भारत के ई-वेस्ट प्रबंधन में गंभीर खामियां: टॉक्सिक लिंक की रिपोर्ट का खुलासा

नई रिपोर्ट “लॉन्ग रोड टू सर्कुलरिटी ” में भारत के ई-वेस्ट प्रबंधन के एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) ढांचे में गंभीर संरचनात्मक खामियों को दूर करने के लिए सुझाव दिए गए हैं
इलेक्ट्रॉनिक कचरा या ई-कचरा उन सभी विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और उनके हिस्सों से आता है जिन्हें बिना उपयोग के कचरे में फेंक दिया जाता है।
इलेक्ट्रॉनिक कचरा या ई-कचरा उन सभी विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और उनके हिस्सों से आता है जिन्हें बिना उपयोग के कचरे में फेंक दिया जाता है।फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स, जेमिमुस
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पर्यावरण के लिए काम कर रही संस्था टॉक्सिक लिंक की नई रिपोर्ट “लॉन्ग रोड टू सर्कुलरिटी ” में भारत के ई-वेस्ट प्रबंधन के एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) ढांचे में गंभीर संरचनात्मक खामियों का खुलासा किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ईपीआर मॉडल कचरा प्रबंधन की आधारशिला होने के बावजूद देश के हरित संक्रमण (ग्रीन ट्रांजिशन) के लिए जरूरी कई महत्वपूर्ण खनिजों को प्रभावी ढंग से पुनर्प्राप्त यानी रिकवरी नहीं कर पा रहा है।

रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा ईपीआर ढांचे के तहत केवल चार धातुओं सोना, तांबा, लोहा और एल्युमिनियम की रिकवरी अनिवार्य है, जबकि नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम और लिथियम जैसी कई महत्वपूर्ण और बहुमूल्य धातुएं प्रणाली से बाहर रह जाती हैं और नष्ट हो जाती हैं।

प्रमुख चुनौतियां

अध्ययन में ई-वेस्ट नियमों की समीक्षा करते हुए उनके प्रभावी क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं के बारे में बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, उपभोक्ताओं में जागरूकता का अभाव है। ई-कचरे से जुड़े पैसों का सही हिसाब नहीं रखा जा रहा है और उसकी निगरानी भी कमजोर है। ऐसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं।

प्रमुख निष्कर्ष

ईपीआर पोर्टल पर समुचित डेटा उपलब्ध नहीं है। छोटे निर्माताओं, ऑनलाइन विक्रेताओं और ग्रे-मार्केट आयातकों को प्रणाली से बाहर रखा गया है।

वित्त वर्ष 2023–24 और 2024–25 के लिए अनुपालन न करने पर लगाए गए जुर्माने और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति से संबंधित जानकारी सार्वजनिक नहीं है।

विस्तृत आंकड़े केवल ऑपरेटरों तक सीमित हैं, जिससे आम जनता को प्रणाली के प्रदर्शन की जानकारी नहीं मिल पाती।

वर्तमान नियमों में संग्रह केंद्र (कलेक्शन सेंटर) स्थापित करने की जिम्मेदारी किसी एक हितधारक पर स्पष्ट रूप से नहीं डाली गई है, जिससे उपभोक्ताओं के लिए अधिकृत चैनलों में ई-वेस्ट जमा करना कठिन हो जाता है।

‘ग्रीन’ उत्पाद डिजाइन अपनाने वाले उत्पादकों या उच्च गुणवत्ता वाली उन्नत रिकवरी प्रक्रिया अपनाने वाले रीसाइक्लरों के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं है।

अधूरा है ईपीआर

टॉक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा ने कहा, “ईपीआर भारत के ई-वेस्ट प्रबंधन ढांचे की आधारशिला है, लेकिन केवल सिद्धांत से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकते। इसके साथ एक प्रभावी और मजबूत कचरा संग्रह प्रणाली, अनौपचारिक क्षेत्र का एकीकरण, उच्च-तकनीक रीसाइक्लिंग सुविधाओं का विकास और जन-जागरूकता जरूरी है, ताकि प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाई जा सके।”

प्रमुख सिफारिशें

रिपोर्ट में मौजूदा व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए कुछ अहम सुझाव दिए गए हैं।

डेटा को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराकर जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ाई जाए।

रिवर्स सप्लाई चेन और संग्रह तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि ई-वेस्ट का प्रवाह सुव्यवस्थित हो सके।

उपभोक्ताओं को ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग के लाभ और अधिकृत चैनलों के उपयोग के महत्व के बारे में जागरूक किया जाए।

अनौपचारिक क्षेत्र को ई-वेस्ट प्रबंधन तंत्र में समुचित रूप से शामिल किया जाए।

रिपोर्ट के अनुसार, इन उपायों को लागू कर भारत एक अधिक प्रभावी, पारदर्शी और संसाधन-सुरक्षित ई-वेस्ट प्रबंधन प्रणाली की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

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