डाउन टू अर्थ विशेष: क्या लैब में बना मांस पारंपरिक पशुपालन की जगह ले पाएगा?

सिंथेटिक मांस (कृत्रिम मांस) उत्पादन में वैश्विक स्तर पर वृद्धि देखी गई है, भले ही प्रयोगशाला में भोजन उगाने के पर्यावरणीय लाभ अभी भी बहस का विषय बने हुए हैं
कल्टिवेटेड मीट (प्रयोगशाला में तैयार मांस) का विचार यूरोप में साकार हुआ, जिसके तहत नीदरलैंड में प्रयोगशाला में पहला बीफ बर्गर पैटी बनाया गया था
कल्टिवेटेड मीट (प्रयोगशाला में तैयार मांस) का विचार यूरोप में साकार हुआ, जिसके तहत नीदरलैंड में प्रयोगशाला में पहला बीफ बर्गर पैटी बनाया गया था
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विज्ञान गल्प श्रृंखला “स्टार ट्रेक” में एक अंतरिक्ष यान पर सवार चालक दल के सदस्य एक दीवार के पैनल के पास जाकर अपने भोजन का ऑर्डर देते थे और कुछ ही सेकंड में भोजन को तैयार होते देखते थे। “रेप्लिकेटर” नाम का यह उपकरण खेती की आवश्यकता को खत्म करते हुए आवश्यकता अनुसार ऊर्जा से भोजन बनाता था।

यह दृश्य 24वीं शताब्दी का है। लेकिन ऐसा लगता है कि वह भविष्य जल्दी आ गया है क्योंकि दुनिया बिना पशु पाले मांस उगाने, बिना मछली पकड़े समुद्री भोजन तैयार करने और बिना मवेशियों के दूध उत्पादन करने का प्रयास कर रही है। इसके तरीके अलग-अलग हैं। इनमें बड़े बायो रिएक्टरों में पशु कोशिकाओं को उगाने से लेकर प्रोटीन का उत्पादन करने के लिए सूक्ष्मजीवों को फरमेंट (किण्वित) करने तक के तरीके शामिल हैं।

इस विज्ञान के कई नाम हैं, सेलुलर एग्रीकल्चर (कोशिकीय कृषि), प्रेसिजन फरमेंटेशन (सटीक किण्वन), अल्टरनेटिव प्रोटीन (वैकल्पिक प्रोटीन) इत्यादि लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है, भोजन के लिए भूमि, महासागर और मवेशियों पर निर्भरता समाप्त करना।

इन विभिन्न तरीकों में से कोशिकीय कृषि विशेष रूप से कल्टीवेटेड या प्रयोगशाला में तैयार किए गए मांस और समुद्री भोजन ने पेट्री डिश (प्रयोगशालाओं में कोशिकाओं को संवर्धित करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली उथली और पारदर्शी कांच या प्लास्टिक की कटोरी को पेट्री डिश कहते हैं) से लेकर मेन्यू तक का सफर तय किया है। यह सफर अभी भले ही सीमित हो लेकिन बिलकुल स्पष्ट है। इस प्रक्रिया में पशु के ऊतकों से कोशिकाओं का एक छोटा सा नमूना निकालना और उन्हें बड़े स्टील के बायो रिएक्टरों में बनाना शामिल है ताकि एक स्टेम सेल लाइन बनाई जा सके जो विभाजित और बहुगुणित हो सके। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में स्थित सेल-कल्चर्ड समुद्री भोजन कंपनी वाइल्डटाइप के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जस्टिन कोलबेक कहते हैं, “हमारे शरीर की कोशिकाओं की तरह ही पशु कोशिकाएं भी जीवन की बुनियादी निर्माण इकाइयां हैं।” इस कंपनी ने अपनी मूल सामग्री साल 2018 में एक मछली से प्राप्त की थी।

उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया कि यदि आप सही प्रकार की स्टेम कोशिकाएं ढूंढ़ लेते हैं तो वे स्वस्थ प्राकृतिक तरीके से खुद को नवीनीकृत कर सकती हैं। इसका मतलब है कि वे उन कोशिकाओं में बदल सकती हैं जो मांस में परिवर्तित होती हैं, चाहे वह मांसपेशियों की कोशिका हो, वसा कोशिका हो या संयोजी ऊतक हो। कोशिकाओं की यह आदर्श श्रृंखला सही परिस्थितियों में लगातार बढ़ती रह सकती है और हमें इसके लिए दोबारा मछली की आवश्यकता नहीं पड़ती।

इन कोशिकाओं को “ग्रोथ मीडिया” या “ग्रोथ फैक्टर्स” दिए जाते हैं ताकि उन्हें यह अहसास कराया जा सके कि वे किसी टैंक के भीतर नहीं बल्कि एक जानवर के शरीर के अंदर हैं, जिससे उन्हें अपनी संख्या बढ़ाने में मदद मिलती है और कुछ हफ्तों के बाद कच्चा मांस प्राप्त होता है (देखें “संवर्घित मांस उत्पादन” )।

कल्टीवेटेड मांस के विचार ने यूरोप में आकार लिया, जहां नीदरलैंड की मास्ट्रिच यूनिवर्सिटी में फार्माकोलॉजिस्ट मार्क पोस्ट द्वारा पहली बार प्रयोगशाला में तैयार बीफ बर्गर पैटी बनाई गई थी। पोस्ट ने साल 2013 में लाइव टेलीविजन पर इसका प्रदर्शन किया था। पहली कल्टीवेटेड मांस कंपनी की स्थापना साल 2015 में अमेरिका में हुई थी और साल 2020 में सिंगापुर ने कैलिफोर्निया स्थित ईट जस्ट नामक स्टार्टअप को देश में कल्टीवेटेड मांस बेचने की मंजूरी दे कर पहला देश बन गया। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इजराइल कल्टीवेटेड मांस की बिक्री की अनुमति देने वाले देशों की सूची में शामिल हो गए हैं। अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी थिंक टैंक गुड फूड इंस्टीट्यूट (जीएफआई) के अनुसार साल 2025 में कल्टीवेटेड मांस और समुद्री भोजन या अंतिम उत्पादों के विकास पर 142 कंपनियां काम कर रही हैं।

जीएफआई के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में छह कंपनियां मुर्गे और बकरियों से संबंधित प्रयोगशाला में तैयार मांस उत्पादों को विकसित कर रही हैं। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत जैव प्रौद्योगिकी विभाग, 2024 की बायो-ई3 (बायोटेक्नोलॉजी फॉर इकोनॉमी, एनवायरनमेंट एंड एम्प्लॉयमेंट) नीति के तहत अपनी स्मार्ट प्रोटीन पहलों के हिस्से के रूप में प्रयोगशाला में तैयार भोजन के विकास और प्रचार पर काम कर रहा है। दिसंबर 2024 में मुंबई स्थित फर्म बायोक्राफ्ट फूड्स ने इस पहल को गति देने के लिए होटलों की एक देशव्यापी प्रतियोगिता (द ग्रेट इंडियन कल्टिवेटेड चिकन कुक-ऑफ) के माध्यम से अपने 3डी प्रिंटेड कल्टिवेटेड चिकन बर्गर और चिली चिकन के लिए एक “टेस्टिंग सेशन” की मेजबानी की। जीएफआई इंडिया की प्रबंध निदेशक और प्रतियोगिता के निर्णायकों में से एक स्नेहा सिंह कहती हैं, “अधिकांश लोग जिन्होंने उत्पाद को आजमाया, उन्हें यह पसंद आया।”

धीमी वृद्धि

दशक भर से तकनीक मौजूद होने के बावजूद दुनिया में कहीं भी कोई भी कल्टिवेटेड मीट उत्पाद सार्थक व्यावसायिक पैमाने पर उपलब्ध नहीं है। कारण यह है कि विज्ञान तो आगे बढ़ा है लेकिन यह मुनाफे वाले औद्योगिक पैमाने पर उत्पादन को समर्थन देने की दिशा में पर्याप्त रूप से आगे नहीं बढ़ा है। जीएफआई इंडिया में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रमुख चंदना टेक्काटे कहती हैं, “लागत के केवल दो मुख्य कारक हैं, एक ग्रोथ मीडिया है और दूसरा इन सुविधाओं को स्थापित करने में शामिल पूंजीगत व्यय है।” अधिकांश ग्रोथ मीडिया सामग्री अभी भी फार्मास्युटिकल उद्योग के लिए बनाई गई आपूर्ति श्रृंखलाओं से प्राप्त की जाती है, जहां कीमत की तुलना में शुद्धता और प्रदर्शन अधिक मायने रखता है। केमिकल इंजीनियर डेविड हमबर्ड द्वारा 2021 में किया गया एक तकनीकी आर्थिक विश्लेषण (जो अब तक के सबसे व्यापक विश्लेषणों में से एक है) यह निष्कर्ष निकालता है कि सेल कल्चर मीडिया के लिए उपयुक्त अमीनो एसिड और प्रोटीन सूक्ष्म पोषक तत्वों (ग्रोथ मीडिया) के फॉर्मूलेशन वर्तमान में खाद्य उत्पादन के अनुरूप पैमानों पर उत्पादित नहीं होते हैं और उन्हें काफी महंगा भी माना जाता है। वह तर्क देते हैं कि ग्रोथ मीडिया की लागत वास्तविक रूप से उस स्तर से नीचे नहीं गिर सकती जो कल्टिवेटेड मीट को पारंपरिक मांस के साथ प्रतिस्पर्धी बना सकें।

उनका अध्ययन यह भी सुझाव देता है कि खाद्य उत्पादन के लिए आवश्यक पैमाने पर पशु कोशिकाओं को उगाना कठिन है। उदाहरण के लिए सालाना एक लाख टन के बाजार तक पहुंचने के लिए (लगभग 10 मिलियन उपभोक्ता प्रति वर्ष 10 किलोग्राम कल्टिवेटेड मीट का उपभोग करें ) वह उत्पादन चरण में गीले सेल द्रव्यमान (कटी हुई कोशिकाएं जिनमें अभी भी अतिरिक्त नमी होती है) के लगभग 25 डॉलर प्रति किलोग्राम का लक्ष्य निर्धारित करते हैं। प्रसंस्करण, पैकेजिंग, वितरण और लाभ मार्जिन के बाद उस लागत पर पूरी तरह से थोक सेल द्रव्यमान से बने एक असंरचित उत्पाद के सुपर मार्केट में न्यूनतम 50 डॉलर प्रति किलोग्राम तक पहुंचने की उम्मीद की जा सकती है। यह एक प्रीमियम मांस के टुकड़े की कीमत है जो अब तक एक कीमा या नगेट शैली के निम्न स्तरीय उत्पाद के लिए भुगतान की जाती है। दूसरे शब्दों में यदि आशावादी होकर देखा जाए तो भी पैमाने पर पहुंचने वाले पहले कल्टिवेटेड मीट उत्पाद प्राकृतिक मांस की तुलना में बहुत अधिक महंगे होंगे और वे श्रृंखला में सबसे साधारण और सबसे कम आकर्षक उत्पाद होंगे। उद्योग से जुड़े लोगों ने हमबर्ड के मूल्यांकन का खंडन किया है। ग्रोथ मीडिया की समस्या पर टेक्काटे एक ऐसे विकास की ओर इशारा करती हैं जो कुछ साल पहले असंभव लगता था। कई कंपनियों ने 2025 में ग्रोथ मीडिया की लागत 0.20 डॉलर प्रति लीटर या उससे कम होने की घोषणा की जो कुछ ही साल पहले दर्ज की गई लागतों से 99 प्रतिशत से अधिक की कमी को दर्शाता है। उनके अनुसार यह फार्मास्युटिकल-ग्रेड सामग्री से खाद्य-ग्रेड और फीड-ग्रेड विकल्पों में जानबूझकर किए गए बदलाव से आया है।

प्रौद्योगिकी के एक दशक से मौजूद होने के बावजूद, अभी भी दुनिया में कहीं भी सार्थक व्यावसायिक पैमाने पर कोई भी संवर्धित मांस उत्पाद उपलब्ध नहीं

वाइल्डटाइप के कोलबेक बताते हैं कि कैसे उनकी टीम ने सीफूड उद्योग में यह बदलाव लाया। वह कहते हैं, “हमने कई जटिल फार्मा-ग्रेड पोषक तत्वों को हटा दिया और उन्हें खाद्य-ग्रेड सामग्री या पशु फीड सामग्री से बदल दिया। हमने फार्मास्युटिकल उद्योग के बाहर नए आपूर्तिकर्ता ढूंढे़ और इससे लागत कम हो गई।” टेक्काटे व्यापक स्तर पर उपयोग के लिए इसी तर्क को दोहराती हैं, “हमें खाद्य-संबंधी प्रयोगों के लिए उस स्तर की शुद्धता की आवश्यकता नहीं है।” हालांकि अमेरिका के खाद्य वैज्ञानिक डेरिक रिस्नर (ये 2024 में एसीएस फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित कल्चर्ड मीट पर एक पेपर के मुख्य लेखक हैं) कहते हैं कि गुणवत्ता से समझौता करना एक अच्छा विचार नहीं हो सकता है। वह डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “हमारा निष्कर्ष यह है कि संदूषण (कॉन्टेमिनेशन) के जोखिम और उत्पाद के साथ ही विसंगतियों के कारण आपको उस ग्रोथ मीडिया को लगभग फार्मास्युटिकल स्तरों तक शुद्ध करने की आवश्यकता है।” बायो रिएक्टर की समस्या को हल करना और भी कठिन है। फार्मास्युटिकल उद्योग में पशु कोशिका संवर्धन के लिए वर्तमान में उपयोग किए जाने वाले सबसे बड़े बायो रिएक्टर की क्षमता लगभग 25,000 लीटर है और वह भी केवल एक कंपनी द्वारा निर्मित किया जाता है। अधिकांश कंपनियां 2,000 लीटर और 5,000 लीटर के बीच के रिएक्टरों से काम करती हैं। रिस्नर कहते हैं कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति में सार्थक योगदान देने के लिए आवश्यक पैमाने पर कल्टिवेटेड मीट का उत्पादन करने के लिए उस आकार से दस गुना बड़े बर्तनों की आवश्यकता होगी और यह एक ऐसा पैमाना है जो पशु कोशिकाओं के साथ कभी भी आजमाया नहीं गया है। हमबर्ड के विश्लेषण का हवाला देते हुए वह कहते हैं कि वर्तमान वार्षिक वैश्विक मांस उत्पादन का केवल 1 प्रतिशत, (लगभग 3 मिलियन टन) प्राप्त करने के लिए 6,49,000 लीटर की कुल बायो रिएक्टर मात्रा की आवश्यकता होगी और इसके लिए लगभग 440 सामान संयंत्रों की आवश्यकता होगी जो वैश्विक स्तर पर कुल स्तनधारी कोशिका संवर्धन क्षमता में लगभग 3,000 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है।

अनिश्चित दावा

कल्टिवेटेड मीट के पक्ष में दिए जा रहे मुख्य तर्कों में से एक यह है कि यह उत्सर्जन प्रधान पशुधन खेती को एक नियंत्रित, औद्योगिक प्रक्रिया से बदलकर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने की क्षमता रखता है। लेकिन इसके पर्यावरणीय प्रभाव के आसपास का शोध अभी तक तय नहीं हुआ है। शोध का एक पक्ष यह सुझाव देता है कि कल्टिवेटेड मीट और पारंपरिक पशुधन उत्पादन के बीच की तुलना शुरुआती दावों के संकेत से कहीं अधिक जटिल है।

डच शोध फर्म सीई डेल्फ्ट और जीएफआई द्वारा 2023 में किए गए एक लाइफ साइकिल असेसमेंट ने आपूर्ति श्रृंखला में 15 से अधिक कंपनियों और शोध संस्थानों के प्राथमिक आंकड़ों का उपयोग करके यह मॉडल तैयार किया कि 2030 में एक व्यावसायिक पैमाने की कल्टिवेटेड मीट प्रणाली कैसी दिख सकती है। हालांकि कल्टिवेटेड मीट कुछ पर्यावरणीय मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन करता है, जैसे कि भूमि उपयोग और पशुधन मीथेन उत्सर्जन, लेकिन अध्ययन के सबसे चौंकाने वाले निष्कर्षों में से एक यह है कि इसका सीधा मतलब पारंपरिक मांस की तुलना में कम समग्र उत्सर्जन नहीं है। शोध पत्र बताता है कि कल्टिवेटेड मीट का कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन बीफ के मामले में कम होगा लेकिन चिकन या पोर्क जैसे कम उत्सर्जन गहन मांस (इंटेसिंव मीट) के बराबर या कुछ मामलों में अधिक भी होगा।

मांस उत्पादन के दोनों तरीकों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का प्रोफाइल अलग है। कल्टिवेटेड मीट में मुख्य योगदानकर्ता कार्बन डाइऑक्साइड है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा की खपत से होता है। वर्तमान उत्पादन विधियों के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। बायो रिएक्टरों को ठंडा करना, रोगाणुहीन स्थितियां बनाए रखना और कल्चर मीडियम सामग्री का उत्पादन करना ऊर्जा गहन जैव रासायनिक प्रक्रियाएं हैं जो चरने वाले मवेशियों के मैदान से बिलकुल अलग होती हैं। यदि वह ऊर्जा जीवाश्म ईंधन से आती है (जैसा आज दुनिया के अधिकांश हिस्सों में है) तो उस लिहाज से कल्टिवेटेड मीट व्यापक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करता है।

2019 में यूके के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने फ्रंटियर्स इन सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स में एक अध्ययन प्रकाशित किया और कल्टिवेटेड मीट के जलवायु प्रभाव को मापने में अनुमानित एलसीए में एक मौलिक त्रुटि की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि अधिकांश तुलनाएं कार्बन डाइऑक्साइड-समतुल्य नामक एक मापदंड पर निर्भर करती हैं जो विभिन्न ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कार्बन डाइऑक्साइड से जोड़ती हैं। लेकिन यह मापदंड भ्रामक हो सकता है। जहां कल्टिवेटेड मीट व्यापक रूप से कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करता है, वहीं पारंपरिक मांस में मुख्य उत्सर्जन मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का होता है जो जानवरों की पाचन प्रक्रिया के माध्यम से निकलता है जिसे एंटरिक फर्मेंटेशन (आंतों का किण्वन) कहा जाता है।

मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड एक जैसा व्यवहार नहीं करते हैं। मीथेन एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो 20 साल की अवधि में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में लगभग 80 गुना अधिक गर्मी को अवशोषित करती है। लेकिन यह अपेक्षाकृत कम समय तक रहने वाली भी है। एक बार निकलने के बाद यह लगभग 10 से 12 वर्षों में वायुमंडल में टूट जाती है, इसके विपरीत कार्बन डाइऑक्साइड सैकड़ों वर्षों तक वायुमंडल में रह सकती है और पूरे समय गर्मी को अवशोषित कर सकती है।

इसलिए यदि मवेशी पालन में महत्वपूर्ण रूप से कमी आती है और इसकी जगह कल्टिवेटेड मीट ले लेता है तो वायुमंडलीय वार्मिंग में इसका योगदान भी अपेक्षाकृत तेजी से कम होना शुरू हो जाएगा, लेकिन ऐसा केवल शुरुआत में होगा और लंबी अवधि में यह अंतर कम हो जाएगा।

हालांकि इससे बाहर निकलने का एक रास्ता है और सीई डेल्फ्ट का अध्ययन इसी ओर इशारा करता है। कल्टिवेटेड मीट जीवाश्म ईंधन मामले में खराब प्रदर्शन करता है किन्तु यह अध्ययन स्वच्छ ऊर्जा के तहत एक अलग परिणाम दिखाता है। कल्टिवेटेड मीट का कार्बन फुटप्रिंट ऊर्जा स्रोत के आधार पर नाटकीय रूप से बदल जाता है। वैश्विक औसत पारंपरिक ऊर्जा मिश्रण पर उत्पादित होने पर प्रति किलोग्राम मांस पर 14 किलोग्राम से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य से लेकर पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा पर उत्पादित होने पर 3 किलोग्राम से भी कम तक। अध्ययन का कहना है कि ये स्तर बीफ और पोर्क की तुलना में कम है और कुशलतापूर्वक उत्पादित चिकन के बराबर हैं।

भले ही ऊर्जा की समस्या हल हो जाए लेकिन कल्टिवेटेड मीट के जलवायु लाभों की कोई गारंटी नहीं है। यह तकनीक मूलत: फार्मास्युटिकल उद्योग से उधार ली गई है और इसके साथ फार्मास्युटिकल उद्योग की संसाधन संबंधी मांगें भी जुड़ी हैं। एसीएस फूड साइंस एंड टेक्नोलॉजी में रिस्नर का 2024 का अध्ययन पाता है कि वर्तमान उत्पादन विधियों के तहत कल्टिवेटेड मीट का कार्बन फुटप्रिंट पारंपरिक बीफ की तुलना में चार से 25 गुना अधिक हो सकता है। रिस्नर कहते हैं कि फार्मास्युटिकल ग्रेड शुद्धिकरण असाधारण रूप से ऊर्जा गहन (एनर्जी इंटेंसिव) है। अध्ययन का यह भी अनुमान है कि 1 किलोग्राम बायोमास का उत्पादन करने के लिए 291 लीटर से 1,148 लीटर ग्रोथ मीडिया की आवश्यकता होती है। इंजीनियरिंग से परे सामग्रीगत लागत भी भारी है। रिस्नर बताते हैं कि वैश्विक मांस उत्पादन के किसी भी महत्वपूर्ण हिस्से को चालू करने के लिए पर्याप्त बायो रिएक्टर बनाने के लिए आवश्यक स्टील हेतु एक बहुत बड़े पूंजीगत निवेश की आवश्यकता होगी और खनन के रूप में व्यापक लागत आएगी।

हालांकि जीएफआई, द हिब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ जेरूसलम, इजराइल और हेलसिंकी विश्वविद्यालय, फिनलैंड के वैज्ञानिकों द्वारा 2025 में प्रकाशित शोध पत्र में कहा गया है कि अध्ययन में ग्रोथ मीडिया की आवश्यकताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था। इस शोधपत्र ने 1 किलोग्राम बायोमास का उत्पादन करने के लिए 65-120 लीटर ग्रोथ मीडिया की उद्योग रूपांतरण दर बताई।

वाइल्डटाइप के कोलबेक भी व्यापक लाइफ साइकिल असेसमेंट को लेकर संशयी हैं। कोलबेक बताते हैं कि सीफूड आपूर्ति श्रृंखला वैश्विक खाद्य प्रणाली में सबसे अधिक कार्बन-गहन श्रृंखलाओं में से एक है। प्रशांत महासागर में पकड़ी गई एक मछली को चीन में प्रसंस्कृत किया जा सकता है, दक्षिण पूर्व एशिया में फिलेट में बदला जा सकता है और सैन फ्रांसिस्को के एक रेस्तरां में भेजा जा सकता है। इस यात्रा का प्रत्येक चरण कार्बन लागत को ऐसे तरीकों से बढ़ाता है जो मानक तुलनाओं में शायद ही कभी दिखाई देते हैं। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर यह अंतर अधिक स्पष्ट है। फार्म में पाले गए सैल्मन से प्रति किलोग्राम मछली पर 5 किलोग्राम से 30 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्पन्न होता है, समुद्र से पकड़ी गई मछली (वाइल्ड-कॉट) से 2 किलोग्राम और 20 किलोग्राम के बीच। उनके अनुसार वाइल्डटाइप का आंकड़ा 1 किलोग्राम और 5 किलोग्राम के बीच है।

पीछे छूटती दुनिया

खाद्य और कृषि संगठन के कृषि खाद्य प्रणाली और खाद्य सुरक्षा प्रभाग ने डाउन टू अर्थ को एक ईमेल प्रतिक्रिया में कहा कि वैश्विक स्तर पर पशुधन अनुमानित 1.3 बिलियन लोगों की आजीविका का समर्थन करता है और यह केवल एक खाद्य उत्पादन प्रणाली नहीं है, दुनिया के बड़े हिस्सों में विशेष रूप से कई कम और मध्यम आय वाले देशों में यह एक आजीविका और सांस्कृतिक प्रथा है। विशेष रूप से भारत जैसे देशों के लिए जिनके पास औद्योगिक पशुधन प्रणालियां नहीं हैं और पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत कम उत्सर्जन है उस स्थिति में पशुधन कई भूमिकाएं निभाता है। हालांकि खाद्य और कृषि संगठन यह भी नोट करता है कि सेल-आधारित खाद्य उत्पादन का पैमाना बेहद सीमित बना हुआ है और यह पारंपरिक पशुधन प्रणालियों से तुलना योग्य नहीं है और यह स्थिति कुछ समय तक बनी रहने की संभावना है। इसका एक हिस्सा बाजार में कल्चर्ड मीट की मांग से भी जुड़ा हो सकता है।

भारत में छह कंपनियां मुर्गे और बकरियों से संबंधित प्रयोगशाला में तैयार मांस उत्पादों को विकसित कर रही हैं
भारत में छह कंपनियां मुर्गे और बकरियों से संबंधित प्रयोगशाला में तैयार मांस उत्पादों को विकसित कर रही हैं

स्वाद का पहलू

2019 में फ्रंटियर्स इन सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स में प्रकाशित एक शोध पत्र ‘‘ए सर्वे ऑफ कंज्यूमर परसेप्शन्स ऑफ प्लांट-बेस्ड एंड क्लीन मीट इन द यूएसए, इंडिया एंड चाइना’’ ने पाया कि 56 प्रतिशत भारतीय उपभोक्ता नियमित रूप से कल्टिवेटेड मीट खरीदने के लिए बहुत या अत्यधिक इच्छुक थे जो भारत को अमेरिका और चीन जैसे अन्य प्रमुख बाजारों के समकक्ष रखता है। वैश्विक स्तर पर कई सरकारें पहले ही अपने नागरिकों की ओर से इस सवाल का जवाब दे चुकी हैं, जिनमें से कुछ ने कल्चर्ड मीट की बिक्री की अनुमति दी है और इटली जैसे अन्य देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है।

गुरुग्राम की एक खाद्य विशेषज्ञ और चिकित्सक मनोशी भट्टाचार्य का कहना है कि इस सवाल पर दीर्घकालिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उनके अनुसार, “किसी विशेष प्रकार के भोजन को अपना कहने के लिए हमें उसे 200 वर्षों तक खाना पड़ता है।” वह खानपान की आदतों के एक संक्षिप्त इतिहास को रेखांकित करती हैं। शिकारी-संग्रहकर्ता जो कई दिनों के उपवास के बाद खाते थे, कृषि के आने पर दैनिक भोजन के अभ्यस्त हो गए। नाश्ते की अवधारणा पुर्तगाली उद्योगपतियों द्वारा पेश की गई थी जिन्हें शिफ्ट से पहले श्रमिकों को भोजन कराने की आवश्यकता थी। आलू 1700 के दशक में भारत आया और अब अधिकांश भारतीय व्यंजनों का हिस्सा है। चाय और कॉफी को कड़े विरोध का सामना करना पड़ा और फिर वे भारतीय दैनिक जीवन के सबसे अंतरंग अंग बन गए हैं। कोक और पेप्सी गांवों तक पहुंच गया है।

वह कहती हैं, “दोनों उद्योगों ने विरोध करने वाली जनता के पीछे एड़ी चोटी का जोर लगा दिया।” उनका कहना यह नहीं है कि कल्टिवेटेड मीट निश्चित रूप से इसी रास्ते पर चलेगा बल्कि यह एक संभावना है। वह आगे कहती हैं, “लैब मीट को अगर पर्याप्त रूप से बढ़ावा दिया जाए तो सफल होगा।” इसके आगे वह कहती हैं, “इसे एक परंपरा बनने में 100 से 200 साल लगेंगे।” क्या इसका कोई दुष्प्रभाव होगा? “शायद, लेकिन उसका पता चलने में कम से कम 50 वर्ष लगेंगे।”

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