वाले 77 फीसदी विक्रेता हैं और नमूनों में महिलाओं और पुरुषों के बीच आयु में कम भिन्नता देखी गई।
ग्राहक गायब, घट जाते हैं कामकाजी घंटे और माल होता है खराब
शोध के मुताबिक, 2025 की हीटवेव के बाद किए गए सर्वेक्षण में 96 फीसदी सड़क विक्रेताओं ने बताया कि अत्यधिक गर्मी के कारण ग्राहकों की संख्या में भारी गिरावट आई। यह प्रभाव सभी लिंगों और बेचे जाने वाले सामान की श्रेणियों में एकसमान था। उपभोक्ता खुद गर्मी से बचने के लिए घरों में दुबक गए, जिससे सड़कों पर भीड़ कम हो गई। 90% विक्रेताओं ने अपने कामकाजी घंटों में कटौती की, क्योंकि बिना छांव के धूप में खड़े रहना असंभव हो गया। खासकर 72% विक्रेताओं को माल के नुकसान का सामना करना पड़ा, जैसे फल-सब्जी, तैयार भोजन वाले विक्रेताओं में यह दर 94% तक पहुंच गई, जबकि गैर-खाद्य सामान में 57% और सेवाओं में 41% रही। छांव न होने से समस्या और गंभीर हो जाती है, जिनके पास छांव नहीं था, उन्होंने कामकाजी घंटों में ज्यादा कमी की।
यह आय की हानि उन लोगों के लिए तब और दर्दनाक है, जो पहले से ही रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कम आय, बढ़ती परिचालन लागत (पानी, बिजली, छांव के लिए खर्च) और घरेलू खर्चों ने इन्हें और कमजोर कर दिया।
स्वास्थ्य बिगड़ा, कर्ज दोगुना
गर्मी ने सिर्फ कमाई नहीं छीनी, बल्कि स्वास्थ्य पर भी भारी असर डाला। सर्वेक्षण के दूसरे दौर में 79% विक्रेताओं (या उनके परिवार के सदस्यों) ने गर्मी से जुड़ी बीमारियों (जैसे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, थकान) के इलाज के लिए डॉक्टर से संपर्क किया। यह पहले सर्वे के दौर की तुलना में लगभग चार गुना ज्यादा था। वित्तीय बोझ इतना बढ़ा कि कर्ज लेने की दर दोगुनी हो गई। महिलाओं पर असर और गहरा पड़ा, उनमें कर्ज में 50 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई, जबकि पुरुषों में 40 प्रतिशत अंक रहा। महिलाएं अक्सर परिवार की जिम्मेदारियां ज्यादा उठाती हैं, जिससे गर्मी के दौरान बढ़ते खर्चों ने उन्हें ज्यादा कर्जदार बनाया।
पानी, शौचालय, छांव जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव
डब्ल्यूआईईजीओ की टीम ने दिल्ली के 17 प्रमुख बाजारों का मानचित्रण किया, जहां ज्यादातर विक्रेता फुटपाथों, सड़कों या सड़क किनारे काम करते हैं। चौंकाने वाली बात, किसी भी बाजार में नगरपालिका का पानी का पॉइंट नहीं था। विक्रेताओं को पानी खरीदना या घर से लाना पड़ता है, जिससे रोजाना 50 से 300 रुपये तक का अतिरिक्त खर्च होता है। कुछ मामलों में महीने में 6,000 रुपये से ज्यादा! शौचालय या तो अनुपस्थित थे या अपर्याप्त थे। और जहां थे, वहां शुल्क देना पड़ता था। महिलाओं के लिए अलग शौचालय बहुत कम थे। छांव और आश्रय की कमी तो आम बात थी। ये कमी सामान्य दिनों में भी स्वास्थ्य जोखिम पैदा करती हैं, लेकिन हीटवेव में ये जानलेवा साबित होती हैं।
उत्पीड़न और निष्कासन में इजाफा
सबसे दुखद पहलू यह रहा जब विक्रेता पहले से गर्मी से जूझ रहे थे, तब नगर निगम और पुलिस की ओर से उत्पीड़न और निष्कासन बढ़ गया। पहले सर्वेक्षण दौर में 40 फीसदी से ज्यादा ने उत्पीड़न की शिकायत की, लेकिन दूसरे दौर में यह 65 फीसदी तक पहुंच गया। निष्कासन की दर भी दोगुनी हो गई। कुछ इलाकों जैसे जहांगीरपुरी (92%), मयूर विहार (70%) और नरेला (67%) में यह बहुत ऊंची रही। पुरुष विक्रेताओं को ज्यादा निशाना बनाया गया, शायद उनकी ज्यादा दृश्यता के कारण।
चेतावनी प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा की कमी
प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां भी नाकाफी साबित हुईं। एक तिहाई से कम विक्रेताओं को समय पर गर्मी की चेतावनियां मिलीं। हालांकि सेवा जैसी संस्थाओं की मदद से महिला विक्रेताओं को पुरुषों से बेहतर पहुंच मिली। राशन कार्ड तो ज्यादातर के पास थे, लेकिन जलवायु-प्रेरित संकटों से निपटने के लिए ये लाभ अपर्याप्त हैं। चेतावनियां अक्सर स्थानीय भाषाओं में नहीं होतीं और हीट इंडेक्स के बजाय सिर्फ तापमान पर आधारित होती हैं।
नीति बदलाव की पुकार
यह शोध 2014 के सड़क विक्रेता कानून के प्रभावी कार्यान्वयन की मांग करता है। उत्पीड़न और निष्कासन जैसे दंडात्मक दृष्टिकोण को छोड़कर सहायक नीतियां अपनानी होंगी। पानी के पॉइंट, शौचालय, छांव और आश्रय जैसी बुनियादी सुविधाएं अब जरूरी नहीं, बल्कि जीवन-मरण का सवाल बन चुकी हैं। सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को बेहतर लक्षित करना होगा और नई जलवायु-अनुकूल पहल शुरू करनी होंगी।