

हैजा से मौतें बढ़ीं: 2025 में दुनिया के 47 देशों ने 4.51 लाख मामले और 7,870 मौतें दर्ज कीं, सबसे ज्यादा 1999 बाद।
अफ्रीका में गंभीर स्थिति: डब्ल्यूएचओ अफ्रीकी क्षेत्र में 2025 के दौरान हैजा के मामले 34 प्रतिशत और मौतें 58 प्रतिशत बढ़ीं।
सात देशों में भारी असर: अंगोला, बांग्लादेश, कांगो, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, सूडान और यमन में करीब 90 प्रतिशत मामले दर्ज हुए।
टीकों की उपलब्धता बढ़ी: हैजा के टीकों का वार्षिक उत्पादन 2022 के तीन करोड़ से बढ़कर 2025 में करीब आठ करोड़ खुराक पहुंचा।
मैनिंजाइटिस में राहत: अफ्रीकी मैनिंजाइटिस बेल्ट में 2025 में 21,526 संदिग्ध मामले दर्ज हुए, जबकि तुलनीय देशों में मामले 5.9 प्रतिशत घटे।
दुनिया में हैजा एक बार फिर बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनता दिख रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, साल 2025 में 47 देशों ने हैजा के 4 लाख 51 हजार 499 मामले और 7,870 मौतें दर्ज कीं। खास बात यह है कि रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या कम होने के बावजूद मौतों में करीब 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वर्ष 2025 में दर्ज मौतों की संख्या 1999 के बाद सबसे अधिक रही।
डब्ल्यूएचओ ने साफ किया है कि ये आंकड़े केवल उन मामलों पर आधारित हैं, जो देशों ने संगठन को बताए हैं। दुनिया में हैजा के वास्तविक मामले इससे कहीं ज्यादा हो सकते हैं, क्योंकि कई देशों और क्षेत्रों में मरीजों की जानकारी स्वास्थ्य व्यवस्था तक नहीं पहुंच पाती।
सात देशों में सबसे ज्यादा असर
हैजा का सबसे बड़ा असर कुछ ही देशों में देखने को मिला। अंगोला, बांग्लादेश, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, नाइजीरिया, दक्षिण सूडान, सूडान और यमन में दुनिया के करीब 90 प्रतिशत रिपोर्ट किए गए मामले और मौतें सामने आईं।
अफ्रीकी क्षेत्र की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक रही। साल 2024 की तुलना में 2025 में यहां हैजा के मामलों में 34 प्रतिशत और मौतों में 58 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इससे पता चलता है कि कई गरीब और कमजोर क्षेत्रों में साफ पानी, स्वच्छता और समय पर इलाज की सुविधा अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
समय पर इलाज मिले तो बच सकती है जान
हैजा एक गंभीर दस्त की बीमारी है, जो ‘विब्रियो कॉलेरी’ नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। दूषित पानी और भोजन इसके फैलने का मुख्य कारण हैं। जहां साफ पानी और शौचालय की सुविधा नहीं होती, वहां इसका खतरा ज्यादा रहता है।
हैजा के कारण शरीर में पानी और नमक की भारी कमी हो सकती है। अगर मरीज को समय पर पानी, नमक और जरूरी इलाज मिल जाए तो उसकी जान बचाई जा सकती है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज पाने वाले मरीजों में वैश्विक मृत्यु दर एक प्रतिशत से कम रही। लेकिन 2025 में 12 देशों में यह दर एक प्रतिशत से अधिक रही।
एक और चिंता की बात यह है कि हैजा से होने वाली पांच में से एक से ज्यादा मौतें स्वास्थ्य केंद्रों के बाहर हुईं। इसका मतलब है कि कई मरीज समय पर अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र तक नहीं पहुंच पाए।
टीकों की उपलब्धता बढ़ी
हैजा से बचाव के लिए टीके भी महत्वपूर्ण हथियार हैं। अच्छी खबर यह है कि पिछले कुछ वर्षों में हैजा के टीकों का उत्पादन काफी बढ़ा है। वर्ष 2022 में जहां हर साल करीब 3 करोड़ खुराक तैयार होती थीं, वहीं 2025 में यह संख्या बढ़कर करीब 8 करोड़ हो गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावित देशों के लिए टीकों की आपूर्ति भी बढ़ाई गई है। इसके साथ ही साफ पानी, बेहतर स्वच्छता, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था और बीमारी की निगरानी पर जोर दिया जा रहा है।
मैनिंजाइटिस के खिलाफ भी बढ़ी उम्मीद
डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में मैनिंजाइटिस की स्थिति का भी उल्लेख किया गया है। अफ्रीका के ‘मैनिंजाइटिस बेल्ट’ में 2025 में 26 में से 24 देशों ने 21,526 संदिग्ध मामले और 971 मौतें दर्ज कीं। हालांकि जिन देशों के आंकड़ों की पिछले वर्ष से तुलना की जा सकी, वहां मामलों में 5.9 प्रतिशत की कमी आई।
टीकाकरण से मैनिंजाइटिस के एक प्रमुख प्रकार, मेनिंगोकोकल ए, के मामलों में बड़ी गिरावट आई है। 2010 में टीका शुरू होने के बाद टीका लगाए गए लोगों में इस बीमारी के मामलों में 99 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की गई है।
प्लेग पर भी निगरानी जरूरी
डब्ल्यूएचओ ने प्लेग को लेकर भी सतर्क रहने की जरूरत बताई है। 2019 से 2025 के बीच 10 देशों ने इंसानों में प्लेग के संदिग्ध मामले बताए। इस दौरान 3,847 संदिग्ध मामले और 423 मौतें दर्ज हुईं। कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और मेडागास्कर में इसके सबसे ज्यादा मामले सामने आए।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि हैजा, मैनिंजाइटिस और प्लेग जैसी बीमारियों से निपटने के लिए केवल दवाओं और टीकों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। साफ पानी, बेहतर स्वच्छता, मजबूत निगरानी और समय पर इलाज की व्यवस्था भी जरूरी है। 2025 के आंकड़े बताते हैं कि बीमारी को रोकने के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं तक लोगों की पहुंच बढ़ाना अभी भी सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है।