

इकराम बारेला और अन्य लोगों के पास उनकी जमीनों के मालिकाना हक का कोई दस्तावेज नहीं है। लेकिन उनके पास मध्य प्रदेश सरकार की एक पावती जरूर है। यह पावती बताती है कि उन्होंने वन अधिकार कानून के तहत अपनी जमीन पर अधिकार की मान्यता के लिए दावा किया है। उनके दावे की जांच आगे बढ़ चुकी है और अंतिम फैसला सीहोर के कलेक्टर की अध्यक्षता वाली जिला वन अधिकार समिति को करना है।
इस तरह इकराम की जमीन पर अधिकार का फैसला जिस प्रशासनिक व्यवस्था को करना था, उसी जिले में बेदखली की कार्रवाई हो गई। अब सबसे जरूरी सवाल यह है कि क्या कार्रवाई से पहले इन दावों की स्थिति जांची गई थी? इस सवाल का जवाब इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मध्य प्रदेश एफआरए/वनमित्र पोर्टल कोई निजी संस्था नहीं चलाती। यह मध्य प्रदेश सरकार की अपनी व्यवस्था है।
अभी उनके दावों का अंतिम निराकरण नहीं हुआ है लेकिन इकराम और उनके जैसे बारेला आदिवासी परिवारों की जमीन पर वन विकास निगम का बुलडोजर जरूर चल गया। उनके खेतों में खड़ी फसलें नष्ट की गईं और बलात बेदखल करने की धमकी भी दी गई। जबकि अधिकार कानून, 2006 की धारा 4 (5) स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी दावेदार के दावे के अंतिम निराकरण से पहले यथास्थिति को बनाए रखा जाएगा। उन्हें वन भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता।
इस गांव का भूगोल दिलचस्प है। अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरमेंट द्वारा विकसित सीएफआर वेब जीआईएस पोर्टल के अनुसार कोसमी का कुल क्षेत्रफल 2,230 हेक्टेयर है। इसमें 1,621 हेक्टेयर वन क्षेत्र दर्ज है, जबकि 509 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र है। यानी गांव के कुल भूभाग का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा जंगल है।
पोर्टल पर उपलब्ध नक्शे में गांव की राजस्व सीमा और वन विभाग के कम्पार्टमेंट एक-दूसरे के भीतर दिखाई देते हैं। वन क्षेत्रों में बसे अनेक गांवों की यही स्थिति है। राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज गांव की जमीन का बड़ा हिस्सा वनभूमि भी हो सकता है।
इसलिए यहां वनभूमि और गांव को दो बिल्कुल अलग इकाइयों की तरह नहीं देखा जा सकता। यह समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वन विभाग और वन विकास निगम अक्सर अपने रिकॉर्ड में दर्ज जमीन के आधार पर कब्जे का सवाल उठाते हैं, जबकि वन अधिकार कानून उसी जमीन पर बसे और खेती करने वाले पात्र समुदायों के अधिकारों की मान्यता का रास्ता देता है। कोसमी में यही दोनों व्यवस्थाएं आमने-सामने आ गई हैं।
वनाधिकार कानून के तहत व्यक्तिगत वनाधिकारों की मान्यता के लिए 13 दिसंबर 2005 एक महत्वपूर्ण तारीख है। पात्रता की अन्य शर्तों के साथ यह देखना होता है कि संबंधित वनभूमि पर कब्जा इस तारीख से पहले का है या नहीं।
कोसमी के ग्रामीणों के पास वन विभाग द्वारा की गई पुरानी कार्रवाइयों से संबंधित दस्तावेज हैं। इनमें कुछ रिकॉर्ड वर्ष 2006 और उसके बाद के हैं, लेकिन 2005 से पहले काबिज होने के प्रमाण सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं हैं। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास कुछ दस्तावेज हैं जो फिलहाल मिल नहीं रहे हैं। इस बीच कलेक्टर की जांच में गूगल अर्थ की तस्वीरों का इस्तेमाल करके वर्ष 2022 से कब्जे की बात कही गई है।
मध्य प्रदेश वन अधिकार पोर्टल में कोसमी की 2005 की उपग्रह छायाचित्र उपलब्ध नहीं है। यदि वन विभाग को सच में ऐसे मुद्दे सुलझाकर वन संरक्षण और वनों में गुणात्मक वृद्धि को बिना विवादों के आगे बढ़ाना है तो खुले दिल से व्यक्तिगत वन अधिकारों के लंबित दावों का निराकरण करने हेतु आवश्यक दस्तावेज सार्वजनिक करने चाहिए न कि उन्हें लोगों से छिपाकर रखना चाहिए।
वन विभाग की कार्य योजनाओं में अतिक्रमण सूचियां सम्मिलित होती हैं। पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में 2005 के पूर्व के वर्किंग प्लान और अतिक्रमण सूचियां वेबसाइट पर मुहैया कराने का काम शुरू हो गया है। प्रशासन सहित वन विभाग की कानूनन जिम्मेदारी है कि ऐसे दस्तावेजों की प्रतियां ग्रामसभाओं तथा पंचायतों को सुपुर्द की जाए।
हालांकि वन अधिकार नियमों में सैटेलाइट तस्वीरें प्रमाण का एक स्वीकार्य माध्यम हैं, लेकिन यह एकमात्र प्रमाण नहीं है। पुराने सरकारी रिकॉर्ड, वन विभाग की कार्रवाइयों के दस्तावेज़, ज़मीन पर मौजूद कुएं और अन्य संरचनाएं तथा बुजुर्गों के बयान भी प्रमाण हो उतने ही महत्वपूर्ण प्रमाण माने गए हैं। दावों की जांच में एक से अधिक प्रकार के साक्ष्य देखे जाते हैं।
कानून की धारा 4(5) का महत्व इसी संदर्भ में है। यह पात्र वनवासियों को अधिकारों की मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक बेदखली से सुरक्षा देती है। इसीलिए दावा प्रस्तुत करना अधिकार मिल जाने के बराबर नहीं है, लेकिन दावा लंबित होने का अर्थ यह भी नहीं कि प्रशासन उसकी अनदेखी करके बेदखली कर सकता है। कोसमी में विवाद का कानूनी सिरा यहीं है।
वन विकास निगम आखिर किस अधिकार से इस कार्यवाई को अंजाम दे रहा है?
वन विकास निगम की स्थापना 24 जुलाई 1975 को कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत हुई थी। इसे वन क्षेत्रों में व्यावसायिक वृक्षारोपण और वन उत्पादन से जुड़े काम सौंपे गए। इसके घोषित उद्देश्यों में में जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधारना भी शामिल है।
जांच रिपोर्ट में बतलाया गया है कि कोसमी की 186. 960 हेक्टेयर वन भूमि सन 2020 सामान्य वन मण्डल से वन विकास निगम को हस्तांतरित की गयी थी जिस पर निगम ने 135 हेक्टेयर वन भूमि पर 3,37,500 सागौन के पौधे लगाए थे।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। किसी सरकारी कंपनी को वनभूमि के प्रबंधन का जिम्मा सौंपना एक ‘प्रशासनिक व्यवस्था’ है। उस जमीन पर वन अधिकार कानून के तहत पात्र समुदायों के अधिकारों की मान्यता दूसरी ‘वैधानिक प्रक्रिया’ है।
वन विकास निगम का गठन वैध है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके प्रबंधन में आने वाली वन भूमि, वन अधिकार कानून के दायरे से बाहर हो गई। वन अधिकार कानून में वनभूमि की व्यापक परिभाषा दी गई है। इसलिए निगम को किसी वन क्षेत्र का प्रबंधन सौंपने भर से वहाँ के पात्र वनवासियों के अधिकार समाप्त नहीं होते।
निगम अपनी जमीन पर अतिक्रमण होने का आरोप लगा सकता है। लेकिन वन अधिकार कानून के तहत प्रस्तुत दावे का अंतिम निर्णय निगम के अधिकारियों को नहीं, कानून में निर्धारित समितियों को करना है।
कोसमी में इसी अंतर को समझना जरूरी है। वरना किसी वन क्षेत्र को निगम के हवाले करना वहाँ रहने वाले समुदायों के अधिकारों के प्रश्न को पीछे धकेलने का एक प्रशासनिक रास्ता बन सकता है।