छह माह से तेंदूपत्ता संग्रह अनुमति लंबित, आदिवासी परिवारों को आधी आमदनी पर गुजारा करने की नौबत

इस बार मंडला जिले के 21 वन स्थाई समिति को जिलाधीश कार्यालय द्वारा संग्रहण की अनुमति ही नहीं मिली
फाइल फोटो: सीएसई
फाइल फोटो: सीएसई
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मध्य प्रदेश के मंडला जिले के लगभग दो हजार आदिवासी परिवारों को तेंदूपत्ता संग्रहण की अनुमति पिछले छह माह से अब तक नहीं मिली है। संग्रहण की अनुमति नहीं मिलने से आदिवासी परिवारों को इस बार तेंदूपत्ता संग्रह का आधा ही पैसा ही मिल पाएगा।

मध्य प्रदेश के मंडला जिले में तेंदुपत्ता संग्रहण कार्य अब अपने अंतिम दौर में है यानी कुछ ही दिनों में अधिकांश तेंदूपत्ता संग्रहण आदिवासी समितियों को जून के मध्य तक उनके लघुवनोपज का पैसा मिल जाएगा

लेकिन इस बार मंडला जिले के ही 21 वन स्थाई समिति को जिलाधीश कार्यालय द्वारा संग्रहण की अनुमति ही नहीं मिली, ऐसे में इन 21 वन समितियों से जुड़े लगभग दो हजार आदिवासी परिवार प्रभावित हुए हैं।

इस संबंध में जनपद पंचायत मंडला क्षेत्र क्रमांक 14 के सदस्य हरेंद्र कुमार मसराम ने डाउन टू अर्थ को बताया कि गत 15 दिसंबर 2026 को ही अपनी 33 वन समितियों ( मंडला की पश्चिम एवं पूर्व सामान्य वन मंडल क्षेत्र की ग्राम सभा ) ने तेंदूपत्ता संग्रहण एवं वितरण को लेकर प्रस्ताव पारित किया था और इन प्रस्तावों को जनपद पंचायत मण्डला द्वारा भी अनुमोदित कर संबंधित विभाग को भेजा दिया था।

वह बताते हैं कि कुल 33 प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए, जिनमें से केवल 12 को स्वीकृति दी गई जबकि 20 प्रस्तावों को निरस्त कर दिया गया। जिन 20 प्रस्तावों को खारिज किया गया, उसके कारणों की जानकारी पिछले छह माह से ग्राम सभाओं या पेसा समितियों को नहीं दी गई है।

वह कहते हैं कि इस पूरे मामले को लेकर कलेक्टर मण्डला को चार बार शिकायती पत्र सौंपा जा चुका है और दो बार जिले की जन सुनवाई में भी सभी वन समतियों ने अपने बात रखी लेकिन आज तक उसका न कारण बताया गया और न संगहण की अनुमति दी गई।

ऐसे में अब इन 20 वन समितियों के सामने रोजीरोटी का संकट खड़ा हो गया है क्योंकि इनको दूसरी वन समितियां के मुकाबले आधा ही पैसा मिलेगा क्योंकि जिन वन समितियों को सीधे संग्रहण का मौका नहीं मिलता, उन्हें मजबूरी में वन विभाग के तहत तेंदूपत्ता संग्रह कार्य करना पड़ता है।

विभाग के साथ संग्रह करने से एक गड्डी ( प्रति गड्डी में 50 तेंदुपत्ता ) का केवल साढ़े चार रुपए ही मिलता है जबकि सीधे संग्रहण कार्य से ठेकेदार आठ से नौ रुपए प्रति गड्डी देता है और इसके अलावा ठेकेदार संग्रहकर्ताओं को लाभांश भी देता है जबकि वन विभाग के लिए जब संग्रह किया जाता है तो वह लाभांश नहीं देता है।

हरेंद्र बताते हैं कि दिसंबर में जब उन्होंने सभी यानी 33 तेंदूपत्ता संग्रहण समितियों की ओर कलेक्टर को प्रस्ताव सौंपा था तब ही केवल 12 को अनुमति दी गई और 21 को नहीं दी गई, ऐसे में हमने तुरंत शिकायती पत्र सौंपा लेकिन कुछ ही दिनों में जिन कलेक्टर महोदय को पत्र सौंपा था, उनका तबादला हो गया और नए आए कलेक्टर को फिर से हमने अपनी वन समितियों की ओर से शिकायती पत्र सौंपा तब उन्होंने कहा कि मैं इस मामले को समझ कर आपको जवाब दूंगा लेकिन आज छह माह होने को आए कलेक्टर अब तक इस मामले को समझ ही रहे हैं।

ध्यान रहे कि केंद्रीय आदिवासी कल्याण मंत्रालय ओर से 12 जुलाई 2012 को सभी राज्यों के मुख्य सचिव के लिए वन अधिकार कानून क्रियान्वयन के लिए निर्देश जारी किया गया था। इसमें तेंदूपत्ता संग्रहण और विपणन के बारे में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कई राज्यों में लघु वन उपजों विशेषकर कीमती वनोपज जैसे तेंदूपत्ता के व्यपार में वन निगमों का एकाधिकार इस अधिनियम की प्रवृत्ति के विरुद्ध है और इसे दूर किया जाए।

निर्देश में यह भी कहा गया था कि राज्य सरकारें न केवल वनों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति व अन्य वन निवासियों को लघु वन उपजों पर निर्बाध अधिकारों को प्रदान करने में सहयोगकर्ता की भूमिका निभाएं बल्कि लघु वनपजों का उचित मूल्य दिलाने में भी सहयोग करें। हरेंद्र कहते हैं कि केंद्र सरकार के इस निर्देश का यहां पर खुला उल्लंघन किया जा रहा है और विभाग स्वयं ही संग्रहण कार्य में लगा हुआ है।  

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