

55 फीसदी लोगों ने कभी नहीं सोचा कि सनस्क्रीन समुद्री पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हो सकता है, अध्ययन में सामने आई जागरूकता की कमी।
81 फीसदी लोग ‘रीफ-सेफ’ सनस्क्रीन शब्द से अनजान मिले, जबकि यह शब्द समुद्री जीवन की सुरक्षा से जुड़े उत्पादों में इस्तेमाल होता है।
सनस्क्रीन में मौजूद यूवी फिल्टर नहाने, तैरने और कपड़े धोने के दौरान जल स्रोतों में पहुंचकर समुद्री जीवों को प्रभावित कर सकते हैं।
अध्ययन में मछलियों, शैवाल और प्रवाल भित्तियों पर सनस्क्रीन रसायनों के संभावित नुकसान को लेकर वैज्ञानिक चिंताएं सामने आई हैं।
शोधकर्ताओं ने सनस्क्रीन की लेबलिंग, पर्यावरणीय दावों और उपभोक्ता जानकारी को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए बेहतर नियमों की मांग की है।
गर्मी के मौसम में तेज धूप और बढ़ती गर्मी से बचने के लिए लोग बड़ी संख्या में सनस्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं। सनस्क्रीन त्वचा को सूरज की हानिकारक पराबैंगनी (यूवी) किरणों से बचाने में मदद करता है। लेकिन हाल ही में हुए एक नए अध्ययन ने सनस्क्रीन के एक ऐसे पहलू पर ध्यान खींचा है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
अध्ययन के अनुसार, आधे से ज्यादा लोगों ने कभी यह नहीं सोचा कि त्वचा को सूरज से बचाने वाला सनस्क्रीन समुद्र और समुद्री जीवों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। शोधकर्ताओं ने लोगों में सनस्क्रीन से होने वाले समुद्री प्रदूषण को लेकर जागरूकता की कमी पाई है।
55 प्रतिशत लोगों को नहीं थी जानकारी
यह अध्ययन ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ प्लायमाउथ और प्लायमाउथ मरीन लेबोरेटरी के शोधकर्ताओं ने किया है। यह ब्रिटेन में सार्वजनिक स्तर पर सनस्क्रीन प्रदूषण को लेकर लोगों की सोच और जानकारी को सीधे समझने वाला पहला अध्ययन बताया गया है। इसके नतीजे ‘मरीन पॉलिसी’ पत्रिका में प्रकाशित किए गए हैं।
शोध में प्लायमाउथ में अगस्त से अक्टूबर 2024 के बीच आयोजित तीन जन-जागरूकता कार्यक्रमों में 281 लोगों से सवाल पूछे गए। इनमें 89 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे साल में किसी न किसी समय सनस्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन 55 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि सनस्क्रीन समुद्री पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है। वहीं, 81 प्रतिशत लोग ‘रीफ-सेफ’ सनस्क्रीन शब्द से परिचित नहीं थे।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह आंकड़ा बताता है कि सनस्क्रीन के पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर आम लोगों और वैज्ञानिक जानकारी के बीच बड़ा अंतर है।
‘रीफ-सेफ’ शब्द को लेकर भी भ्रम
आज बाजार में कई सनस्क्रीन को ‘रीफ-सेफ’ यानी समुद्री प्रवाल भित्तियों के लिए सुरक्षित बताया जाता है। हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि यह एक अनियमित मार्केटिंग शब्द है। इसका इस्तेमाल कंपनियां अपने उत्पाद को समुद्री जीवन के लिए कम नुकसानदायक बताने के लिए कर सकती हैं, लेकिन इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि वह उत्पाद वास्तव में समुद्री जीवों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है।
इसलिए शोधकर्ताओं ने सनस्क्रीन के लेबल और उससे जुड़े दावों पर अधिक पारदर्शिता और स्पष्ट नियमों की जरूरत बताई है।
सनस्क्रीन समुद्र तक कैसे पहुंचता है?
सनस्क्रीन में मौजूद यूवी फिल्टर अलग-अलग रास्तों से समुद्र और दूसरे जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। जब लोग समुद्र में तैरते हैं या पानी से जुड़ी गतिविधियां करते हैं, तो त्वचा पर लगा सनस्क्रीन सीधे पानी में जा सकता है।
इसके अलावा, नहाने के दौरान त्वचा से उतरने वाला सनस्क्रीन सीवेज के पानी में पहुंचता है। सनस्क्रीन लगे तौलिये को धोने से भी इसके कुछ रसायन पानी में जा सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, कुछ यूवी फिल्टर मानव शरीर से बाहर निकलने के बाद भी जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। समस्या यह है कि सामान्य सीवेज और पानी साफ करने की तकनीकें ज्यादातर यूवी फिल्टर को पूरी तरह हटाने में प्रभावी नहीं हैं।
समुद्री जीवों पर असर की चिंता
वैज्ञानिकों ने सनस्क्रीन में इस्तेमाल होने वाले कुछ यूवी फिल्टर के समुद्री जीवों पर संभावित नुकसान का अध्ययन किया है। इन रसायनों से मछलियों, शैवाल और प्रवाल भित्तियों जैसे जीवों पर असर पड़ने की चिंता जताई गई है।
शोध के अनुसार, हर साल दुनिया भर में लगभग एक करोड़ टन यूवी फिल्टर तैयार किए जाते हैं। इनमें से 6,000 से 14,000 टन तक फिल्टर के प्रवाल भित्तियों वाले क्षेत्रों में पहुंचने का अनुमान है।
यूवी फिल्टर दुनिया के कई हिस्सों में समुद्री पानी और अन्य जल स्रोतों में पाए गए हैं। इन्हें पर्यटकों की भीड़ वाले समुद्री क्षेत्रों के अलावा आर्कटिक और अंटार्कटिका जैसे दूर-दराज के इलाकों में भी पाया गया है।
जागरूकता और बेहतर नियम जरूरी
शोधकर्ताओं का कहना है कि समस्या का समाधान लोगों को सनस्क्रीन इस्तेमाल करने से रोकना नहीं है। सूरज की हानिकारक यूवी किरणों से त्वचा की सुरक्षा जरूरी है। जरूरत इस बात की है कि लोगों को ऐसे उत्पादों के बारे में सही और स्पष्ट जानकारी दी जाए, जिनका पर्यावरण पर अपेक्षाकृत कम असर हो।
शोधकर्ताओं ने सरकारों और कंपनियों से सनस्क्रीन की सामग्री और पर्यावरणीय प्रभाव से जुड़ी जानकारी को अधिक पारदर्शी बनाने की अपील की है। साथ ही, ‘रीफ-सेफ’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर बेहतर नियम बनाने की जरूरत बताई गई है।
आने वाले समय में यह भी समझना जरूरी होगा कि लोग सनस्क्रीन खरीदते समय कीमत, एसपीएफ, पानी से न उतरने की क्षमता, एलर्जी या पर्यावरण से जुड़े दावों में से किस चीज को ज्यादा महत्व देते हैं। इससे ऐसी नीतियां बनाने में मदद मिल सकती है, जिनमें इंसानों की त्वचा की सुरक्षा और समुद्री पर्यावरण, दोनों का ध्यान रखा जा सके।