शिमला के जंगलों में लगी आग। फोटो: रोहित पराशर
शिमला के जंगलों में लगी आग। फोटो: रोहित पराशर

वनाग्नि से जूझता भारत: हिमाचल का बायोचार मॉडल बना समाधान की नई उम्मीद

भारत के लगभग 27 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी दैनिक जरूरतों के लिए जंगलों पर निर्भर हैं
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सारांश
  • भारत के हिमालयी राज्यों में वनाग्नि एक गंभीर समस्या बन चुकी है।

  • हिमाचल प्रदेश ने चीड़ की पत्तियों से बायोचार बनाने की पहल की है

  • जो आग को रोकने और ग्रामीणों को रोजगार देने में सहायक है।

  • यह मॉडल कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकता है और अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है।

भारत के हिमालयी राज्यों और मध्य भारत के जंगलों में लगने वाली आग अब केवल मौसम के साथ आने वाली एक स्वाभाविक या ऋतुनिष्ठ घटना नहीं रह गई है। यह धीरे-धीरे एक ऐसे स्थायी और भयावह पर्यावरणीय संकट में बदल चुकी है, जो हमारी पारिस्थितिकी, ग्रामीण आजीविका और राष्ट्रीय जलवायु सुरक्षा—तीनों के लिए गंभीर चुनौती पेश कर रहा है। विडंबना यह है कि हर वर्ष ग्रीष्म ऋतु में जंगल धधकते हैं, धुएं का गुबार आसमान को ढकता है, नुकसान के डरावने आंकड़े सामने आते हैं और फिर अगली वर्षा की बूंदों के साथ सब कुछ भुला दिया जाता है। वनाग्नि को आज भी अक्सर एक अपरिहार्य प्राकृतिक आपदा मानकर स्वीकार कर लिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारतीय वनों में लगने वाली अधिकांश आग मानवीय लापरवाही का परिणाम है।

वनाग्नि अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक गंभीर प्राकृतिक आपदा की चेतावनी बन चुकी है। सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति भारतीय हिमालयी क्षेत्र—विशेषकर लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में है। उपग्रह आधारित अग्नि संकेतों से ज्ञात होता है कि इन राज्यों में न केवल आग की घटनाओं की आवृत्ति बढ़ी है, बल्कि उनकी तीव्रता और फैलाव भी पहले से कहीं अधिक घातक हुआ है।

हिमालय केवल भारत का मुकुट नहीं है, बल्कि यह देश की जल सुरक्षा, जैव विविधता और वर्षा चक्र का नियामक भी है। यहाँ के जंगलों में लगने वाली आग सीधे तौर पर हिमनदों के पिघलने की गति को तेज करती है और नदियों के उद्गम क्षेत्रों के पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ती है। विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में चीड़ के जंगलों का बढ़ता क्षेत्र और उनमें लगने वाली आग अब एक ऐसी चुनौती बन गई है, जिससे निपटने के लिए हमें पुनः अपनी पुरानी परम्पराओं, व्यवस्थाओं के साथ-साथ बदलती वैश्विक परिस्थितियों द्वारा प्रदान किए जाने वाले अवसरों का भरपूर फायदा उठाते हुए  क्लाइमेट फाइनेंस से लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

वनाग्नि के केवल पर्यावरणीय नुकसान की चर्चा अधिक होती है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक पक्ष पर प्रायः मौन साध्य लिया जाता है। एक महत्वपूर्ण शोध के अनुसार, भारत के लगभग 27 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी दैनिक जरूरतों के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। इनमें ग्रामीण और जनजातीय समुदाय प्रमुख हैं। ईंधन, पशुओं के लिए चारा, लघु वनोपज, औषधीय पौधे और हस्तशिल्प—इन सबके लिए जंगल ही आधार हैं। जब जंगल जलते हैं, तो यह केवल पेड़ों का जलना नहीं है, बल्कि लाखों निर्धन परिवारों की आजीविका का जलना है। आग की वजह से मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत नष्ट हो जाती है, जिससे भविष्य में कृषि उत्पादन और चारागाहों की गुणवत्ता गिरती है। नीति निर्माण में इस मानवीय और ग्रामीण पक्ष को शामिल किए बिना वनाग्नि का कोई भी समाधान अधूरा ही रहेगा।

राज्य का कुल वन क्षेत्र लगभग सैंतीस हजार वर्ग किलोमीटर है, जो इसके कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 68.16 प्रतिशत भाग है। वर्ष 2024-25 के दौरान हिमाचल में ढाई हजार से अधिक वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से अधिकांश चीड़ बहुल इलाकों में केंद्रित थीं। चीड़ की पत्तियां अपनी अत्यधिक ज्वलनशीलता के कारण आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं। आग के दुष्परिणाम बहुआयामी हैं। आग केवल वन संपदा को नष्ट नहीं करती, बल्कि यह कार्बन सोखने वाले स्रोतों को कार्बन उत्सर्जन के केंद्रों में बदल देती है। धुएं से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म कण वैश्विक तापन को गति देते हैं।

इसके अतिरिक्त, मिट्टी की जलधारण क्षमता कम होने से मानसून के दौरान भूस्खलन और आकस्मिक बाढ़ की घटनाएं बढ़ जाती हैं, जो पहाड़ी जीवन के लिए विनाशकारी साबित होती हैं। अब तक हमारी नीतियां मुख्य रूप से प्रतिक्रियात्मक रही हैं, यह रणनीति आग के मूल कारण पर प्रहार नहीं करती। हमें एक ऐसी निवारक नीति चाहिए जो आग लगने की संभावना को ही कम कर दे। यहाँ सबसे बड़ी चुनौती जंगलों में जमा होने वाला जैविक कचरा या चीड़ की सूखी पत्तियां हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए हिमाचल प्रदेश ने एक साहसिक और समाधान-आधारित पहल की है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने शैक्षणिक संस्थानों और निजी क्षेत्र के सहयोग से एक प्रायोगिक परियोजना शुरू की है। इस परियोजना का उद्देश्य चीड़ के जंगलों से बेकार पड़ी पत्तियों को एकत्र कर उससे 'बायोचार' तैयार करना है। यह पहल इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह वनाग्नि को केवल एक आपदा नहीं, बल्कि एक आर्थिक अवसर के रूप में देखती है। इस प्रतिमान की सबसे बड़ी विशेषता सामुदायिक भागीदारी है।

इसमें स्थानीय ग्रामीणों को पत्तियां एकत्र करने के काम से जोड़ा जाएगा और उन्हें इसके बदले नकद भुगतान किया जाएगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होगा। जब वन संरक्षण ग्रामीण की आय से जुड़ेगा, तो वह स्वयं वनों का प्रहरी बन जाएगा। इसके साथ ही, पाइन निडल के साथ-साथ लैंटाना जैसी आक्रामक झाड़ियों का भी बायोचार बनाने में उपयोग होगा, जिससे जंगलों को दोहरी समस्या से मुक्ति मिलेगी।

कृषि में बायोचार का प्रयोग मिट्टी की उर्वरता और नमी सोखने की क्षमता को बढ़ाता है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। इस परियोजना का एक और क्रांतिकारी पहलू कार्बन जमा (कार्बन क्रेडिट) अर्जन की संभावना है। बायोचार के माध्यम से कार्बन को सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी में स्थिर किया जा सकता है।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले दस वर्षों में इस एक परियोजना से ही हजारों कार्बन क्रेडिट अर्जित किए जा सकेंगे। यह हिमाचल प्रदेश के लिए वैश्विक कार्बन बाजार में प्रवेश करने का एक बड़ा अवसर है। यदि अन्य राज्य भी सार्वजनिक-निजी भागीदारी मोड पर इस मॉडल को अपनाते हैं, तो भारत न केवल वनाग्नि पर नियंत्रण पा सकेगा, बल्कि अपनी हरित आर्थिकी को भी सुदृढ़ कर सकेगा। बायोचार का उपयोग इस्पात उद्योग में हरित ईंधन के रूप में और प्रसाधन सामग्री उद्योग में भी संभव है, जो इसकी औद्योगिक मांग को सुनिश्चित करता है।

हिमाचल का यह मॉडल केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अब समय आ गया है कि इस तरह की प्रायोगिक परियोजनाओं को एक राष्ट्रीय मिशन का रूप दिया जाए। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, वित्तीय प्रोत्साहन और तकनीकी सहयोग की आवश्यकता होगी। नीति, विज्ञान और समुदाय के इस त्रिकोणीय संगम से ही हम अपने जंगलों को राख होने से बचा सकते हैं।

वनाग्नि को अब केवल कुदरत का कहर कहकर टालना अपनी जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ना होगा। यह स्पष्ट है कि यह समस्या मानव-निर्मित कारकों से उपजी है और इसका समाधान भी मानव की सामूहिक इच्छाशक्ति और नवाचार में ही निहित है। जंगल केवल पर्यावरण की संपदा नहीं हैं; वे करोड़ों लोगों की जीवनरेखा और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा की गारंटी हैं।

 हिमाचल प्रदेश की यह पहल दिखाती है कि यदि दृष्टि स्पष्ट हो और इच्छाशक्ति मजबूत, तो जंगलों की विनाशकारी आग को विकास की रोशनी और आजीविका के अवसरों में बदला जा सकता है। अब प्रश्न यह है कि क्या हम इस संदेश को समय रहते पूरे देश में फैलाएंगे, या फिर हर ग्रीष्म ऋतु के साथ अपने अमूल्य वनों को राख बनते देखते रहेंगे। वनाग्नि पर नियंत्रण केवल विभाग का कार्य नहीं, बल्कि एक जन-आंदोलन बनना चाहिए।

लेखक भारतीय वन सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं और वनों, बागवानी, कृषि, पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन के विशेषज्ञ हैं

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