डिजिटल व्यवस्था में खामियां: 36% आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने ई-केवाईसी में समस्याओं की पुष्टि की

159 आंगनवाड़ी केंद्रों के अध्ययन में डिजिटल व्यवस्था, कुपोषण और मानदेय से जुड़े गंभीर सवाल सामने आए, रोजी-रोटी अभियान ने किया अध्ययन
राजस्थान के बारां क्षेत्र में बच्चों के साथ बाल अधिकार कार्यकर्ता। फोटो: राकेश मालवीय
राजस्थान के बारां क्षेत्र में बच्चों के साथ बाल अधिकार कार्यकर्ता। फोटो: राकेश मालवीय
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सारांश
  • आंगनवाड़ी सेवाओं के डिजिटलाइजेशन में तकनीकी खामियों के कारण लाभार्थियों को सेवाओं से वंचित होना पड़ रहा है।

  • एक अध्ययन में 36% कार्यकर्ताओं ने ई-केवाईसी में समस्याओं की पुष्टि की

  • 29% केंद्रों ने टेक होम राशन वितरण में तकनीकी बाधाओं के कारण लाभार्थियों के छूटने की बात कही।

  • भोपाल में आयोजित अधिवेशन में डिजिटल व्यवस्था की खामियों पर चर्चा हुई।

  • अध्ययन में कुपोषित बच्चों की पहचान के बावजूद उपचार तक पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर पाई गई।

  • पोषण आहार वितरण में भी अनियमितता देखी गई, जिससे सुधार की आवश्यकता स्पष्ट हुई।

देश में लोगों को उनका वाजिब हक मिले इसके लिए डिजिटल व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं, लेकिन इन्हीं डिजिटल व्यवस्थाओं के कारण बड़ी संख्या में लाभार्थी उन अधिकारों से बाहर भी हो रहे हैं। भोपाल में आयोजित बच्चों के भोजन और पोषण पर आयोजित तीसरे राष्ट्रीय अधिवेशन में यह विषय छाया रहा, देश के अलग-अलग राज्यों ने ऐसे ही विषयों पर जमीनी सच्चाई प्रस्तुत की, वहीं रोजी-रोटी अधिकार अभियान की ओर से आयोजित बच्चों से संबंधित योजनाओं (आईसीडीएस) के अध्ययन के नतीजों में भी इस बात की पुष्टि हुई है।

अधिवेशन में प्रतिभागियों ने कहा कि आंगनवाड़ी सेवाओं को डिजिटल बनाने की प्रक्रिया में लाभार्थियों के छूटने के मामले सामने आ रहे हैं। हाल ही में अभियान ने  आठ राज्यों के 159 आंगनवाड़ी केंद्रों में आंगनवाड़ी सेवाओं का एक अध्ययन किया है। 36 प्रतिशत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने बताया कि ई-केवाईसी में समस्या के कारण लाभार्थी सेवाओं से बाहर होने की स्थिति सामने आई है। वहीं, 29 प्रतिशत केंद्रों ने कहा कि टेक होम राशन के वितरण के दौरान चेहरे की पहचान आधारित व्यवस्था (एफआरटी) में तकनीकी समस्या के कारण लाभार्थी छूटे पाए गए हैं।
 
अध्ययन में आंगनवाड़ी केंद्रों की जमीनी स्थिति को समझने के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायिकाओं, अभिभावकों और समुदाय के लोगों से बातचीत की गई। छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 159 केंद्रों को अध्ययन में शामिल किया गया।

अभियान की आयशा ने इन नतीजों को प्रस्तुत करते हुए बताया कि अध्ययन के मुताबिक 68 प्रतिशत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने आंकड़े दर्ज करने के दौरान इंटरनेट या तकनीकी समस्याओं का सामना करने की बात दर्ज की गई है। 94 प्रतिशत कार्यकर्ताओं के पास स्मार्टफोन था। इनमें से 87 प्रतिशत कार्यकर्ता खुद स्मार्टफोन पर आंकड़े दर्ज कर पा रहे थे। इसके बावजूद डिजिटल व्यवस्था से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें सेवाओं तक पहुंच को प्रभावित कर रही हैं।

टेक होम राशन के वितरण में भी यह समस्या सामने आई। 91 प्रतिशत केंद्रों पर राशन वितरण के दौरान एफआरटी किया गया। इनमें से 29 प्रतिशत केंद्रों ने लाभार्थियों के छूटने की बात कही। हालांकि, अध्ययन में यह भी दर्ज है कि इस सवाल पर 22 केंद्रों ने जवाब ही नहीं दिया।

जागृत दलित आदिवासी संगठन की माधुरी कृष्णास्वामी ने कहा कि डिजिटल दुनिया और जमीनी दुनिया में बड़ा अंतर है, पर जिस मकसद से डिजिटलाइजेशन किया जा रहा है, उसमें वंचितों की संख्या घटने की बजाय बढ़ रही है।

कुपोषण से निपटने की व्यवस्था में भी एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया है। 62 प्रतिशत आंगनवाड़ी केंद्रों ने गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान की। 71 प्रतिशत केंद्रों ने मध्यम रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान की। लेकिन पिछले एक वर्ष में केवल 32 प्रतिशत केंद्रों ने गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा। यानी कुपोषित बच्चों की पहचान के बाद उन्हें उपचार तक पहुंचाने की व्यवस्था कमजोर दिखाई देती है।

पोषण आहार के वितरण में भी नियमितता के साथ अंतर दिखाई दिया। 94 प्रतिशत केंद्रों पर टेक होम राशन नियमित रूप से वितरित किया जा रहा था। लेकिन अध्ययन में पाया गया कि कई केंद्रों पर यह राशन दो महीने में एक बार दिया जा रहा था। 88 प्रतिशत केंद्रों पर नाश्ता नियमित रूप से तैयार किया जा रहा था। 92 प्रतिशत केंद्रों पर बच्चों को दोपहर का भोजन नियमित रूप से दिया जा रहा था।

बच्चों के भोजन की विविधता भी सीमित दिखाई देती है। 159 में से 109 केंद्रों पर अंडे, दूध, केले, लड्डू जैसी अतिरिक्त सामग्री दी जा रही थी। लेकिन अंडा केवल पांच प्रतिशत केंद्रों पर दिया जा रहा था। 30 प्रतिशत केंद्रों पर केले या अन्य फल दिए जा रहे थे। दूध और चिक्की या लड्डू 25 प्रतिशत केंद्रों पर दिए जा रहे थे।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने कहा कि जिस तरह की गरीबी और बजट प्रावधानों की मुश्किल है, उसमें अंडा कुपोषण दूर करने का सबसे सस्ता और टिकाउ स्त्रोत है, और लंबे समय से अभियान यह मांग कर रहा है कि इसे पोषण आहार में शामिल किया जाना चाहिए लेकिन इसे माना नहीं जा रहा है। सरकार के एनएफएचएस जैसे दूसरे अध्ययनों में सामने आया है कि कुपोषण घटने की दर संतोषजनक नहीं है।

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की कार्यस्थितियां भी चिंता का विषय हैं। अध्ययन में दर्ज अधिकतम मानदेय 16 हजार रुपये और सबसे कम मानदेय 4500 रुपए था। औसतन हर पांच में से एक आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को हर महीने मानदेय नहीं मिलने की बात सामने आई। सहायिकाओं को अधिकांश राज्यों में पांच से छह हजार रुपये के बीच मानदेय मिल रहा है।

हालांकि इस स्थिति के बावजूद अध्ययन में बच्चों की वृद्धि निगरानी की व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर मिली। 89 प्रतिशत केंद्रों पर वजन करने के उपकरण उपलब्ध और काम कर रहे थे। 94.3 प्रतिशत केंद्रों पर बच्चों का हर महीने वजन किया जा रहा था। 91 प्रतिशत अभिभावक बच्चों की वृद्धि की स्थिति से परिचित थे। अभियान की डॉ वंदना प्रसाद कहती हैं कि  यह बताता है कि देश में अच्छे आंगनवाड़ी व्यवस्था में सुधार हुआ है और इसे और बेहतर करने की जरूरत है।

बुनियादी ढांचे की स्थिति भी कई केंद्रों पर ठीक मिली। 91 प्रतिशत केंद्र पक्के भवनों में चल रहे थे। 70 प्रतिशत केंद्रों में अलग रसोई थी। 84 प्रतिशत केंद्रों पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका दोनों मौजूद थीं। केवल एक प्रतिशत केंद्र बंद मिले। समुदाय से जुड़ाव के स्तर पर भी कई सकारात्मक पहल सामने आईं। सभी राज्यों में ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस आयोजित किए जा रहे थे। माताओं की बैठकें भी नियमित रूप से होने की बात सामने आई।

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