जलवायु संकट से जन्मी ‘ईको एंजायटी’: किशोरों के भीतर पनपता गुस्सा, आक्रामकता और बदलाव की ताकत
इलस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई

जलवायु संकट से जन्मी ‘ईको एंजायटी’: किशोरों के भीतर पनपता गुस्सा, आक्रामकता और बदलाव की ताकत

जलवायु परिवर्तन के प्रति बढ़ती जागरुकता और उससे उत्पन्न मानसिक तनाव का संबंध युवाओं में बढ़ती आक्रामक प्रवृत्तियों से हो सकता है
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कल्पना कीजिए कि आप किशोर अवस्था के उस क्षण पर खड़े हैं, जहां दुनिया आपके आगे खुली- खुली नजर आती है, मगर साथ ही यह अहसास भी है कि उस दुनिया की नींव कमजोर पड़ने लगी है। यह सिर्फ ग्रह का तापमान नहीं, बल्कि हमारे मन की संरचना भी बदलने लगी है। आज की चुनौतियों में, पर्यावरण संकट सिर्फ बाहरी समस्या नहीं है बल्कि यह हमारे अंदरूनी संसार में भी गहराई से उतर रही है।

पिछले दशक में वैज्ञानिकों ने एक नया रुझान देखा है। यह किशोरों में “ईको एंजायटी” के रूप में मौजूद है। पर्यावरणीय बदलाव से मन में विचलन पैदा होना जिसे सोलास्टाल्जिया कहा जाता है या फिर जलवायु चिंता यानी ईको एंजायटी दोनों ही युवाओं के मन में घर कर रही हैं। यह सिर्फ क्षणिक भाव नहीं हैं बल्कि यह लगातार चलते रहने वाली बेचैनी है कि भविष्य अनिश्चित है। शोधकर्मियों ने तर्क दिया है कि यह पर्यावरण संकट जो हमें दूर दिखाई देता है लेकिन किशोरों की भावनात्मक और मानसिक सेहत पर वास्तविक असर डाल रहा है।

चिंताजनक पक्ष यह है कि यह भावनात्मक उथल-पुथल सिर्फ चिंता उदासी तक सीमित नहीं रहती। यह एक ऐसा रास्ता भी ले सकती है, जिसे हम अक्सर कल्पना भी नहीं करते, यह आक्रामकता की ओर बढ़ती है। एक तरह का भय या कुछ खोने का डर, कभी-कभी भीतर से बाहर की ओर निकलता है। अब अध्ययन यह सुझाव दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन की जागरुकता, जलवायु संबंधी तनावों का अनुभव, किशोरों में आक्रामक व्यवहार से जुड़ा हो सकता है।

यह सवाल उठता है आखिर युवा ही क्यों? इसका कारण उनकी विकास स्थिति में छुपा है। दरअसल किशोरावस्था एक तूफानी दौर है। सोच बदल रही है, भावनाएं उफान पर हैं और सामाजिक संबंध गहराई ले रहे हैं। मस्तिष्क अभी विकास कर रहा है, कुछ पहचान बन रही है। इस बीच, एक अस्थिर धरती पर जीने की चेतना उन विकास प्रक्रियाओं में खलल पैदा कर देती है। शोधकर्मी बताते हैं कि युवा मन वयस्कों की तुलना में जलवायु परिवर्तन को लेकर अधिक चिंता करते हैं और उनमें इसे समझने से संभालने की क्षमता कम होती है। इसी सोच को आगे ले जाते हुए यह समझना होगा कि विकासशील मस्तिष्क में अनुकूली क्षमता कम होती है, इसलिए किशोर विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। इस प्रकार बनती है यह तस्वीर बनकर सामने आती है। एक युवा व्यक्ति, दोस्ती, पहचान, स्कूल की चुनौतियों से जूझ रहा है और साथ ही, उसके चारों ओर दुनिया एक ऐसे बदलाव से गुजर रही है जिसे वह पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सकता। वह खुद को असहाय और छला हुआ पाता है। युवा मन के भीतर यह भाव कभी-कभी बाहर निकलकर गुस्से, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार के रूप में प्रकट हो जाता है।

सीधे और परोक्ष तनाव

जलवायु परिवर्तन और किशोरों में आक्रामकता के बीच जुड़ाव को दो बड़े मार्गों से देखा जा सकता है। प्रत्यक्ष पर्यावरणीय प्रभाव और अप्रत्यक्ष सामाजिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव। प्रत्यक्ष प्रभाव वह है जब किशोरों को तूफान, बाढ़, सूखे जैसे चरम मौसम घटनाओं का सामना करना पड़ता है, तो भावनात्मक बोझ तुरंत बढ़ जाता है। ट्रॉमा, स्कूल में बाधा, घर परिवार की अस्थिरता। यह घटनाएं शारीरिक तनाव बढ़ाती हैं। ध्यान स्मृति, कार्य संचालन क्षमता को प्रभावित करती हैं और भावनात्मक नियंत्रण बाधित करती हैं। परिणामस्वरूप, प्रतिक्रियात्मक व्यवहार, आवेग उग्रता और आक्रामकता बढ़ सकती है।

अप्रत्यक्ष प्रभाव का मार्ग थोड़ा घुमावदार है, पर उतना ही प्रभावशाली है। जलवायु परिवर्तन खाद्य, पानी और आवास जैसे संसाधनों को कमजोर करता है। विस्थापन बढ़ाता है, समुदाय सहयोग को घटाता है और पारिवारिक तनाव बढ़ाता है। ऐसे परिवेश में किशोरों को सहारा समर्थन कम मिलता है, प्रतिस्पर्धा ज्यादा मिलती है और अनुकूलण सूत्र कम होते हैं। यह सब मिलकर आक्रामक व्यवहार को बढ़ावा देते हैं। और जब उनके अंदर ईको एंजायटी, ईको ग्रेस या ईको एंगर भी होते हैं तो यह व्यापक समस्या बन जाती है।

सवाल यह है कि पर्यावरण दबाव कैसे आक्रामकता में बदलते हैं? इसे हम ऐसे समझ सकते हैं। पहला है, संज्ञानात्मक क्षति यानी जलवायु प्रेरित तनाव (उच्च तापमान, प्रदूषण, बाढ़) जो किशोरों के ध्यान स्मृति कार्य प्रणाली को प्रभावित करती है। जब यह कमजोर पड़ती हैं तब भावनात्मक नियंत्रण कम हो जाता है और आक्रामकता अधिक हो जाती है। दूसरा, भावनात्मक बोझ और असहायता का होना है। इसके तहत ईको एंजायटी, सोलास्टाल्जिया, मन में कुछ न करने का भाव या फिर यह आभास होना कि सब कुछ बदल गया बै और अब कुछ नहीं हो सकता। यह सारे भाव दरअसल गुस्सा, निराशा, चिड़चिड़ापन बढ़ाते हैं। जब युवा जलवायु विजन से असहाय महसूस करते हैं तो उनका भाव बाहरी रूप ले सकता है। तीसरा है, सहायता के चैनल का टूटना यानी जलवायु परिवर्तन सुरक्षात्मक माहौल (पारिवारिक स्थिरता, सोशल नेटवर्क, स्कूल रुटीन) को कमजोर करता है। जब सपोर्ट सिस्टम खत्म हो जाते हैं तो किशोर गलत तरीकों का सहारा लेते हैं, जिसमें गुस्सा और आक्रामकता भी शामिल है।

पांचवा है, विकासगत संवेदनशीलता, जो किशोरावस्था का एक अनोखा दौर होता है। उनके इमोशनल रेगुलेशन सिस्टम अभी भी ठीक से काम करना सीख रहे होते हैं। वह ज्यादा रिएक्टिव होते हैं, ज्यादा सोशल होते हैं और अपने दोस्तों के असर में जल्दी आ जाते हैं। इसलिए आक्रामकता और बढ़ सकती है। यह मुद्दा आज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हम एक के बाद एक वैश्विक संकटों से गुजर रहे हैं। सिर्फ जलवायु परिवर्तन ही नहीं, बल्कि एक महामारी, जियोपॉलिटिकल संघर्ष, आर्थिक उथल-पुथल भी जारी है। इसलिए किशोरों पर दोहरा बोझ है।

युवाओं को एक तरफ सामान्य विकास के तूफानों से निपटना है और दूसरी तरफ अपने बनाए तूफानों में जीना है। यह कशमकश किशोरों में गुस्सा और अवसाद भर रहा है। किशोरों पर यह सभी दबाव एक साथ पड़ रहे हैं। यह मल्टीप्रेशर स्थिति मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है, आक्रामक व्यवहार की आशंका बढ़ा रही है और स्वस्थ वयस्क जीवन में एडजस्ट करने की भविष्य की क्षमता से समझौता करता है। लेकिन यह कहानी पूरी तरह निराशा की नहीं है।

हाल की अनुसंधान की सबसे गहरी बातों में से एक यह है कि इको-एंजायटी जरूरी नहीं कि नुकसानदायक हो। यह बदलाव लाने वाली भी हो सकती है, जिन्होंने अपनी जलवायु चिंता को सार्थक कार्रवाई में बदला, उनके मानसिक स्वास्थ्य परिणाम बेहतर पाए गए हैं और आक्रामकता की संभावना कम हुई है। इसलिए समर्पित हस्तक्षेप आवश्यक हैं। हमें सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग नहीं देनी है। हमें किशोरों के सशक्तिकरण (कुशल नियंत्रण) की तरफ ध्यान देना है। उन्हें सिर्फ प्रभावित नहीं होना चाहिए बल्कि सहभागी बनना चाहिए। युवाओं को काम करने, योगदान देने, बोलने और नेतृत्व करने के अवसर चाहिए। उन्हें पॉजिटिव यूथ डेवलपमेंट जैसे फ्रेमवर्क की जरूरत है ताकि वह पीड़ित से एक्शन लेने वाले बन सकें। इसे एक आभासी उदाहरण से समझ सकते हैं।

फर्ज करिए, एक किशोर समुद्र के किनारे वाले इलाके में है, जिसका स्कूल दो से तीन बार प्रभावित हो चुका है। उसके पिता और मां की आमदनी अप्रत्याशित हो चुकी है। स्थानीय परिषद ई-मेल में आश्वासन दे रही है, “हम देख रहे हैं लेकिन उसे भावनात्मक समर्थन नहीं देती। उस किशोर को लगता है आखिर क्यों कोई इसको ठीक नहीं कर रहा? उसके भीतर असहायपन बैठता है। फिर वह कहीं चिढ़ जाता है। दोस्त से झगड़ा हो जाता है, छोटे भाई बहन से बहस होती है। यह सिर्फ उसकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है, यह टूटते हुए सिस्टम की प्रतिक्रया है। खोती हुई नियंत्रण अनुभूति की प्रतिक्रिया है।

अब वही कहानी इस तरह बदलिए। उसी इलाके में एक युवाओं का क्लब शुरू करता है, जो मरुस्थलीकरण से लड़ने वाली पेड़ लगाने की शुरुआत करता है। किशोर देखता है। पेड़ बढ़ेगा, जल संकट खत्म होगा, नदी लौटेगी। उसे अहसास होता है कि वह फर्क ला सकता है। उसकी आक्रामक ऊर्जा सकारात्मक तरीके से बदल जाती है। उसे लगता है कि उसकी आवाज मायने रखती है। वही भावनात्मक उथल-पुथल अब उसकी शत्रु नहीं बल्कि उसका साथी बन जाती है। यह भी गौर करने वाला है कि तमाम शोध के बावजूद भी अभी बहुत से प्रश्न अनुत्तरित हैं। हम अभी तक यह पूरी तरह नहीं जानते कि कैसी-कैसी प्रत्यक्ष घटनाएं दरअसल आक्रामकता का कारण बनती हैं। अधिकांश शोध चिंता उदासी अवसाद पर केंद्रित हैं लेकिन “आक्रामक व्यवहार” पर बहुत कम अध्ययन हैं। इसके अलावा, हम अभी तक किशोरों के लिए विशिष्ट, प्रमाणित “ईको एंजायटी स्केल” नहीं बना पाए हैं। शोध अधिकांश उच्च आय वाले देशों में हैं जबकि सबसे ज्यादा प्रभाव वाले क्षेत्र जैसे ग्लोबल साउथ, कम अध्ययन किए गए हैं।

जलवायु परिवर्तन सिर्फ भू-भौतिक खतरा नहीं है। यह मनोवैज्ञानिक, व्यवहारिक और सामाजिक खतरा भी है। किशोरों के लिए यह दोधारी तलवार की तरह है। विकास की चुनौतियां चल रही हैं और एक बदलती दुनिया उन्हें परेशान कर रही है। इस स्थिति में, आक्रामकता उनकी कमजोरी नहीं बल्कि प्रतिक्रिया हो सकती है। उनके अंदर काम कर रहे तनाव का परिणाम हो सकती हैं। लेकिन दूसरी ओर जब हम उनकी भावनात्मक वास्तविकता को समर्थन, कार्रवाई और अर्थ निर्माण से मिलाते हैं तो इको भावनाएं सिर्फ बोझ नहीं बल्कि परिवर्तन शक्ति बन सकती हैं।

हमारा शोध इस दोहरे सत्य को समझने के लिए तैयार होना चाहिए। बोझ भारी है, लेकिन परिवर्तन की क्षमता महाशक्तिशाली है। किशोर सिर्फ करुणा का विषय नहीं हैं, वह बदलाव के उभरते हुए संरक्षक हैं। अगर हम यह पहचान नहीं कर पाए और तो हम उन्हें असहाय छोड़ देंगे। अंततः इस विषय की समझ मात्र अकादमिक नहीं है, दरअसल यह एक मानव कहानी है। यह हमें कहती और समझाती है कि युवा आवाजों को सुनो, उनके गुस्से को समझो, उसे दिशा दो, भावनात्मक भूगोल को फिर से बसाओ, जैसे हम प्राकृतिक भूगोल को फिर से बनाना चाहेंगे। यदि हम सफल हुए तो हम सिर्फ एक संकट को टालेंगे नहीं बल्कि हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो बदलती दुनिया में मजबूत, दयालु और साफ सोच वाली होगी।

(एवी शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस स्थित आर्यभट्ट कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग में अंतिम वर्ष के स्नातक छात्र हैं। राधे श्याम शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के अध्यक्ष हैं)

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