जलवायु संकट से लड़खड़ाया लाल सोना: झारखंड-बंगाल में लाख उत्पादन धड़ाम, आदिवासी आजीविका पर गहरा असर

वैश्विक बाजार में मजबूत मांग और ऊंची कीमतों के बावजूद भारत का लाख उत्पादन संकट से उबर नहीं पा रहा। जलवायु की बढ़ती अनिश्चितता और नीतियां इस वन-आधारित अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ रही
झारखंड के उलिहातू गांव में पेड़ की  छालों से लाख की छंटाई करने वाले श्रमिकों को प्रतिदिन 100 रुपए तक  की मजदूरी दी जाती है
झारखंड के उलिहातू गांव में पेड़ की छालों से लाख की छंटाई करने वाले श्रमिकों को प्रतिदिन 100 रुपए तक की मजदूरी दी जाती है(फोटो : विकास चौधरी / सीएसई)
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लाख उत्पादन के सिरमौर झारखंड के खूंटी जिले में रनिया ब्लॉक के टांगेरकला में महावीर साहू बेतरतीब मौसम से लगातार हार रहे हैं। वह कहते हैं, “पिछले साल खराब मौसम के कारण मेरी 50 फीसदी कच्ची रंगीनी लाख खत्म हो गई। बेर (जिजिफस मौरिटियाना) के पेड़ों पर हमने अक्टूबर-नवंबर के दौरान लाख के बीज (ब्रूड लाख) चढ़ाए थे, लेकिन अत्यधिक धुंध और कुहासे के कारण लाख कीटों का विकास प्रभावित हुआ और करीब तीन लाख रुपये का नुकसान हुआ।” खराब मौसम से जुड़ा महावीर साहू का अनुभव लगातार गाढ़ा और कड़वा होता जा रहा है। वह तीन अन्य किसानों के साथ मिलकर करीब 100 से अधिक बेर के पेड़ों को किराए पर लेकर साझा रूप से लाख की खेती और उत्पादन का काम करते हैं।

साहू डाउन टू अर्थ से बताते हैं, “लाख की खेती सट्टे की तरह है। मौसम ठीक रहा तो सब बढ़िया रहता है, लेकिन मौसम खराब हुआ तो लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है।” वह बताते हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा नुकसान बेर के पेड़ों पर लगाई जाने वाली रंगीनी लाख में हुआ है। वह अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, “कई बेर के पेड़ों में पांच किलो ब्रूड लाख लगाने के बाद भी एक किलो तक कच्ची लाख का उत्पादन नहीं हो पाया, जबकि पहले इतनी ही मात्रा के ब्रूड लाख से अधिकतम 50 किलो तक कच्ची रंगीनी लाख प्राप्त हो जाती थी।” वह अपने नुकसान का गणित समझाते हैं, “हम तीन साझेदारों ने लाख से कुल 10 लाख रुपये कमाने का अनुमान लगाया था, लेकिन हमारे हाथों में केवल दो-दो लाख रुपये ही आए, जो लागत से भी कम थे। ऐसे नुकसान हमें चुपचाप सह लेने पड़ते हैं।”

बेर और पलाश दोनों पेड़ों पर लगाई जाने वाली रंगीनी लाख की खेती मुख्य रूप से दो फसल चक्रों में होती है। पहली बैसाखी जिसमें अक्टूबर-नवंबर के दौरान ब्रूड लाख चढ़ाया जाता है और कटाई जून-जुलाई में होती है। दूसरी है कटकी फसल, जिसमें जून-जुलाई में ब्रूड लाख चढ़ाया जाता है और अक्टूबर-नवंबर में कटाई होती है। वहीं, कुसुम (स्लाइकेरा ओलियोसा) के पेड़ों पर लगाई जाने वाली कुसुमी लाख भी मौसम की मार से प्रभावित हो रही है। कुसुमी लाख भी लाख कीट (केरिया लक्का) की एक प्रमुख रेस है, जो अपने हल्के रंग और कुसुम पेड़ पर उत्पादन के लिए जानी जाती है। इसकी खेती के लिए सामान्य तौर पर जनवरी-फरवरी के दौरान ब्रूड लाख चढ़ाया जाता है और जून-जुलाई में इसकी कटाई होती है। 2025 में जून-जुलाई में कटाई के समय अत्यधिक वर्षा के कारण कुसुमी लाख की फसल को भारी नुकसान हुआ। समय पर दवा का छिड़काव नहीं हो पाया और लाख के कीटों की मृत्यु के साथ-साथ फफूंद का प्रकोप भी बढ़ गया।

रनिया ब्लॉक के ही किसान राजेश टिर्के डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “अत्यधिक वर्षा के कारण पिछले वर्ष कुसुम के पेड़ों की डालियां ठीक से सूख नहीं पाईं, जिससे पेड़ों पर कीटों और फफूंद का हमला बढ़ गया। इसके चलते कई किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।” पारंपरिक ज्ञान के बलबूते आदिवासी समाज प्रचलित भारतीय लाख कीट केरिया लाका की रंगीनी और कुसुमी दो अहम जैविक नस्लों की खेती करता रहा है। साहू बताते हैं, इन दोनों नस्लों के मेजबान पेड़, रंग, गुणवत्ता, उत्पादन चक्र और बाजार मूल्य में काफी अंतर होता है। रंगीनी लाख आमतौर पर पलाश, बेर, खैर जैसे पेड़ों पर ज्यादा पनपती है। इसका रंग अपेक्षाकृत गहरा लाल होता है। ऐसा माना जाता है कि यह ज्यादा कठोर परिस्थितियां सह लेती है और उत्पादन भी अक्सर अधिक देती है लेकिन अभी यह अनुभव बदल रहा है। कुसुमी लाख का रंग हल्का होता और इसकी गुणवत्ता बेहतर मानी जाती है। इससे बनने वाली शेलैक अधिक चमकदार और महंगी होती है, इसलिए बाजार में इसका दाम अक्सर रंगीनी से ज्यादा मिलता है। लेकिन यह नस्ल ज्यादा संवेदनशील होती है।

झारखंड में साइड इनकम की तरह लाख की खेती करने वाले किसान कच्ची लाख को नजदीक के हाट बाजारों में बेचते हैं। डाउन टू अर्थ ने लाख की खरीद-बिक्री करने वाले कई हाट बाजारों का दौरा किया। खूंटी के एक हाट बाजार में मिले कारोबारी रवि गुप्ता बताते हैं कि वह 1000 रुपए किलो के हिसाब से छोटी खरीद करते हैं और छोटी प्रोसेसिंग यूनिट्स को इसे बेचते हैं, यह प्रोसेसिंग यूनिट्स कॉस्मेटिक्स और चूड़ी आदि बनाती है, उत्पादन घटने से जिनकी संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है।

बंगाल में 88 फीसदी गिरा उत्पादन

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के मुताबिक यह उद्योग 11 राज्यों के 30 से 40 लाख आदिवासी परिवारों की रोजी-रोटी का आधार भी है। लेकिन प्रमुख लाख उत्पादक राज्यों की तस्वीर उदास करने वाली है। लाख पर शोध और अध्ययन करने वाले रांची स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सेकेंडरी एग्रीकल्चर (आईसीएआर-एनआईएसए) से डाउन टू अर्थ को मिले ताजा आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड लंबे समय से देश का सबसे बड़ा लाख उत्पादक राज्य रहा है। 2015-16 से 2020-21 के बीच देश के कुल लाख उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 54 फीसदी रही। हालांकि, बीते 10 वर्षों के उत्पादन आंकड़ों की तस्वीर देखें तो यह सफर रोलर कोस्टर जैसा रहा है। डाउन टू अर्थ को मिले आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में लाख का उत्पादन 2015-16 में 9,950 टन था, जो 2023-24 में घटकर 6,523 टन रह गया। यह 34.4 फीसदी की गिरावट थी। यदि 2024-25 से तुलना करें तो उत्पादन 7,980 टन रहा, यानी 2015-16 की तुलना में करीब 20 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई। लेकिन यह औसत गिरावट असली झटके को छिपा देती है। बीच के वर्षों में संकट कहीं अधिक गहरा था। 2020-21 में 11,598 टन के सर्वोच्च उत्पादन से गिरकर 2023-24 में उत्पादन 6,523 टन रह गया, यानी तीन वर्षों में लगभग 44 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई।

भारत में पैदा किए गए लाख की मांग दुनियाभर में है। उत्पादन में बड़ी कमी के बावजूद वर्ष 2024-25 में भारत ने 154.44 मिलियन डॉलर का लाख निर्यात किया, जिसका निर्यात मूल्य करीब 13 हजार करोड़ रुपए का है

वहीं, इस गिरावट में सबसे दर्दनाक पहलू पश्चिम बंगाल का है। 2015-16 में यहां लाख का उत्पादन 582 टन था, जो बढ़ते हुए 2020-21 में 1,207 टन के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा। लेकिन इसके बाद उत्पादन में तेज गिरावट आई। 2022-23 में यह घटकर मात्र 150 टन रह गया, यानी अपने सर्वोच्च स्तर से लगभग 88 फीसदी और 2015-16 के स्तर से 74 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई। 2024-25 में मामूली सुधार के बाद उत्पादन 300 टन रहा, जो 2015-16 की तुलना में अभी भी करीब 48 फीसदी कम है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मानसून के बदलते पैटर्न, बढ़ते तापमान और मौसम की चरम घटनाएं इस गिरावट के संभावित कारणों में शामिल हैं।

राष्ट्रीय तस्वीर भी यही कहानी दोहराती है। 2015-16 में देश का कुल उत्पादन 18,746 टन था जो 2024-25 में 17,061 टन है, यानी नौ वर्षों में महज नौ फीसदी की गिरावट, जो सुनने में मामूली लगती है। लेकिन इसी बीच 2020-21 में उत्पादन 21,590 टन के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा और फिर 2023-24 में 13,531 टन तक धंस गया। यानी तीन वर्षों में ही 37 फीसदी की तीव्र गिरावट दर्ज हुई। 2024-25 में आंशिक सुधार हुआ है, लेकिन यह सर्वोच्च स्तर से अभी भी 21 फीसदी नीचे है। यह स्थिरता नहीं बल्कि लड़खड़ाती हुई एक तस्वीर है। यदि बीते नौ वर्षों के आंकड़ों को गौर से देखें तो साल 2020-21 में देश का कुल लाख उत्पादन 21,590 टन के सर्वोच्च स्तर पर था। लेकिन ठीक अगले वर्ष 2021-22 में यह एक ही झटके में गिरकर 14,978 टन रह गया, यानी एक वर्ष में 30.6 फीसदी की तीव्र गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट किसी एक राज्य में नहीं, बल्कि एक साथ झारखंड (11,598 से घटकर 8,398 टन), पश्चिम बंगाल (1,207 से घटकर 306 टन) और ओडिशा (851 से घटकर 295 टन) तीनों प्रमुख उत्पादक राज्यों में दर्ज की गई (देखें,पृष्ठ 43,उतार-चढ़ाव)।

विचित्र विरोधाभास

लाख उत्पादन संकट के बीच बाजार की तस्वीर एक विचित्र विरोधाभास प्रस्तुत करती है। एक ओर भारत में लाख उत्पादन पिछले एक दशक में अत्यधिक उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए दीर्घकालीन स्तर पर गिरावट का रुझान दिखाता है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसके निर्यात से होने वाली आय अभूतपूर्व रूप से बढ़ी है। वर्ष 2013-14 में भारत ने 8,158 मीट्रिक टन शेलैक और लाख-आधारित उत्पादों का निर्यात किया, जिससे 17.81 मिलियन अमेरिकी डॉलर की आय हुई। वर्ष 2024-25 तक निर्यात मात्रा बढ़कर 12,858 मीट्रिक टन और निर्यात आय 154.44 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई। यानी 11 वर्षों में निर्यात मात्रा में लगभग 58 प्रतिशत, जबकि निर्यात आय में लगभग 767 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई।

इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू प्रति टन निर्यात मूल्य में आया उछाल है। वर्ष 2013-14 में एक टन शेलैक और लाख-आधारित उत्पादों का औसत निर्यात मूल्य लगभग 2,183 अमेरिकी डॉलर था, जो 2024-25 में बढ़कर लगभग 12,010 अमेरिकी डॉलर प्रति टन हो गया। अर्थात एक दशक में प्रति टन औसत निर्यात मूल्य लगभग 5.5 गुना बढ़ गया। यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय लाख और उससे बने उत्पादों का मूल्य निर्यात मात्रा की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ा है।

रांची स्थित एनआईएसए के निदेशक अभिजीत कर कहते हैं, “आज दुनिया में लाख की मांग सिर्फ चूड़ी या पॉलिश तक सीमित नहीं है। फार्मास्यूटिकल, न्यूट्रास्यूटिकल, कॉस्मेटिक, खाद्य प्रसंस्करण और रक्षा उद्योगों में भी इसकी बड़ी जरूरत है।” वह आगे कहते हैं, “दुनिया में लाख की मांग आज उत्पादन से पांच-छह गुना अधिक है, लेकिन हम उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं।”

अवसर तलाश रहे दक्षिण एशियाई देश

आईसीएआर के एक 2013 के अध्ययन के मुताबिक देश में लाख की प्रोसेसिंग करने वाली करीब 150 प्रोसेसिंग यूनिट्स मौजूद थीं, फिलहाल इनमें से कई स्थानीय स्तर पर कच्चा माल न उपलब्ध होने के कारण बंद हो चुकी हैं। जो यूनिट्स बची हैं वह अपनी आपूर्ति के लिए दक्षिण एशियाई मुल्कों पर निर्भर हो रही हैं।

झारखंड में लाख की प्रोसेसिंग करने वाली यूनिट जगदंबा लाख फैक्ट्री के संचालक हर्षित सारोगी डाउन टू अर्थ से बताते हैं, “भारत में उत्पादन बहुत ही कम हो गया है और हमें आपूर्ति के लिए कच्चा माल आयात करना पड़ रहा है। वह बताते हैं इंडोनेशिया और थाइलैंड से वह लगातार लाख प्रोसेसिंग के लिए मंगा रहे हैं।”

अभिजीत कर इस समस्या को लेकर कहते हैं कि लाख पैदा करने वाले दो प्रमुख कीट हैं, जिनका नाम है केरिया लक्का और केरिया चिनेंसिस। भारत के पास बेहतर गुणवत्ता देने वाली प्रजाति केरिया लक्का है, जिसका प्राकृतिक फायदा मौजूद है।” “इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे देश लाख उत्पादन बढ़ाने के लिए विशेष कार्यक्रम चला रहे हैं, लेकिन वहां की गुणवत्ता भारत जैसी नहीं है।”

वह आगे कहते हैं, “दुनिया गुणवत्ता और मात्रा दोनों के लिए भारत की तरफ देख रही है, लेकिन हमारी तरफ से वैसी प्रतिक्रिया नहीं दिख रही।” वह चेताते हैं कि “अगर यही स्थिति रही तो आने वाले वर्षों में दुनिया थाईलैंड और इंडोनेशिया की तरफ शिफ्ट हो जाएगी।” “भारत के कई पुराने प्रोसेसर अब दूसरे देशों से लाख मंगाकर प्रोसेस कर रहे हैं, या खुद दूसरे देशों में जाकर काम करने लगे हैं।” कर के मुताबिक, “हम धीरे-धीरे उस प्राकृतिक बढ़त को खो रहे हैं, जो भारत के पास हमेशा से थी।”

जलवायु संकट

लाख उत्पादन केवल एक कृषि गतिविधि नहीं, बल्कि लाखों वन-आधारित परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। सरकारी आंकड़े और वैज्ञानिक अध्ययन संकेत देते हैं कि बदलती जलवायु परिस्थितियां लाख उत्पादन में आई गिरावट के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। तापमान में बदलाव, वर्षा के अनिश्चित पैटर्न, अत्यधिक मौसम घटनाएं और कीट-परजीवी संबंधों में बदलाव लाख कीट (केरिया लक्का) के जीवन चक्र और उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं।

आईसीएआर के जर्नल ऑफ एग्रोमेट्रोलॉजी में प्रकाशित शोध “क्लाइमेट चेंज: इफेक्ट ऑफ वेदर पैरामीटर्स ऑन प्रोडक्शन ऑफ समर सीजन क्रॉप ऑफ रंगीनी स्ट्रेन ऑफ इंडियन लाख इंसेक्ट, केरिया लक्का (केर) एट रांची, झारखंड” में झारखंड में रंगीनी लाख की ग्रीष्मकालीन फसल और मौसम मानकों के बीच संबंधों का अध्ययन किया गया है। शोध में पाया गया कि उत्पादन में आई गिरावट तापमान और वर्षा जैसे जलवायु मानकों में आए दीर्घकालीन और अल्पकालीन बदलावों से जुड़ी हुई है।

इस अध्ययन में रांची क्षेत्र के 1984 के बाद के तापमान और वर्षा आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि अगस्त महीने के अधिकतम तापमान में लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई, जबकि न्यूनतम तापमान में लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस की कमी दर्ज की गई। अगस्त-सितंबर का समय लाख कीट के यौन परिपक्वता और प्रजनन चक्र के लिए महत्वपूर्ण होता है, इसलिए तापमान में ऐसे बदलाव कीटों के विकास और उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं।

लाख कीट के जीव-विज्ञान पर मौसम के प्रभाव को लेकर पहले भी अध्ययन हुए हैं। रांची स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ नैचुरल रेजिन एंड गम्स (आईआईएनआरजी) के पूर्व निदेशक आर. रमानी ने अपने शोध “लाख इंसेक्ट्स: इंपैक्ट ऑफ क्लाइमेट चेंज” में बताया कि तापमान में वृद्धि लाख कीटों की मृत्यु दर, प्रजनन क्षमता और जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है। शोध के अनुसार, तापमान तनाव की स्थिति में कीटों के प्राकृतिक संतुलन और लिंग अनुपात में बदलाव आ सकता है, जिसका असर लाख उत्पादन पर पड़ता है क्योंकि लाख का प्रमुख स्राव मादा कीट करती हैं।

मौसम की चरम स्थितियों का असर उत्पादन पर किस तरह पड़ता है, इसका उदाहरण पुराने अध्ययनों में भी मिलता है। शोधों में पाया गया कि 1988-89 में शीतकाल के दौरान केवल 2.6 मिलीमीटर वर्षा की स्थिति में लाख उत्पादन में 26.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई, जबकि 1997-98 में अत्यधिक वर्षा (304 मिलीमीटर) के साथ उत्पादन में 57.39 प्रतिशत की कमी आई। ये उदाहरण बताते हैं कि अत्यधिक सूखा या अत्यधिक नमी दोनों ही लाख उत्पादन के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।

हाल के अध्ययनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि मौसम केवल लाख कीट को ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े परजीवियों और प्राकृतिक शत्रुओं को भी प्रभावित करता है। वर्ष 2023 में जर्नल ऑफ एग्रोमेट्रोलॉजी में प्रकाशित शोध “वेदर बेस्ड फोरकास्टिंग मॉडल फॉर इमर्जेन्स ऑफ एप्रोस्टोसेटस परप्यूरियस (कैमरॉन) -अ पैरासिटॉइड ऑफ लैक इंसेक्ट, केरिया लक्का (केर)” में 2011-12 से 2020-21 तक रंगीनी ग्रीष्मकालीन (बैसाखी) लाख फसल के दौरान मौसम कारकों और लाख कीट के प्रमुख परजीवी एप्रोस्टोसेटस परप्यूरियस की आबादी के संबंधों का अध्ययन किया गया (देखें, पृष्ठ 42, लाख में बदलाव के संकेत)। इस शोध के अनुसार, मौसम में बदलाव परजीवी कीटों की आबादी और उनकी गतिविधियों को प्रभावित करता है। इसका परिणाम यह होता है कि लाख कीट एक ओर मौसमीय तनाव का सामना करता है, वहीं दूसरी ओर उसके प्राकृतिक शत्रुओं का दबाव भी बढ़ सकता है। यानी बदलता मौसम लाख उत्पादन पर दोहरी मार डाल सकता है।

खूंटी जिले में किसानों के अनुभव भी इन वैज्ञानिक निष्कर्षों से जुड़ते दिखाई देते हैं। टांगेरकला और आसपास के गांवों के किसानों का कहना है कि मौसम में बदलाव के कारण पेड़ों की स्थिति खराब हो रही है और लाख उत्पादन प्रभावित हो रहा है। किसान जगा मुंडा बताते हैं कि पहले वर्षा का पैटर्न अलग था, लेकिन अब अतिवृष्टि जैसी घटनाओं से पेड़ों और लाख दोनों पर असर पड़ रहा है। उनका कहना है कि कई किसानों पर अब छह महीने के भीतर दो बार कीटनाशक और फफूंदनाशक के छिड़काव का अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है, जबकि पहले इसकी आवश्यकता कम पड़ती थी।

लाख उत्पादन की दीर्घकालीन स्थिरता के लिए जैव विविधता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित शोध “जेनेटिक डायवर्सिटी इन लैक रेजिन-सीक्रेटिंग इंसेक्ट्स बिलॉन्गिंग टू केरिया एसपीपी., ऐज रिवील्ड थ्रू आईएसएसआर मार्कर्स” में लाख स्रावित करने वाले कीटों की आनुवंशिक विविधता का अध्ययन किया गया है। शोध संकेत देता है कि आनुवंशिक विविधता में कमी भविष्य में लाख कीटों की स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल होने की क्षमता और उत्पादन स्थिरता के लिए चुनौती बन सकती है।

वर्ष 2024 में आईसीएआर-एनआईएसए की पत्रिका में प्रकाशित लेख “द लैक कल्टीवेशन: अ वे टू अचीव प्रॉस्पेरिटी” में वैज्ञानिकों ने बताया कि लाख उत्पादन पर वर्षा के बदलते पैटर्न, सूखा, बाढ़, शीत लहरों की तीव्रता और कीट-रोगों में वृद्धि का असर पड़ रहा है। लेख के अनुसार, झारखंड में 2011-2022 के दौरान लाख उत्पादन की वार्षिक वृद्धि दर -0.33 प्रतिशत रही। इन अध्ययनों और जमीनी अनुभवों से स्पष्ट है कि लाख उत्पादन संकट के पीछे कई परस्पर जुड़े कारण हैं। बदलती जलवायु परिस्थितियां, मौसम की चरम घटनाएं, कीट-परजीवी संबंधों में बदलाव और उत्पादन प्रबंधन की चुनौतियां मिलकर लाख आधारित आजीविका पर दबाव बढ़ा रही हैं। एनआईएसए के निदेशक अभिजीत कर जलवायु परिवर्तन की इन समस्याओं को स्वीकार तो करते हैं लेकिन वह कहते हैं कि इसे नीतिगत विफलता के तरीके से भी समझने की जरूरत है। कर कहते हैं, “लोग हर समस्या का कारण जलवायु परिवर्तन को बता देते हैं, लेकिन असली मुद्दा यह है कि लाख को कभी गंभीर व्यावसायिक फसल की तरह लिया ही नहीं गया।” वह आगे कहते हैं, “लाख की खेती अभी तक संगठित और व्यावसायिक कृषि का हिस्सा नहीं बन पाई है। जब तक इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़कर कमर्शियल एग्रीकल्चर का दर्जा नहीं दिया जाएगा, तब तक उत्पादन बढ़ाने की बात अधूरी रहेगी।

अब तक नहीं कृषि का दर्जा

देश में लाख को अब तक कृषि उत्पाद का दर्जा नहीं मिला है। यहां तक कि लघु वनोपज (माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस) के तौर पर भी इसकी उपेक्षा की जा रही है। मिसाल के तौर पर झारखंड कैबिनेट ने 2023 में “लाख की खेती को एग्रीकल्चर स्टेटस” देने का फैसला जरूर किया था और 2021 में भी इसकी घोषणा हुई थी, लेकिन जमीन पर और कानूनी या प्रशासनिक ढांचे में लाख अब भी कई जगह माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस के रूप में ही इसे मान्यता मिली है।

जब 2021-22 में एक ही वर्ष में राष्ट्रीय उत्पादन 30 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई। इसका अर्थ था कि लाखों परिवारों की वार्षिक आय एक झटके में एक-तिहाई घट गई। यह वे परिवार हैं जिनके पास कोई वैकल्पिक आय-स्रोत नहीं है।

अभिजीत कर मानते हैं यह नीतिगत उपेक्षा का परिणाम है। कर कहते हैं, “लाख किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें खेती की दूसरी फसलों जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ना सब्सिडी, ना फसल ऋण, ना किसान क्रेडिट कार्ड जैसी मदद।” वह आगे जोड़ते हैं कि “जब तक लाख को कृषि या लघु वनोपज के रूप में गंभीरता से मान्यता नहीं मिलेगी, तब तक इस क्षेत्र में बदलाव मुश्किल है।”

वर्षों से 235 रुपए एमएसपी

लाख की खेती करने वाले आदिवासियों के लिए बाजार खुले हैं और मार्केट चैनल भी है लेकिन लाख की उपेक्षा ने उन्हें भी उपेक्षित बना दिया है। मिसाल के तौर पर झारखंड में ट्राइबल कॉपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ट्राइफेड) की भूमिका खास तौर पर लाख, महुआ, साल बीज, शहद और अन्य लघु वनोपज आधारित आदिवासी अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है। ट्राइफेड झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी और वन धन विकास केंद्रों (वीडीवीके) के जरिए बाजार, प्रशिक्षण और वैल्यू एडिशन का काम करती है। साथ ही यह माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी तय करती है। लाख के मामले में छह बरस पहले तय किए गए 235 रुपए की एमएसपी आज भी जस की तस हैं, जबकि स्थानीय बाजारों में किसानों को 1,000 से 1,200 रुपए तक मिल जाते हैं। ट्राइफेड के अधिकारी राजकुमार डाउन टू अर्थ से बताते हैं कि एमएसपी के लिए कमेटी को सिफारिश भेजी गई है लेकिन अभी भी एमएसपी वही है। वह बताते हैं कि ट्राइफेड ऐसे आर्टिसन्स जो लाख से उत्पाद बनाते हैं उनकी खरीद करती है। अभिजीत कर कहते हैं कि ऐसी संस्थाए बहुत सीमित मात्रा में खरीददारी करती हैं। इससे किसानों को प्रोत्साहन भी नहीं मिलता।

निराशा में आशा

खूंटी के रनिया ब्लॉक में टिर्के बताते हैं कि मौसमी प्रभावों को कम करने के लिए किसान लाख की खेती अब कैलियान्ड्रा और सेमियालाटा जैसे नए होस्ट पौधों को अपना रहे हैं। टिर्के ने यह प्रयोग अपने 2,5 एकड़ के खेतों में प्रशिक्षण के बाद शुरु किया है, जिसके नतीजे कुछ सालों में मिलेंगे।

वहीं, कर कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन हो रहा है और आगे भी होगा, लेकिन उससे निकलने के रास्ते भी होते हैं। सवाल यह है कि क्या हम उन रास्तों को अपनाना चाहते हैं या नहीं।” वह बताते हैं कि “जरूरत इस बात की है कि लाख को कमर्शियल खेती में लाया जाए। तभी नई किस्मों, बेहतर तकनीकों और वैज्ञानिक तरीकों पर काम हो पाएगा। अगर हम सचमुच उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं, तो हमें ‘लाख क्रांति’ जैसी सोच के साथ काम करना होगा।”

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