जब उदंती के जंगल में लौटा अंधेरा

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में जैव विविधता को सांस लेने का मौका दे दिया है
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में रात को विचरण करता बाघ, फोटो: उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में रात को विचरण करता बाघ, फोटो: उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व
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सूरज ढलते ही जंगल का एक दूसरा संसार जागता है। पेड़ों की ऊंची शाखाओं पर गिलहरियां सक्रिय होती हैं, उड़न गिलहरियां एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक फिसलती हैं, उल्लुओं की आवाज गूंजती है और बाघ अपने क्षेत्र का मुआयना करने निकलते हैं। 

लेकिन छत्तीसगढ़ के उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में कई दशकों तक यह प्राकृतिक लय बाधित रही। रिजर्व के दोनों कोर क्षेत्रों से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच-130सी और एनएच-130सीडी, रात भर वाहनों की आवाजाही से गुलजार रहते थे। तेज रोशनी, इंजन का शोर और लगातार मानवीय गतिविधियां वन्यजीवों के लिए एक अदृश्य दीवार बन गई थीं। 

उदन्ती -सीतानदी बाघ अभयारण्य के सह निदेशक वरुण जैन का कहना है, "नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने टी.एन. गोदावर्मन मामले में देशभर के टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्रों में रात के समय यातायात पर रोक लगाने का आदेश दिया। इसके बाद राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने दिसंबर 2025 में राज्यों को इसे लागू करने के निर्देश दिए। उदंती-सीतानदी में इसके शुरुआती प्रभाव अब दिखाई देने लगे हैं।”  

जब पेड़ों की दुनिया फिर जुड़ने लगी 

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सबसे पहले बदलाव उन जीवों में दिखाई दिया जो शायद ही कभी सुर्खियों में आते हैं।  भारतीय विशाल उड़न गिलहरी (पेटॉरिस्टा फिलिपेन्सिस) और मालाबार विशाल गिलहरी राटूफा इंडिका लगभग पूरा जीवन पेड़ों की छत्रछाया में बिताती हैं। उड़न गिलहरी शायद ही कभी जमीन पर उतरती है। यदि जंगल के बीच सड़क बन जाए या लगातार मानवीय हस्तक्षेप बना रहे, तो उनके लिए वह सड़क केवल डामर की पट्टी नहीं, बल्कि एक पारिस्थितिक अवरोध बन जाती है। 

रिजर्व के अधिकारियों के अनुसार, अब इन प्रजातियों की उपस्थिति केवल उदंती और सीतानदी कोर तक सीमित नहीं है। इनके रिकॉर्ड रिसगांव, इंदागांव, अर्सीकान्हार और कुल्हाड़ीघाट जैसे क्षेत्रों में भी मिलने लगे हैं। 

हालांकि इन बदलावों की वैज्ञानिक पुष्टि के लिए विस्तृत अध्ययन अभी जारी हैं, लेकिन शुरुआती संकेत बताते हैं कि रात का सन्नाटा लौटने से जंगल की पारिस्थितिक जुड़ाव क्षमता (फंक्शनल कनेक्टिविटी) बेहतर हुई है। 

सैर पर हॉर्नबिल, फोटो : उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व
सैर पर हॉर्नबिल, फोटो : उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व

जंगल की सेहत के संकेत 

उदंती-सीतानदी में हाल के महीनों में मालाबार पाइड हॉर्नबिल के रिकॉर्ड भी बढ़े हैं। हॉर्नबिल केवल एक आकर्षक पक्षी नहीं है। इसे उष्णकटिबंधीय जंगलों का सबसे महत्वपूर्ण बीज-वितरक माना जाता है। यह फल खाकर कई किलोमीटर दूर तक बीज फैलाता है, जिससे जंगलों का प्राकृतिक पुनर्जनन होता है और वनस्पतियों की आनुवंशिक विविधता बनी रहती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि हॉर्नबिल और विशाल गिलहरियों जैसे जीवों की बढ़ती मौजूदगी इस बात का संकेत हो सकती है कि जंगल की संरचना और पारिस्थितिक प्रक्रियाएं धीरे-धीरे बेहतर हो रही हैं। 

क्या बाघों के लिए भी खुल रहा है रास्ता? 

उदंती-सीतानदी का महत्व केवल एक टाइगर रिजर्व होने तक सीमित नहीं है। यह इंद्रावती टाइगर रिजर्व, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के जंगलों और ओडिशा के सुनाबेड़ा वन्यजीव अभयारण्य के बीच एक महत्वपूर्ण वन गलियारा बनाता है। 

बाघों के लिए ऐसे गलियारे अत्यंत आवश्यक हैं। इन्हीं के माध्यम से युवा बाघ नए क्षेत्रों में पहुँचते हैं और अलग-अलग आबादियों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान बना रहता है। 

जनवरी 2026 में सीतानदी कोर क्षेत्र में बाघ की आवाजाही दर्ज की गई। प्रारंभिक अवलोकनों से यह भी संकेत मिले हैं कि जिन इलाकों में लगभग पंद्रह वर्षों से बाघों की उपस्थिति दर्ज नहीं हुई थी, वहाँ फिर से उनकी गतिविधियाँ दिखाई दे रही हैं। हालांकि वैज्ञानिक यह मानते हैं कि इस बदलाव को सीधे रात के यातायात प्रतिबंध से जोड़ने के लिए अभी लंबी अवधि के अध्ययन आवश्यक हैं। 

सिर्फ सड़क नहीं, एक पारिस्थितिक अवरोध 

संरक्षण जीवविज्ञान में सड़कें केवल परिवहन का माध्यम नहीं मानी जातीं। वह जंगलों को टुकड़ों में बांट देती हैं। वाहनों की रोशनी, शोर और लगातार मानवीय गतिविधियां विशेषकर रात्रिचर जीवों के व्यवहार, भोजन की तलाश, प्रजनन और आवागमन को प्रभावित करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश ने केवल वाहनों को नहीं रोका। इसने जंगलों को फिर से अंधेरा और शांति लौटाने का अवसर दिया। और रात्रिचर जीवों के लिए यही अंधेरा एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संसाधन है। 

स्थानीय समुदायों के लिए भी अवसर 

यदि ये सकारात्मक बदलाव आगे भी जारी रहते हैं, तो इसका लाभ केवल वन्यजीवों तक सीमित नहीं रहेगा। उदंती-सीतानदी के बफर क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए पक्षी अवलोकन, रात्रिकालीन प्रकृति भ्रमण, वन्यजीव व्याख्या और सामुदायिक इको-टूरिज्म जैसी गतिविधियां आजीविका के नए अवसर पैदा कर सकती हैं। हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि पर्यटन का विस्तार सावधानीपूर्वक होना चाहिए, ताकि वही मानवीय दबाव फिर से जंगलों पर न लौट आए। 

प्रकृति को केवल थोड़ा-सा अवसर चाहिए 

उदंती-सीतानदी में दर्ज हो रहे ये परिवर्तन अभी शुरुआती हैं। आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक अध्ययन ही बताएंगे कि ये रुझान कितने स्थायी हैं। फिर भी यह अनुभव संरक्षण का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराता है कि प्रकृति में स्वयं को पुनर्जीवित करने की अद्भुत क्षमता होती है। कई बार संरक्षण के लिए बड़े निर्माण, भारी निवेश या नई तकनीकों की नहीं, बल्कि केवल इतना करने की आवश्यकता होती है कि जंगल को उसकी स्वाभाविक शांति और अंधेरा लौटा दिया जाए। उदंती-सीतानदी में शायद यही हो रहा है। कई दशकों बाद जंगल फिर से रात को जीना सीख रहा है। 

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