संयुक्त एडवाइजरी पर विवाद: ग्राम सभा आधारित सामुदायिक जंगलों का प्रबंधन कैसे होगा?

एडवाइजरी में कहा गया है कि “ग्राम सभा आधारित वन प्रबंधन योजना को वन विभाग के चले आ रहे वर्किंग प्लान के मुताबिक खुद को ढालना होगा और वर्किंग प्लान के साथ ‘एकीकृत’ करना होगा”
File Photo : Agnimirh Basu
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27 जुलाई 2026 को जनजातीय कार्य मंत्रालय  और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक संयुक्त एडवाइजरी जारी की। इसका घोषित उद्देश्य सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं और वन विभाग के वर्किंग प्लानों के बीच "समन्वय (कोर्डिनेशन)" और "अभिसरण (कन्वर्जेंस)"  स्थापित करना है। पहली नज़र में यह एक सामान्य प्रशासनिक पहल लग सकती है लेकिन इसे वन अधिकार कानून, उसके नियमों के आलोक में पढ़ा जाए, तो कई बुनियादी विधिक और नीतिगत प्रश्न खड़े होते हैं।

प्रश्न है कि यदि किसी ग्राम सभा को सामुदायिक वन संसाधनों के प्रबंधन के अधिकार मिल चुके हैं तो उस जंगल का प्रबंधन किसकी योजना के अनुसार होगा- वन विभाग के चले आ रहे वर्किंग प्लान के अनुसार या ग्राम सभा की सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजना के अनुसार?

इस एडवाइजरी में कहा गया है कि “ग्राम सभा आधारित वन प्रबंधन योजना को वन विभाग के चले आ रहे वर्किंग प्लान के मुताबिक खुद को ढालना होगा और वर्किंग प्लान के साथ ‘एकीकृत’ करना होगा”। यह भारत में ‘वन शासन’ की दो अलग-अलग अवधारणाओं के बीच का खड़ा प्रश्न है। एक तरफ लगभग डेढ़ सौ वर्षों से विकसित हुई वह प्रशासनिक व्यवस्था है, जिसकी नींव औपनिवेशिक काल में रखी गई और जिसका प्रमुख औज़ार वर्किंग प्लान है। दूसरी तरफ वन अधिकार कानून है, जिसने जंगलों के संरक्षण, प्रबंधन और संवर्धन में ग्राम सभा को एक वैधानिक निर्णयकारी संस्था के रूप में स्थापित किया।

उल्लेखनीय है कि 21 फरवरी 2020 को जनजाति कार्य मंत्रालय ने एन. सी. सक्सेना की अध्यक्षता में इसी विषय पर एक समिति गठित की जिसका कार्यादेश ग्राम सभा आधारित प्रबंधन व्यवस्था के लिए ऐसे दिशानिर्देश तैयार करना था जो कानून के ‘शब्दों और उसकी मूल भावना’ के अनुरूप हों। समिति की सिफारिशें 12 सितंबर 2023 को सार्वजनिक भी की गईं जिसका ज़िक्र इस एडवाइजरी में किया गया है जिन्हें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ग्राम सभा आधारित सामुदायिक वन प्रबंधन के लिए ‘अपर्याप्त’ माना है और इन्हें अपने वर्किंग प्लान के अधीन लाने की कोशिश हो रही है।

वन अधिकार  कानून अधिकारों का ही नहीं, वन शासन का भी कानून है

इस पूरे विवाद को समझने के लिए सबसे पहले वन अधिकार (मान्यता) कानून की मूल संरचना को समझना ज़रूरी है। यह कानून केवल वन अधिकारों की मान्यता तक सीमित नहीं है बल्कि इसका सबसे बड़ा नवाचार ‘वन शासन की दिशा’ बदलना है।

वन अधिकार कानून ग्राम सभा को केवल अधिकारों की दावेदार संस्था के रूप में नहीं देखता। अधिनियम की धारा 3(1)(i) उसे सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा, पुनर्जीवन, संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार देती है और धारा 5 ग्राम सभा तथा उसके द्वारा अधिकृत संस्थाओं को जैव विविधता, वन्यजीवों, जल स्रोतों और पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपती है। अत: यह कानून ग्राम सभा को केवल अधिकारों का ‘लाभार्थी’ नहीं बल्कि जंगलों का ‘वैधानिक संरक्षक व प्रबन्धक’ मानता है।

2012 में संशोधित वन अधिकार नियमों ने ग्राम सभा आधारित सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजना की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप दिया। इनके अनुसार ग्राम सभा अपने सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत उपयोग के लिए प्रबंधन समिति का गठन करेगी और उसके माध्यम से स्वयं प्रबंधन योजना तैयार करेगी। इस प्रकार जंगलों के प्रबंधन को ‘ऊपर से नीचे संचालित प्रशासनिक प्रक्रिया के बजाय नीचे से ऊपर विकसित होने वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ के रूप में परिकल्पित किया गया।

मौजूदा विवाद यहीं से शुरू होता है। कानून ग्राम सभा को प्रबंधन योजना बनाने का अधिकार देता है लेकिन व्यवहार में प्रश्न उठता है कि ग्राम सभा द्वारा तैयार की गई योजना और वन विभाग के वर्किंग प्लान के बीच संबंध क्या होगा? क्या दोनों समानांतर दस्तावेज़ होंगे? एक-दूसरे के अनुरूप संशोधित होंगे? 2012 के नियमों में इसके बारे भी उल्लेख है कि प्रबंधन समिति ग्राम सभा की योजना को वन विभाग के वर्किंग प्लान में ‘एकीकृत’ करेगी और उसके लिए उस वर्किंग प्लान में जरूरी संशोधन करेगी। परंतु आज तक कहीं भी यह एकीकरण नहीं हुआ है। बीते कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब  ग्राम सभाओं ने वर्किंग प्लान के आधार पर प्रस्तावित पेड़ कटाई को रोका है, तो वन विभाग ने उन पर कारवाई करने की धमकियाँ दी हैं। इसलिए ‘एकीकरण’ का मतलब और प्रक्रिया क्या है यह सवाल बार-बार उठाया जा रहा है।

इन्हीं प्रश्नों पर हाल में तैयार किए गए नीति-पत्र  रॉबस्ट ग्राम सभा, सस्टेनेबल फ़ॉरेस्ट्स, सिक्योर लाइवलीहुड्स: कैटालाइजिंग सीएफ़आर मैनेजमेंट प्लान्स” ने विस्तार से विचार किया है। उसका निष्कर्ष है कि वन अधिकार कानून  और उसके नियमों को समग्र रूप से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि ग्राम सभा अपनी प्रबंधन योजना तैयार करने के लिए अधिकृत है इसलिए जहाँ सामुदायिक वन संसाधन अधिकार प्राप्त हो चुके हैं वहाँ वन विभाग के वर्किंग प्लान आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए ताकि वे ग्राम सभा की योजना के अनुरूप हों। अपेक्षा है कि प्रशासनिक व्यवस्थाएँ स्वयं को इस नई वैधानिक व्यवस्था के अनुरूप ढालें।

यही कारण है कि इस संयुक्त एडवाइजरी में प्रयुक्त दो शब्द- "समन्वय" और "अभिसरण" पूरे विवाद के केंद्र में हैं। यदि उनका अर्थ ग्राम सभा की योजना को राष्ट्रीय वर्किंग प्लान कोड, 2023 के अनुरूप ढालना है, तो यह वन अधिकार अधिनियम की मूल संरचना से मेल नहीं खाता और इससे वन अधिकार अधिनियम द्वारा स्थापित प्राथमिकताएँ उलट सकती हैं।

क्या वर्किंग प्लान की वैधानिक स्थिति अपरिवर्तनीय है?

इस संबंध में, विषय विशेषज्ञ और नीति पत्र के सह लेखक डॉ शरद लेले कहते हैं-  “वर्किंग प्लान के उद्देश्य अक्सर ईमारती लकड़ी का दोहन और उसके उत्पादन की दृष्टि से वनों का ‘संवर्धन’ यही होता है। हालांकि प्लान में ‘लघु वनोपज संवर्धन’ और ऐसे कुछ अन्य उद्देशों को जोड़कर भी कार्य योजनाएँ बनती हैं किन्तु प्लान न तो लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता देते हैं और न ही लोगों के पारंपरिक ज्ञान का उसमें उपयोग करते हैं। उनका काम करने का पैमाना भी बड़ा होता है। जब ग्राम सभा योजना बनाती है तो उसकी प्राथमिकता में जलाऊ लकड़ी, चराई, लघु वनोपज और जंगलों के सांस्कृतिक उपयोग को प्राथमिकता दी जाएगी और प्रबंधन योजनाओं का पैमाना भी स्थानीय और छोटा होगा। साथ ही  “वर्किंग प्लान ऐसी क्लिष्ट तकनीकी भाषा में लिखा होता है कि सामान्य ग्रामीण आदमी उसे समझने में कठिनाई महसूस करेगा। इसलिए वर्किंग प्लान और प्रबंधन योजना का ‘एकीकरण’ मतलब जहाँ-जहां सामुदायिक अधिकार मान्य हुए हैं, वहाँ पर ग्राम सभा की योजना लागू करना और जो क्षेत्र बचेगा, उसके लिए नया वर्किंग प्लान तैयार करना या पुराने वर्किंग प्लान को संशोधित रूप में जारी रखना, यही होना चाहिए।“

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि वर्किंग प्लान भी एक परिवर्तनीय योजना है। 10 साल की इस योजना को बीच में संशोधित करने का प्रावधान तो है ही। जब वन भूमि को गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए डायवर्ट किया जाता है तो वहाँ वर्किंग प्लान स्वत: निष्क्रिय हो जाता है। यानी ऐसा नहीं होता कि अभी वन विभाग का वर्किंग प्लान जारी है और जब तक इसकी अवधि पूरी नहीं हो जाती तब तक गैर-वन उपयोग के लिए जंगल का डायवर्जन नहीं हो सकता। इसी प्रकार किसी जंगल को राष्ट्रीय उद्यान या अभ्यारण्य या टाइगर रिजर्व घोषित करने पर भी वर्किंग प्लान तुरंत ही निष्क्रिय हो जाता है। ऐसे में, जब बात ग्राम सभाओं द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र के जंगलों के प्रबंधन की है तो वहाँ क्यों वर्किंग प्लान उसके मुताबिक नहीं बदला जा सकता या निष्क्रिय किया जा सकता है?

यह वास्तव में ‘विधि के शासन’ का भी प्रश्न है। संसद द्वारा पारित सभी कानून प्रशासनिक व्यवस्था पर समान रूप से बाध्यकारी हैं। यदि प्रशासनिक व्यवस्थाएँ अन्य संसदीय कानूनों के अनुरूप बदल सकती हैं तो इस कानून के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए। अन्यथा एक प्रशासनिक व्यवस्था उस वैधानिक परिवर्तन को सीमित करने लगेगी, जिसे संसद ने स्वयं स्थापित किया है।

यहाँ संयुक्त एडवाइजरी पर पुनर्विचार ज़रूरी है- किसी टकराव के लिए नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रशासनिक निर्देश इस कानून की विधायी मंशा के अनुरूप हों।

महज़ दो प्रशासनिक दस्तावेज़ों के बीच इस अस्पष्टता का प्रभाव उन हजारों ग्राम सभाओं पर पड़ेगा जहां सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मिल चुके हैं या मान्यता की प्रक्रिया जारी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजना को किसी पूर्व निर्धारित तकनीकी प्रारूप या एकरूप मॉडल में नहीं बाँधा जा सकता। यह कानून द्वारा मान्यता प्राप्त ‘स्थानीय स्वशासन’ का दस्तावेज़ है न कि किसी प्रशासनिक प्रपत्र का विस्तार। यदि कानून ने ग्राम सभा को प्रबंधन की वैधानिक जिम्मेदारी सौंपी है, तो प्रशासनिक व्यवस्थाओं का दायित्व उस भूमिका को सक्षम बनाना है, उसके समानांतर कोई नई व्यवस्था खड़ी करना नहीं।

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