महकता महुआ: आदिवासियों की अर्थव्यवस्था, आस्था और रोजगार का जीवनदायी पेड़

महुआ के मौसम में कामेपुर से अमाड़ तक गांवों की दिनचर्या बदल जाती है; सूरज उगने से पहले शुरू होने वाली फूल बीनाई आदिवासी परिवारों की सालाना आमदनी, राशन, कपड़े और खरीफ की खेती की तैयारी का सबसे बड़ा सहारा बनती है
आदिवासी इलाकों में महुआ का पेड़ मार्च-अप्रैल में स्थानीय लोगों के जीवन की धुरी बन जाता है
आदिवासी इलाकों में महुआ का पेड़ मार्च-अप्रैल में स्थानीय लोगों के जीवन की धुरी बन जाता है(फोटो: भागीरथ / सीएसई)
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ब्रिटिश मानवविज्ञानी वेरियर एल्विन ने 1936 में एक गोंड आदिवासी से स्वर्ग और नर्क में भेद पूछा तो उसका सीधा-सा जवाब था, “मीलों मील फैला जंगल जहां कोई वन रक्षक न हो वह स्वर्ग है और मीलों मील फैला जंगल जहां कोई महुआ का पेड़ न हो वह नर्क है।” यह बातचीत उन्होंने अपनी डायरी “लीव्स फ्रॉम द जंगल: लाइफ इन ए गोंड विलेज” में दर्ज की है।

उस गोंड आदिवासी को महुआ के पेड़ से इतना प्रेम था कि वह मरने के बाद भी पवित्र साज पेड़ (जिसमें गोंड आदिवासियों के सबसे बड़े देवता वास करते हैं) के बजाय महुआ के पेड़ के नीचे ही दफन होना चाहता था ताकि मरने के बाद भी उसकी जड़ों से रस पीता रहे। यह महुआ के पेड़ की महिमा है। ये पेड़ आदिवासियों के जीवन में कितना महत्व रखते हैं, यह समझने के लिए मार्च-अप्रैल के महीने में उनके गांव का रुख करना जरूरी है। ऐसा ही एक गांव है छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में बसा गोंड बहुल कामेपुर।

सुबह के 10 बजे गांव की मुख्य सड़क पर न तो किसी की आवाजाही है और न ही कोई शोरशराबा। अधिकांश घरों के मुख्य दरवाजे पर सांकल लगी हैं। गांव के बच्चे, बूढ़े और जवान घरों से गायब हैं। मार्च के महीने में गांव में इतना सन्नाटा दुर्लभ है। गांव वालों के लिए यह महुआ फूल बीनने का उत्सव है। 339 लोगों की आबादी और 74 परिवार वाले इस गांव में सुबह 4-5 बजे से ही लोग महुआ के फूल बीनने में जुट जाते हैं। इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देने में वे भोजन करना तक भूल जाते हैं।

अपने 25-30 में से एक पेड़ के नीचे महुआ फूल बीन रहे और उसे खाने की कोशिश में आ रही एक गाय को बार-बार भगा रहे करीब 60 वर्षीय भादूराम सुबह 5 बजे अपने खेत में पहुंचे हैं। वह अपने साथ घर में रखा रात का बासी खाना लेकर आए हैं। उनकी पत्नी रात में भी सुबह के लिए खाना बनाकर रख देती हैं ताकि महुआ बीनने को पूरा समय मिल सके। खाना कम पड़ने पर वह खेत में लगे तेंदू के पेड़ के फल खाकर काम चला लेते हैं। भादूराम के घर के तीन सदस्य सुबह से शाम तक महुआ बीनते हैं। वह 4,000-4,500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से महुआ बेचेंगे और इस पैसे से घर का राशन और कपड़े खरीदेंगे।

भादूराम के खेत से कुछ फासले पर अलग-अलग पेड़ों के नीचे आठ सदस्यीय परिवार के साथ महुआ बीनने में व्यस्त पवन सिंह इस मौसम को ही रबी की फसल की संज्ञा देते हैं। पवन सिंह के तीन एकड़ के खेतों में महुआ के 50-60 पेड़ हैं। इन पेड़ों को अपनी पूंजी मानने वाले पवन सिंह महुआ फूल बीनने के लिए रबी के मौसम में कोई फसल नहीं लगाते क्योंकि फसल लगाने पर महुआ फूल बीनने में दिक्कत होगी। पारंपरिक फसल के स्थान पर महुआ फूल को तरजीह देने का गणित समझाते हुए पवन सिंह बताते हैं कि खरीफ में वह धान की फसल लगाते हैं और तीन एकड़ के खेतों से उन्हें करीब 12 क्विंटल धान मिलता है। यह फसल करीब 40,000 रुपए में बिकती है। करीब इतनी ही आय उन्हें बिना किसी लागत के महुआ फूल से प्राप्त हो जाती है।

पवन सिंह ने हालिया वर्षों में 2022 में सबसे अधिक 15 क्विंटल महुआ का फूल इकट्ठा किया था और उसे 40,000 रुपए में बेचा था। उस समय भाव 2,500 रुपए प्रति क्विंटल था जो मौजूदा भाव से काफी कम है। अगर इस साल भी पूरे सीजन में 12 क्विंटल महुआ फूल वह बीन लेते हैं तो उन्हें 4,500 रुपए के मौजूदा भाव पर 54,000 रुपए की आय हो जाएगी। पवन मानते हैं कि रबी की पारंपरिक फसलों में इतनी आय संभव नहीं है, इसलिए महुआ फूल की कीमत पर दूसरी फसल लगाने का जोखिम नहीं लेते।

कामेपुर के 70 वर्षीय बलदेव सात पेड़ों के फूल से होने वाली करीब 16 हजार रुपए की आमदनी से आने वाले कुछ महीने परिवार को पालते हैं। साथ ही खरीफ की फसल की तैयारी भी इसी आय से करते हैं। कामेपुर के रामेश्वर कपिल का अनुमान है कि महुआ के फूल ग्रामीणों की वार्षिक आय में 20-30 प्रतिशत तक योगदान देता है। गांव में जिन आदिवासियों के हिस्से में महुआ के कम पेड़ हैं, उनके लिए जंगल का महुआ सुलभ है। गांव में करीब 3,300 हेक्टेयर का जंगल है, जिसमें महुआ के करीब 50,000 पेड़ हैं। ये पेड़ शांति बाई जैसे उन आदिवासियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं, जिनके निजी स्वामित्व में सीमित पेड़ हैं। शांति बाई अपने खेतों में खड़े तीन पेड़ों से महुआ बीनने के बाद अपनी सास, देवरानी, पति और बेटी के साथ जंगल का रुख करती हैं और सीजन में करीब 3 क्विंटल महुआ के फूलों का संग्रहण कर लेती हैं। वह बताती हैं कि फूलों का संग्रहण इस पर निर्भर करता है कि परिवार में कितने सदस्य हैं। आमतौर पर दो लोग 2-3 क्विंटल महुआ फूल हर सीजन में बीन लेते हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी

करंट रिसर्च इन न्यूट्रिशन एंड फूड साइंस में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, भारत में 4.5 लाख टन महुआ फूलों का उत्पादन होता है। वहीं दूसरी तरफ फॉरेस्ट गवर्नेंस लर्निंग ग्रुप का अध्ययन कहता है कि हर साल 8.5 लाख टन महुआ फूलों का उत्पादन होता है जबकि क्षमता 49 लाख टन की है। भारत की 75 प्रतिशत जनजातीय आबादी इसके संग्रहण से जुड़ी है। महुआ का फूल छत्तीसगढ़ की प्रमुख वनोपज है। राज्य में हर साल 5 लाख क्विंटल महुआ के फूलों का उत्पादन होता है। शोधकर्ता सहदेव व अन्य द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में पाया गया कि गरियाबंद जिले के अलग-अलग ब्लॉक में करीब 82 प्रतिशत परिवार महुआ फूलों का संग्रहण करते हैं और यह उनकी आय में महत्वपूर्ण योगदान देता है। 500 से अधिक परिवारों के बीच किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार, औसतन एक परिवार महुआ फूल और बीजों की हर बिक्री पर 4,000-12,000 रुपए की आमदनी प्राप्त करता है। छत्तीसगढ़ में सूखे महुआ के फूलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 33 रुपए प्रति किलो है जिसमें 3 रुपए बोनस भी शामिल है।

अप्रैल-जून 2020 में एनवायरमेंट एंड ईकोलॉजी में प्रकाशित सावत नायक और उत्तम कुमार साहू के अध्ययन में पाया गया कि ओडिशा के 10 जिलों में प्रति परिवार औसतन 3.67 क्विंटल महुआ फूलों का संग्रहण होता है और इन जिलों में महुआ उत्पाद वार्षिक आय में 14 से 22 प्रतिशत तक योगदान देते हैं। बोलांगीर जिले में महुआ उत्पादों (फूल और बीज) से होने वाली आय अधिकतम 22,306 रुपए प्रतिवर्ष है। महुआ उत्पादों से प्राप्त आय अन्य वनोपज से होने वाली आय (1,072) और मजदूरी से प्राप्त आय (15,968) से अधिक है।

निजी भी, सामुदायिक भी

मध्य भारत के सबसे महत्वपूर्ण पेड़ों में शामिल महुआ जन्म से मृत्यु तक आदिवासियों से जुड़ा रहता है। मान्यता है कि इस पेड़ में उनके देवता वास करते हैं, इसलिए इसे कभी काटा या हिलाया नहीं जाता। यह पेड़ उनके लिए दवा, दारू और भोजन का इंतजाम करता है। मार्च-अप्रैल के महीनों में जब भोजन का भंडार खत्म हो रहा होता है, तब यह उन्हें भोजन के साथ ही आय उपलबध कराता है।

महुआ धीमी गति से बढ़ने और सालों साल खड़ा रहने वाला पेड़ है। इस पर 10-15 वर्ष में फूल आने शुरू हो जाते हैं और फरवरी के तीसरे सप्ताह से गिरना प्रारंभ होकर मई के पहले सप्ताह तक गिरते रहते हैं। महुआ वृक्ष का औसत पुष्पन काल लगभग पांच सप्ताह का होता है। राज्य वन अनुसंधान संस्थान, जबलपुर द्वारा किए गए एक प्रायोगिक अध्ययन के अनुसार, पेड़ के आकार के आधार पर प्रति पेड़ औसत उत्पादन 11.33 किलोग्राम से 76.79 किलोग्राम तक होता है। आदिवासी समाज में महुआ के फूलों का उपयोग वस्तुओं के विनिमय के रूप में भी किया जाता है।

महुआ निजी संपत्ति के साथ ही सामुदायिक संसाधन भी है। यह एक ऐसा पेड़ है जो कई बार निजी संपत्ति होकर भी सामुदायिक संसाधन बन जाता है और सामुदायिक संसाधन होकर भी निजी संपत्ति के दायरे में आ जाता है। उदाहरण के लिए जिन लोगों के खेतों में अधिक महुआ के पेड़ हैं और बीनने वाले सीमित सदस्य हैं, वहां महुआ के फूल दूसरे लोग भी बीन सकते हैं। इससे फूल व्यर्थ नहीं होता और इस तरह यह एक सामुदायिक संसाधन बन जाता है। इसके अलावा अक्सर जंगल में महुआ के पेड़ों पर निजी स्वामित्व हो जाता है और यह स्वामित्व पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। जंगल में किसी महुआ के पेड़ पर पहली बार जिसकी नजर पड़ती है, वह उसका हो जाता है।

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में गैर लाभकारी संगठन फाउंडेशन फॉर ईकोलॉजिकल सिक्योरिटी (एफईएस) में कार्यरत प्रद्युमन आचार्य के अनुसार, उन्होंने हाल में देखा कि जंगल में एक आदिवासी की नजर एक महुआ के छोटे से पौधे पर पड़ी तो उसने उसके चारों तरफ कुछ रंगे हुए पत्थर रख दिए। इसका अर्थ यह है कि उसने सबसे पहले उस पौधे को देखा है और इस पर उसका अधिकार हो गया है। पेड़ के बड़ा होने पर उसकी उपज पर उसके परिवार का हक होगा। यह एक अलिखित करार जैसा है जिसका सभी सम्मान करते हैं। इस प्रकार जंगल के पेड़ पर निजी स्वामित्व अन्य किसी पेड़ के मामले में दुर्लभ है।

आदिवासियों और गैर आदिवासियों सभी के लिए महुआ के पेड़ की महत्ता इससे भी समझी जा सकती है कि अक्सर जमीन का सौदा करने के बाद भी उस पर खड़े महुआ के पेड़ का सौदा नहीं किया जाता। जमीन बेचने वाले का इस पर पुश्तैनी हक बना रहता है। यहां तक कि भाइयों के मध्य जमीन का बंटवारा होने के बाद भी महुआ पर सबका अधिकार बना रहता है। महुआ किसी भी प्रकार की सौदेबाजी और बंटवारे से परे है।

सामाजिक कार्यक्रम और यहां तक कि ग्रामसभाओं की बैठकें भी महुआ बीनने के मौसम में अक्सर टल जाती हैं। आदिवासी इस मौसम में अपने रिश्तेदारों के घर भी जाने से बचते हैं। बहुत से स्कूल बच्चों से वीरान हो जाते हैं

नहीं होते शादी-समारोह

मार्च-अप्रैल में फूल बीनने का मौसम शुरू होते ही घर-घर महुआ की गंध से भर उठते हैं। आदिवासी इलाकों में महुआ के पेड़ों के पास से गुजरते हुए एक अलग ही दुनिया का एहसास होता है। गरियाबंद के बोइर गांव में रहने वाले गुलेश्वर ध्रुव के घर में दाखिल होते महुआ के फूलों की हल्की मीठी महक नथुनों में भर जाती है। उनके विशाल आंगन में करीब 40 किलो महुआ के फूल सूख रहे हैं। ये ताजा फूल 2-3 में सूख जाएंगे और भंडारण योग्य हो जाएंगे। वह सुबह-सुबह जंगल और अपने खेत में लगे महुआ के पेड़ों से झरे ताजा महुआ बीनकर लौटे हैं। साइकल के हैंडल में उन्होंने महुआ से भरे दो थैले और पीछे कैरियर पर एक बोरी बांधी हुई है। खेतों में टपकने वाले महुए के फूल को धन मानने वाले गुलेश्वर बताते हैं कि इसे बेचने के लिए उन्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। व्यापारी खुद उनके घर से महुआ खरीद लेते हैं। फूलों के सीजन खत्म होने के बाद जून-जुलाई में फल का सीजन शुरू हो जाता है। हर सीजन में वह फलों से करीब 5-10 किलो बीज इकट्ठा कर लेते हैं, जिनसे तेल निकलता है। गुलेश्वर बताते हैं कि 10 किलो बीज से करीब 2-3 किलो तेल निकल जाता है। गुलेश्वर के अनुसार, ग्रामीण महुआ के इस तेल को खाने में इस्तेमाल करते थे, लेकिन यह इस्तेमाल अब बेहद सीमित रह गया है। लेकिन इसका तेल खांसी, जुकाम और बुखार में अब भी मला जाता है।

पथर्री गांव में अपने चार साल के बेटे संग महुआ फूल बीन रहीं फिंगेश्वरी ध्रुव इसे अपना एटीएम मानती हैं और आपातकाल की स्थिति में फूल बेचकर परिवार की जरूरतें पूरी करती हैं। वह बताती हैं कि आमतौर पर सूखा महुआ तभी बेचती हैं, जब भाव ठीक रहता है। सीजन खत्म होने के बाद उन्हें महुआ का सबसे बेहतर भाव मिलता है। मई-जून में 50 से 55 रुपए प्रति किलो तक हो जाता है, तभी इसे बेचना ज्यादा लाभप्रद है। गुलेश्वर मानते हैं कि सीजन में पूरा क्षेत्र इसे बीनने में व्यस्त हो जाता है, इसलिए लोग इस दौरान शादी व अन्य कार्यक्रम रखने से बचते हैं। सामाजिक कार्यक्रम और यहां तक कि ग्रामसभाओं की बैठकें भी इस दौरान अक्सर टल जाती हैं, क्योंकि महुए से जरूरी इस मौसम में कुछ भी नहीं होता। आदिवासी इस मौसम में अपने रिश्तेदारों के घर भी जाने से बचते हैं। बहुत से स्कूल बच्चों से वीरान हो जाते हैं।

उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में बसे अमाड़ गांव में तेंदु पत्ते को तोड़ना और उसका विक्रय प्रतिबंधित है, इसलिए यहां महुआ का महत्व और बढ़ जाता है। यहां कोई भी वनोपज लाभप्रदता के मामले में महुआ को टक्कर नहीं दे पाती। यहां महुआ बहुत से आदिवासियों को लखपति बनने का पूरा मौका देता है, खासकर उनको जिनके पास दर्जनों पेड़ और इसे बीनने के लिए दर्जनों हाथ हैं। कोर क्षेत्र के एक अन्य गांव करलाझर में रहने वाले करण सिंह नाग कहते हैं कि जिस घर में महुआ होता है, वहां भुखमरी नहीं आती। यह महुआ दवा, भोजन और दारू तक में उपयोगी है। वह बताते हैं कि जिस वक्त भोजन की कमी होती थी, तब महुआ ही काम आता था। हालांकि अब राशन की उपलब्धता ने महुए पर निर्भरता काफी हद तक कम कर दी है। ज्यों-ज्यों महुआ भोजन से दूर हुआ है, त्यों-त्यों बीमारियों ने आदिवासियों को घेरा है।

महुआ कवियों को भी खूब भाया है। बहुत सी कविताएं महुए की महक से रची बची हैं। मसलन, कवियित्री पूनम वासम लिखती हैं, “महुआ का पेड़ जानता है/ महुआ की उम्र कच्ची है/ कच्ची उम्र में टपकते हुए महुए को रोकना संभव नहीं है/ गुरुत्वाकर्षण बल नहीं बल्कि/ धरती का संगीत उसे खींचता है अपनी ओर।”

इसी तरह कवि स्वप्निल श्रीवास्तव अपनी कविता में कहते हैं, “जमीन पर बिखरे हुए पीले महुए के फूल/टाप्स की तरह हैं/ जिन्हें हवा ने पहन लिया है।”

जसिंता केरकेट्टा अपनी कविता “क्यों महुआ तोड़े नहीं जाते पेड़ से” में मां-बेटी का मार्मिक संवाद पेश करती हैं। बेटी जब मां से सवाल करती है कि तुम सारी रात क्यों महुआ के गिरने का इंतजार करती हो? क्यों नहीं पेड़ से ही सारा महुआ तोड़ लेती हो?

मां निरुत्तर करने वाला जवाब देती है, जब वह कहती है, “वे रातभर गर्भ में रहते हैं/ जन्म का जब हो जाता है समय पूरा/ खुद-ब-खुद धरती पर आ गिरते हैं भोर/ ओस में जब वे भीगते हैं/ धरती पर, हम घर ले आते हैं उन्हें उठाकर/ पेड़ जब गुजर रहा हो सारी रात प्रसव पीड़ा से/ बताओ, कैसे डाल हिला दें जोर से?”

(यह स्टोरी प्रॉमिस ऑफ कॉमन्स मीडिया फेलोशिप 2024 के तहत प्रकाशित की गई है)

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