

केंद्र सरकार द्वारा 10 वर्षों यानी 2014-15 से 2025-26 के बीच करीब 2,15,943 हेक्टेयर (हेक्टेयर) वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए डायवर्जन की मंजूरी दी गई। करीब 62 फीसदी डायवर्जन को खनन, जलविद्युत, सिंचाई और सड़क परियोजनाओं के लिए मंजूरी दी गई।
यह जानकारी केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से संसद में उपलब्ध कराए गए आधिकारिक आंकड़ों के विश्लेषण से मिला है। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हाल के वर्षों में वन भूमि डायवर्जन की रफ्तार तेजी से बढ़ी है। 2014-15 से 2018-19 के बीच कुल 74,705.68 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी गई। इसके बाद अगले पांच वर्षों, 2019-20 से 2023-24 के बीच यह आंकड़ा करीब 29 प्रतिशत बढ़कर 96,112.90 हेक्टेयर हो गया। हालांकि, सबसे चिंताजनक रुझान पिछले दो वर्षों में देखने को मिलता है। सिर्फ दो वर्षों 2024-25 और 2025-26 में भारत ने गैर-वन उपयोग के लिए 45,124.64 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को मंजूरी दी है। यह मंजूरी वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 के तहत दी गई। ये आंकड़े पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह की ओर से जुलाई 2026 में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार हैं।
आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जितनी वन भूमि का डायवर्जन पांच साल (2014-15 से 2018-19 ) के दौरान किया गया, उसकी लगभग आधी वनभूमि का डायवर्जन सिर्फ दो वर्षों में मंजूर किया गया। 2014-15 से 2018-19 के पूरे पांच साल के दौरान डायवर्जन के लिए मंजूर की गई कुल 74,705.68 हेक्टेयर वन भूमि के करीब 60 प्रतिशत के बराबर है। वहीं, यह 2019-20 से 2023-24 के पांच साल के दौरान डायवर्जन की गई कुल 96,113 हेक्टेयर वन भूमि का करीब 47 प्रतिशत है।
आंकड़े बताते हैं कि गैर-वन उपयोग के लिए वन भूमि डायवर्जन की दर लगातार बढ़ रही है। इसे हर साल डायवर्जन की गई वन भूमि के औसत से भी समझा जा सकता है।
2014-15 से 2018-19 के बीच हर साल औसतन 14,941 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ, यानी हर दिन करीब 41 हेक्टेयर भूमि का डायवर्जन किया गया। वहीं, 2019-20 से 2023-24 के बीच यह औसत बढकर 19,223 हेक्टेयर प्रति वर्ष, यानी हर दिन करीब 53 हेक्टेयर हो गया। वहीं, हाल के दो वर्षों 2024-25 और 2025-26 में वन भूमि डायवर्जन बढकर औसतन 22,562 हेक्टेयर प्रति वर्ष हो गया, यानी करीब 61 हेक्टेयर प्रतिदिन भूमि डायवर्जन तक पहुंच गया।
राज्य स्तर पर भी ऐसे ही रुझान देखने को मिले हैं। मिसाल के तौर पर, 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2024-25 और 2025-26 के सिर्फ दो वर्षों में वन भूमि डायवर्जन, 2014-15 से 2018-19 के पूरे पांच साल के दौरान डायवर्जन की गई कुल वन भूमि का कम से कम 60 प्रतिशत या उससे अधिक रहा। यह बढ़ोत्तरी पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हिमालयी और पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे अधिक स्पष्ट है।
मसलन, अरुणाचल प्रदेश में सबसे तेज बढ़ोत्तरी में से एक दर्ज की गई। 2024-25 और 2025-26 के बीच राज्य में 6,038.43 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ। यह 2014-15 से 2018-19 के पांच साल के दौरान डायवर्जन की गई 751.21 हेक्टेयर भूमि से आठ गुना से अधिक है और 2019-20 से 2023-24 के दौरान डायवर्जन की गई 8,744.79 हेक्टेयर भूमि का 69 प्रतिशत है।
सिक्किम में यह रुझान और भी चिंताजनक है। सिर्फ दो वर्षों में 778.95 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ। यह 2014-15 से 2018-19 के दौरान डायवर्जन की गई 41.87 हेक्टेयर भूमि से करीब 19 गुना और 2019-20 से 2023-24 के दौरान डायवर्जन की गई 212.56 हेक्टेयर भूमि से करीब 3.7 गुना है।
हिमाचल प्रदेश में 2024-25 और 2025-26 के दौरान 1,295.4 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ। यह 2014-15 से 2018-19 के दौरान हुए कुल वन भूमि डायवर्जन का करीब 92 प्रतिशत और 2019-20 से 2023-24 के दौरान हुए कुल डायवर्जन का करीब 63 प्रतिशत है।
आंकड़े बताते हैं कि हाल के एक साल में भी वन भूमि डायवर्जन बढ़ा है। 2025-26 में अकेले भारत ने 26,858 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन गतिविधियों के लिए डायवर्ट करने की मंजूरी दी। यह 2024-25 की तुलना में सिर्फ 47 प्रतिशत अधिक नहीं है, बल्कि पिछले 12 वर्षों में दर्ज सबसे अधिक वन भूमि डायवर्जन भी है।
वहीं, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मिजोरम, नगालैंड और सिक्किम में भी 2014-15 के बाद से 2025-26 में वन भूमि डायवर्जन का सबसे अधिक आंकड़ा दर्ज किया गया।
22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2025-26 के दौरान डायवर्ट की गई वन भूमि 2024-25 की तुलना में अधिक थी। इनमें चार राज्य, मध्य प्रदेश (+116 प्रतिशत), अरुणाचल प्रदेश (+43 प्रतिशत), झारखंड (+82 प्रतिशत) और छत्तीसगढ (+94 प्रतिशत) शामिल हैं। अकेले ये चार राज्य 2025-26 में गैर-वन उपयोग के लिए मंजूर कुल वन भूमि का 57 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रखते हैं।
हाल के ये रुझान दिखाते हैं कि विशेषज्ञों की चेतावनी के अनुसार वन भूमि को गैर-वन उपयोग में बदलने की दर लगातार बढ़ रही है। भारत के वन प्रशासन के ढांचे में हाल में किए गए बदलाव इस तेजी के पीछे एक कारण हो सकते हैं। वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 ने वन की कानूनी परिभाषा को सीमित किया और कुछ रणनीतिक रैखिक परियोजनाओं को वन मंजूरी की आवश्यकताओं से बाहर कर दिया।
31 अगस्त, 2025 को अधिसूचित किया गया वन (संरक्षण एवं संवर्धन) संशोधन नियम, 2025 रक्षा, रणनीतिक और जनहित वाली कुछ परियोजनाओं को मंजूरी के लिए ऑफलाइन आवेदन करने की अनुमति भी देता है। इसके परिणामस्वरूप ऐसी परियोजनाएं राज्य सरकार की मंजूरी प्रक्रिया को दरकिनार कर सकती हैं।
अगर मौजूदा रफ्तार जारी रहती है, तो 2024-25 से 2028-29 के पांच साल के दौरान वन भूमि डायवर्जन 1,10,000 हेक्टेयर से अधिक हो सकता है। यह 2014-15 से 2018-19 के दौरान गैर-वन उपयोग के लिए डायवर्ट की गई कुल वन भूमि से करीब 50 प्रतिशत अधिक और 2019-20 से 2023-24 के दौरान डायवर्ट की गई वन भूमि से करीब 17 प्रतिशत अधिक हो सकता है।