हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री से ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग

सामाजिक संगठनों, सेवानिवृत वन अधिकारियों और वैज्ञानिकों द्वारा मांग की गई है कि ग्लाइफोसेट अथवा अन्य खरपतवार नाशक के उपयोग की जहां शिकायत मिली है, वहां मिट्टी, जल, वनस्पति एवं जैव विविधता का वैज्ञानिक जांच कराई जाए
वन विभाग के अधिकारी टीमें बनाकर वन भूमि पर बोई गई मटर की खेती नष्ट कर रहे हैं। फोटो: गुमान सिंह
वन विभाग के अधिकारी टीमें बनाकर वन भूमि पर बोई गई मटर की खेती नष्ट कर रहे हैं। फोटो: गुमान सिंह
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हिमाचल प्रदेश की वन भूमि पर ग्लाइफोसेट का छिड़काव कर मटर की खेती का मामला मुख्यमंत्री सुखविंदर सुक्खू तक पहुंच गया है। राज्य के 44 सामाजिक और पर्यावरण संगठनों, सेवानिवृत्त वन विभाग के अधिकारियों, स्वतंत्र शोधकर्ताओं एवं वैज्ञानिकों ने मुख्यमंत्री के नाम भेजे गए पत्र में ग्लाइफोसेट के छिड़काव को गंभीर बताते हुए इस पर तत्काल रोक की मांग की है। हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह ने बताया कि ग्लाइफोसेट का छिड़काव करने से जंगल की घास और पेड़ पौधे सूख जाते हैं और जंगल खाली हो जाता है। उन्होंने कहा कि इस नुकसान को देखते हुए ही हमने मुख्यमंत्री को आज 20 अगस्त 2026 को पत्र भेजा है।

पत्र के अनुसार, हाल ही में मंडी जिले के नाचन वन मंडल के थाची वन रेंज में वन विभाग द्वारा ऐसी अवैध फसल को उखाड़ने की कार्रवाई की गई है, जो अत्यंत सराहनीय है। लेकिन यह घटना एकांकी नहीं है। यह आशंका प्रबल है कि प्रदेश के अन्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी इसी तरह वन भूमि पर अतिक्रमण कर मटर तथा कुछ स्थानों पर भांग की अवैध खेती की जा रही है। यह सिलसिला पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है। यह कृत्य वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा जैव विविधता अधिनियम, 2002 का खुला उल्लंघन है।  

मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र के अनुसार, हिमाचल प्रदेश जैसे पवतीय राज्य में इसका प्रभाव और गंभीर हो सकता है, क्योंकि वनस्पति आवरण के न होने से मिट्टी के कटाव, ढलान की अस्थिरता, भूस्खलन तथा जलस्रोत पर प्रतिकूल प्रभाव का जोखिम बढ़ सकता है। हिमाचल प्रदेश सरकार ने राज्य के वन आवरण को बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देने के लिए “मिशन-32” के तहत वर्ष 2030 तक वन आवरण को 29.5 से बढ़ाकर 32 प्रतिशत करने का सराहनीय लक्ष्य रखा है। जबकि दूसरी ओर यदि वन भूमि को रासायनिक रूप से साफ कर कृषि अतिक्रमण के लिए उपयोग किया जाता है। ऐसे में राज्य की दीर्घकालिक पर्यावरणीय नीति का यह लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा?

मुख्यमंत्री से मांग की गई है कि ग्लाइफोसेट 41 प्रतिशत एसएल और इसके सभी व्यापारिक नाम जैसे राउंडअप, ग्लाइसेल, गरुड़, हाइजैक, ग्लाइफोस, डस्टर आदि की बिक्री, भंडारण और छिड़काव पर केरल की तर्ज पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। इन उत्पादों की राज्य में कड़ी निगरानी की जाए तथा आवश्यक होने पर कानूनी कार्रवाई की जाए।

पत्र के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों से वन भूमि पर खरपतवार नाशक के उपयोग की शिकायत लगातार सामने आ रही हैं। इन शिकायतों की जिला-वार जांच कराई जाए तथा संवेदनशील एवं चिन्हित वनों में विशेष निरीक्षण एवं निगरानी अभियान चलाया जाए।

मुख्यमंत्री से मांग की गई है कि सोशल मीडिया तथा अन्य माध्यमों में जंगल साफ करने, पेड़ सुखाने अथवा वनस्पति नष्ट करने के लिए खरपतवार नाशक के उपयोग को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों व प्रचार सामग्री पर तुरंत रोक लगाई जाए और संबंधित कंपनियों पर कार्रवाई हो।

पत्र के अनुसार, जहां ग्लाइफोसेट अथवा अन्य खरपतवार नाशक के उपयोग की शिकायत मिली है, वहां मिट्टी, जल, वनस्पति एवं जैव विविधता का वैज्ञानिक जांच कराई जाए, विशेष रूप से पेयजल एवं जल स्रोतों में पानी की गुणवत्ता की जांच हेतु रासायनिक अवशेष के परीक्षण किए जाएं।

मुख्यमंत्री से कहा गया है कि वन केवल सरकारी भूमि नहीं हैं। वे हिमाचल प्रदेश की जल सुरक्षा, जैव विविधता, कृषि, पर्यटन, स्थानीय आजीविका और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का आधार हैं। इसलिए वन भूमि पर रासायनिक रूप से वनस्पति नष्ट कर कृषि अतिक्रमण की प्रवृत्ति को केवल कानून-व्यवस्था का विषय न मान कर वन संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और सार्वजनिक हित का गंभीर माना जाना चाहिए।

मंडी के डीएफओ एसएस कश्यप ने डाउन टू अर्थ को बताया कि इस मामले में हमारी जीरो टॉलरेंस की नीति है। हम टीमें बनाकर पूरे क्षेत्र में कार्रवाई कर रहे हैं और ऐसे लोगों की पहचान की जा रही है। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। वह बताते हैं कि हमने अब तक पांच छोटे-छोटे पैच में मटर की खेती नष्ट की है।

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