क्या फाइब्रिनोजन कोरोना वायरस को रक्त वाहिकाओं तक पहुंचाता है?

फाइब्रिनोजन से वायरस को एंटीबॉडी से बचने में मदद मिलने की आशंका, नई परिकल्पना गंभीर कोविड में सूजन और खून के छोटे थक्कों को जोड़ती है
खून का यह प्रोटीन वायरस और रक्त वाहिकाओं के बीच पुल बन सकता है, जिससे सूजन बढ़ने की आशंका।
खून का यह प्रोटीन वायरस और रक्त वाहिकाओं के बीच पुल बन सकता है, जिससे सूजन बढ़ने की आशंका।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • फाइब्रिनोजन कोरोना वायरस को छिपाकर रक्त वाहिकाओं तक पहुंचाने में मदद कर सकता है, नई वैज्ञानिक परिकल्पना ने बढ़ाई चिंता।

  • खून का यह प्रोटीन वायरस और रक्त वाहिकाओं के बीच पुल बन सकता है, जिससे सूजन बढ़ने की आशंका।

  • कंप्यूटर अध्ययन में फाइब्रिनोजन की मौजूदगी से वायरस के कोशिकाओं से जुड़ने के तरीके में बदलाव के संकेत मिले।

  • लॉन्ग कोविड में पाए जाने वाले माइक्रोक्लॉट और फाइब्रिनोजन के बीच संबंध पर वैज्ञानिकों ने नई संभावना जताई है।

  • शोधकर्ताओं का कहना है कि इस संभावित तंत्र की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला और मरीजों पर आगे अध्ययन जरूरी है।

कोरोना वायरस संक्रमण को आमतौर पर सांस की बीमारी के रूप में देखा जाता है। लेकिन गंभीर कोविड-19 में रक्त वाहिकाओं को नुकसान, सूजन और छोटे-छोटे खून के थक्के बनने जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं। अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई परिकल्पना पेश की है, जो इन अलग-अलग समस्याओं को एक ही प्रक्रिया से जोड़ सकती है।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एट अर्लिंग्टन के एक शोध में बताया है कि खून में पाया जाने वाला प्रोटीन फाइब्रिनोजन कोरोना वायरस के लिए एक तरह के ‘पुल’ का काम कर सकता है। हालांकि यह अभी एक वैज्ञानिक परिकल्पना है और इसकी पुष्टि के लिए प्रयोगशाला तथा मरीजों पर आगे अध्ययन जरूरी है।

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खून का जरूरी प्रोटीन है फाइब्रिनोजन

फाइब्रिनोजन हमारे खून में बड़ी मात्रा में मौजूद एक प्रोटीन है। इसका सबसे जाना-पहचाना काम खून का थक्का बनाने में मदद करना है। जब शरीर में चोट लगती है तो फाइब्रिनोजन बदलकर फाइब्रिन बनता है और खून बहना रोकने में मदद करता है। यह शोध एसीएस फार्माकोलॉजी एंड ट्रांसलेशनल साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना संक्रमण के दौरान यही प्रोटीन एक अलग भूमिका भी निभा सकता है। उनके अनुसार, फाइब्रिनोजन कोरोना वायरस की सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन से जुड़ सकता है।

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वायरस को छिपाने में मिल सकती है मदद

कोरोना वायरस की सतह पर मौजूद स्पाइक प्रोटीन शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए एक प्रमुख पहचान संकेत है। इसी को देखकर एंटीबॉडी वायरस को पहचानने और उसे निष्क्रिय करने की कोशिश करती हैं।

शोधकर्ताओं का अनुमान है कि जब फाइब्रिनोजन स्पाइक प्रोटीन से जुड़ता है तो वह उसके कुछ हिस्सों को ढक सकता है। इससे एंटीबॉडी के लिए वायरस को पहचानना मुश्किल हो सकता है। यानी फाइब्रिनोजन वायरस के लिए एक तरह की ‘ढाल’ का काम कर सकता है। हालांकि, यह बात अभी प्रयोगों से साबित नहीं हुई है।

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रक्त वाहिकाओं तक पहुंचने का रास्ता

इस परिकल्पना का दूसरा हिस्सा ज्यादा महत्वपूर्ण है। फाइब्रिनोजन का एक हिस्सा, जिसे गामा चेन कहा जाता है, शरीर की कोशिकाओं पर मौजूद कुछ रिसेप्टर से जुड़ सकता है। इनमें रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत यानी एंडोथीलियल कोशिकाओं से जुड़े रिसेप्टर भी शामिल हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि फाइब्रिनोजन एक तरफ वायरस के स्पाइक से जुड़ सकता है और दूसरी तरफ रक्त वाहिका की कोशिका से। इस तरह वह वायरस को रक्त वाहिका की सतह के करीब ला सकता है। इसे आसान भाषा में समझें तो फाइब्रिनोजन एक ऐसे पुल की तरह काम कर सकता है, जिसके एक छोर पर वायरस और दूसरे छोर पर रक्त वाहिका की कोशिका हो।

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कंप्यूटर मॉडलिंग से मिला संकेत

शोधकर्ताओं ने इस संभावना को समझने के लिए कंप्यूटर आधारित आणविक डॉकिंग अध्ययन किया। इसमें उन्होंने देखा कि फाइब्रिनोजन की मौजूदगी में स्पाइक प्रोटीन और कुछ इंटीग्रिन रिसेप्टर के बीच संपर्क अधिक अनुकूल दिखाई देता है।

इसके विपरीत, फाइब्रिनोजन की मौजूदगी में स्पाइक और एसीई2 के बीच संपर्क कमजोर दिखाई दिया। एसीई2 वही प्रमुख रिसेप्टर है, जिसके जरिए कोरोना वायरस मानव कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए जाना जाता है।

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शोधकर्ताओं का अनुमान है कि फाइब्रिनोजन स्पाइक की संरचना में कुछ बदलाव कर सकता है और वायरस को एसीई2 के बजाय इंटीग्रिन जैसे रास्तों की ओर ले जा सकता है। लेकिन यह अभी कंप्यूटर मॉडल का परिणाम है, वास्तविक जैविक प्रक्रिया का प्रमाण नहीं।

माइक्रोक्लॉट से भी हो सकता है संबंध

गंभीर कोविड-19 और लंबे समय तक रहने वाले कोविड यानी लॉन्ग कोविड में छोटे रक्त-थक्कों या माइक्रोक्लॉट की भूमिका पर भी काफी शोध हुआ है। ऐसे थक्कों में फाइब्रिन से बने जाल मौजूद हो सकते हैं।

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खून का यह प्रोटीन वायरस और रक्त वाहिकाओं के बीच पुल बन सकता है, जिससे सूजन बढ़ने की आशंका।

नई परिकल्पना के अनुसार, यदि वायरस और फाइब्रिनोजन आपस में जुड़ते हैं तो फाइब्रिन से बने ये ढांचे वायरस को रक्त की छोटी वाहिकाओं के पास रोक सकते हैं। इससे स्थानीय सूजन और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है।

अभी कई सवाल बाकी

इस विचार को अभी प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता। यह जानना जरूरी होगा कि क्या फाइब्रिनोजन वास्तव में शरीर में वायरस से इसी तरह जुड़ता है, क्या इससे एंडोथीलियल कोशिकाओं में वायरस का प्रवेश बढ़ता है और क्या यह प्रक्रिया कोविड-19 या लॉन्ग कोविड के मरीजों में बीमारी की गंभीरता से जुड़ी है।

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यदि आगे के प्रयोग इस संबंध को साबित करते हैं, तो स्पाइक और फाइब्रिनोजन के बीच संपर्क को रोकना भविष्य में उपचार का एक नया रास्ता बन सकता है। साथ ही, इसी तरह की जैविक प्रक्रिया का इस्तेमाल भविष्य में दवाओं या आरएनए आधारित उपचारों को शरीर के खास हिस्सों तक पहुंचाने के लिए भी किया जा सकता है।

फिलहाल, वैज्ञानिकों के लिए अगला कदम इस दिलचस्प परिकल्पना को प्रयोगशाला और वास्तविक मरीजों में जांचना है। तभी यह स्पष्ट होगा कि फाइब्रिनोजन वास्तव में कोरोना वायरस का सिर्फ खून जमाने वाला साथी है या बीमारी को रक्त वाहिकाओं तक पहुंचाने वाला एक महत्वपूर्ण ‘पुल’ भी।

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