मत और अभिमत के मध्य महिला खेतिहरों के अधिकार
भारत में महिला खेतिहरों के वैधानिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों के अपने मिथक भी हैं, और अपने यथार्थ भी। यथार्थ में, स्वाधीनता के लगभग आठ दशक पूरे होते-होते 'महिलाओं के अधिकारों' के लिये तमाम राजनैतिक परियोजनायें बदल रहीं/गयीं - लेकिन महिलाओं और विशेष रूप से बहुसंख्यक ग्रामीण खेतिहर महिलाओं के लिये उनके भूमि अधिकारों के शेष प्रश्न, सामाजिक-राजनैतिक मिथकों के मध्य मौन ही रह गये।
अनुत्तरित राजनैतिक मौन की जड़ें उस (संसदीय) व्यवस्थापिका से उपजीं, जहां निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों का अनुपात, व्यवस्थागत रूप से अल्प और अक्षम बनाये रखा गया। भारत में, 73 वे संविधान संशोधन के बरक्स 24 अप्रैल 1993 से, पंचायतों में महिलाओं के लिये (न्यूनतम) 33 फीसदी आरक्षण निर्धारित करने की संवैधानिक व्यवस्था का अभिमत रखने वाले जागरूक सांसद - आखिर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के ‘समतुल्य राजनैतिक संख्याबल’ के लिये यह निर्णय क्यों नहीं कर पाये?
क्या यह, महिलाओं के लिये राजनैतिक विकेन्द्रीकरण और आनुपातिक प्रतिनिधित्व की हदें तय करने की हिमाकत थी? क्या यह महिलाओं के संसदीय प्रतिनिधित्व के प्रति राजनैतिक अवमानना थी? या यह महज, ऐतिहासिक राजनैतिक भूल थी? इसका सरल उत्तर है – नहीं, वास्तव में यह पुरुषप्रधान राजनैतिक तंत्र को बनाये रखने का सुनियोजित सफल प्रयास था/है।
संसद और विधानसभाओं में महिला निर्वाचितों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिये वही संवैधानिक अभिमत और वैधानिक प्रावधान क्यों नहीं होने चाहिये जो स्वयं संसद और विधानसभाओं ने, पंचायतों के लिये बनाया? सत्य यह है कि महिलाओं को 'नैतिक-राजनीति' से दूर रखने की यह साजिश, तथाकथित आधुनिक होते लोकतंत्र का स्थापित असफल अध्याय रहा है। जिसका समग्र परिणाम महिलाओं के अधिकारों के लिये बने आधे-अधूरे कानून और उन कानूनों का अपूर्ण क्रियान्वयन है। यहीं से महिलाओं के प्रति ऐतिहासिक अन्यायों की जड़ें जनमती हैं।
संसद में सितंबर 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2023) के तहत भारत की सभी ‘राज्य विधानसभाओं’ और ‘लोकसभा’ में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया।
इस कानून की व्यापकता के अंतर्गत, संसद और विधानसभाओं में महिला अधिकारों के लिये नये कानूनों को लाने और मौजूदा वैधानिक प्रावधानों को सक्षमता के साथ लागू करने हेतु 'निर्णायक संस्थागत अभिमत' की सम्भावनायें निहित हैं।
यह कानून 16 अप्रैल 2026 को आधिकारिक रूप से लागू हुआ, जिसे प्रक्रियागत रूप से परिसीमन के पश्चात प्रभावी तौर पर क्रियान्वित किया जाना है। किन्तु, परिसीमन की प्रक्रिया और परिणामों पर प्रश्न खड़े करते हुये संसद ने, ‘राजनैतिक प्रायश्चित’ का यह ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया।
वास्तव में यह प्रस्ताव, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के प्रभावी प्रतिनिधित्व के रास्ते महिलाओं के समग्र राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों की दिशा में निर्णायक प्रस्थान हो सकता था - जिसके पश्चात, महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने वाले विधानों के प्रभावी क्रियान्वयन और नये वैधानिक प्रावधानों के लिये बेहतर अवसर होते।
विश्व बैंक के जेंडर डाटा पोर्टल (2021) के अनुसार भारत में मात्र 9.5 फीसदी महिलाओं को भूमि अधिकार हासिल है। इक्कीसवीं सदी में आगे बढ़ते भारत में महिला खेतिहरों की दुर्दशा यह भी दर्शाती है कि, अभी ‘निर्णायक राजनैतिक पहल’ होना शेष है।
संसद और विधानसभाओं में महिला निर्वाचितों की निर्णायक आवाज और अभिमत, उस आधी आबादी के पूरे अधिकार का सबब हो सकता था/है, जिसे संपत्ति (और भूमि) के सांकेतिक संवैधानिक अधिकारों के बावजूद न्याय तो अब तक नहीं ही मिला।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) में महिलाओं और विशेष रूप से महिला खेतिहरों के अधिकारों के लिये 'निर्णायक आवाज और अभिमत' के ऐतिहासिक अवसर हैं, जो लगभग 90 वर्ष पुराने वैधानिक जड़ता को समाप्त कर सकते हैं।
भारत की राजनैतिक स्वाधीनता से पूर्व, वर्ष 1937 में 'हिन्दू महिला संपत्ति अधिकार अधिनियम' के मातहत, हिन्दू विधवाओं को अपने पति के संपत्ति में पुत्रों के समान हिस्सा (सीमित संपत्ति के रूप में) दिया गया, लेकिन बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं मिला।
स्वाधीनता के पश्चात भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव पर रोक) के माध्यम से, वैधानिक रूप से यह सुनिश्चित किया कि महिलाओं को संपत्ति रखने, उत्तराधिकार में संपत्ति पाने और उसे हस्तांतरित करने हेतु समान अधिकार हैं।
बाद के बरसों में 'हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम - 1956' की धारा-14 के अंतर्गत महिलाओं को उनकी संपत्ति पर पूर्ण स्वामित्व का अधिकार तो दिया, किन्तु बेटियों को पैतृक संपत्ति में ‘सहदायिक अथवा संयुक्त उत्तराधिकार’ अर्थात जन्म से अधिकार नहीं दिया गया।
इससे भी महत्वपूर्ण यह कि 'हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम - 1956' की धारा 4(2) में यह स्थापित किया गया था कि. कृषि से संबंधित राज्य कानूनों - (जो मूलतः औपनिवेशिक राजस्व कानून रहे हैं और पितृसत्ता को प्रमुखता देते रहे हैं) पर यह अधिनियम प्रभावी नहीं होगा।
गौरतलब है कि वर्ष 1956 में राज्यों के पुनर्गठन कानून और तत्संबंधी प्रशासनिक प्रक्रिया के बाद भारत के कई राज्यों में नये भू-राजस्व कानून/संहिता (लैंड रेवेन्यू लॉ/कोड) लागू की गईं। मुख्य रूप से, नये गठित या पुनर्गठित राज्यों में एक समान कानून लागू करने के लिए ये परिवर्तन किये गये।
इस दौरान वैधानिक शून्यता के भाव और राजनैतिक विमर्शों के अभाव के मध्य, किसी भी राज्य ने महिला खेतिहरों के अधिकारों को वैधानिक बना देने का प्रयास ही नहीं किया - और (औपनिवेशिक) भूमि राजस्व कानूनों के मातहत, पुरुष खेतिहरों के वर्चस्व को स्थापित करते हुये उन्हें 'भूमि स्वामी' होने का लगभग एकाधिकार दे दिया। कालांतर में, देश के बहुसंख्यक महिला खेतिहरों के लिये उनके भूमि अधिकार के अवसर, ऐतिहासिक अन्यायों के अटूट अध्यायों में दर्ज होते गये।
संसद द्वारा वर्ष 2005 में 'हिन्दू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम' के माध्यम से एक महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बराबर ‘सहदायिक अथवा संयुक्त उत्तराधिकार’ का दर्जा दे दिया। इस संशोधन ने, 1956 के कानून की लैंगिक असमानता को दूर किया।
बेटियों को बेटों के समान पैतृक संपत्ति में जन्मजात 'सहदायिक' अधिकार दिया गया, चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित। इस ऐतिहासिक संशोधन ने महिलाओं को ‘कृषि भूमि पर भी उत्तराधिकार का समान अधिकार’ प्रदान किया। लेकिन, इन अधिकारों के अनुरूप, राज्यों के भू-राजस्व कानूनों और संहिताओं में संशोधन अथवा सुधार के कोई प्रयास नहीं किये गये।
परिणामतः औपनिवेशिक भूमि कानूनों और उसे लागू करने वाले औपनिवेशिक तंत्र की यथास्थिति में कोई भी परिवर्तन नहीं आया और यह महत्वपूर्ण राजनैतिक प्रयोग भी, करोड़ों महिला खेतिहरों के लिये लगभग 'सांकेतिक अधिकार' ही साबित हुआ।
वर्ष 2005 में तत्कालीन योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में महज 8 प्रतिशत महिलाओं को भूमि अधिकार हासिल था, जो हिन्दू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम (2005) लागू होने के दो दशकों के बाद भी आज महज 8-14 प्रतिशत के चुनौतीपूर्ण आंकड़ों के मध्य कैद कर दिया गया। यह आंकड़े उस अर्धसत्य को उजागर करते हैं कि, कानून की किताबों में दर्ज वैधानिक न्याय और जमीनी अधिकारों की प्राप्ति के मध्य - राज्य तंत्र का ‘निर्णायक राजनैतिक अभिमत’ खड़ा होता है।
महिला खेतिहरों के अधिकारों को लेकर राज्यतंत्रों की विफलताओं को समझने के लिये अनेक पैमानों का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन, एक असहज सत्य यह है कि, भारत की संसद और विधानसभाओं में - महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से 'महिला कृषक हकदारी कानून' का निर्णायक प्रस्ताव आना और उसका स्वीकार किया जाना, भारत की स्वाधीनता के बाद भी 78 बरसों से शेष है।
गौरतलब है आज संसद अथवा किसी भी विधानसभाओं में निर्वाचित महिला विधायकों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व - राजनैतिक रूप से 'निर्णायक' स्थिति में नहीं है, जो ऐसे किसी भी नये वैधानिक कानून (जैसे महिला कृषक हकदारी कानून) को पारित करवाने के लिये पर्याप्त नहीं है जिससे करोड़ों महिला खेतिहरों को ऐतिहासिक न्याय और अधिकार मिल सके। भारत में निःसंदेह सही अर्थों में लैंगिक समानता के नये युग के लिये विधानसभा और संसद में यह निर्णायक अनुपातिक प्रतिनिधित्व (33 फीसदी) ऐतिहासिक होगा ही।
महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रणी देशों जैसे स्वीडन, नोर्वे और दक्षिण अफ्रीका में महिला सांसदों का अनुपात 45 प्रतिशत है इसके साथ ही फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड में महिला सांसदों का आनुपातिक प्रतिनिधित्व 35-38 प्रतिशत है।
भारत में यह अनुपात आज महज 15 प्रतिशत है। यही कारण है कि वर्ष 2011 में भारतरत्न डॉ स्वामीनाथन द्वारा 'महिला कृषक हकदारी' के लिये प्रस्तुत प्राइवेट मेंबर बिल को, न तो राजनैतिक दलों का समर्थन मिला और न ही निर्णायक महिला सांसदों का। विडंबना ही है कि यह आज भी यह संसद में चर्चा का विषय ही नहीं।
कुल मिलाकर, विधानसभाओं में भी निर्वाचित महिला विधायकों का राजनैतिक बहुमत, अभी 'अल्प और अधीन' है। यही कारण है कि आधी आबादी न केवल सामाजिक समानता बल्कि राजनैतिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से भी अब तक अपूर्ण है।
भारत के लोकसभा में 16 अप्रैल 2026 को प्रस्तुत 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023' संशोधन के माध्यम से लोकसभा और विधानसभाओं में न्यूनतम 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव और उसकी परिणीति, वास्तव में भारत में महिलाओं के प्रति हुये अन्यायों को दूर करने की दिशा में प्रथम ऐतिहासिक कदम हो सकता था।
जिसके बाद, कदाचित महिला खेतिहरों के लिये 'महिला कृषक हकदारी कानून' पारित होने का बेहतर राजनैतिक मार्ग तैयार होता। इस ऐतिहासिक अवसर को गंवाने का अर्थ 'पुरुषप्रधान राजनैतिक तंत्र' के अखंडित कालखंड में उन करोड़ों महिलाओं के प्रति उपेक्षा भी है, जिनके भी/ही मतों से चुनकर 'निर्वाचित' हुये जनप्रतिनिधि अपने नैतिक दायित्वों के प्रति अनभिज्ञ और राजनैतिक दायित्वों के प्रति अक्षम हैं।
जाहिर है, अपने अधिकारों के लिये प्रतीक्षारत आधी आबादी, इसकी कीमत चुकाने के लिये अभिशप्त है। भारत का संसद, इक्कीसवीं सदी के प्रस्तावित प्रगतिशील संसद में महिलाओं के आनुपातिक प्रतिनिधित्व के ऐतिहासिक अवसर को गंवा कर निश्चित ही राजनैतिक अन्याय कर चुका है। आइये आज हम सब मिलकर, लोकतंत्र के रास्ते और महिलाओं के वास्ते, अन्याय से बाहर आने का (राज)नैतिक मार्ग तलाशें।
लेखक रमेश शर्मा एकता परिषद के राष्ट्रीय समन्वयक हैं

