विश्व परमाणु उद्योग वैश्विक रिपोर्ट: भविष्य का ऊर्जा परिदृश्य किसका -  परमाणु ऊर्जा या अक्षय ऊर्जा ?
फोटो साभार: आईस्टॉक

विश्व परमाणु उद्योग वैश्विक रिपोर्ट: भविष्य का ऊर्जा परिदृश्य किसका -  परमाणु ऊर्जा या अक्षय ऊर्जा ?

आज दुनिया में 31 देश ऐसे हैं, जहां व्यावसायिक रूप से परमाणु बिजलीघर संचालित हो रहे हैं। लेकिन इनमें से भी केवल आठ देश ही नए रिएक्टर बना रहे हैं
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विश्व परमाणु उद्योग स्थिति रिपोर्ट के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दुनिया की ऊर्जा दिशा निर्णायक रूप से बदल चुकी है। बीते पच्चीस वर्षों से परमाणु ऊर्जा उद्योग लगभग ठहराव की स्थिति में है, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा उसी अवधि में तेजी से आगे बढ़ रही है। 

रपट के अनुसार वर्ष 2025 में पूरी दुनिया में जहाँ केवल 4.4 गीगावॉट नई परमाणु क्षमता का विस्‍तार हुआ है, वहीं सौर और पवन ऊर्जा में लगभग 793 गीगावॉट की वृद्धि हुई। ये आंकड़े बताते है कि वैश्विक ऊर्जा नीति और निवेश की दिशा अब किस ओर मुड़ चुकी है।

परमाणु ऊर्जा, जिसे कभी आधुनिकता और प्रगति का प्रतीक माना गया था, अब धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही है। इसके उलट अक्षय ऊर्जा न केवल ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख स्रोत बनती जा रही है, बल्कि वह एक नई सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक दिशा का प्रतिनिधित्व कर रही है।

रपट यह भी इंगित करती है कि परमाणु रिएक्टर बनाने वाले देशों की संख्या तेज़ी से घट रही है। पिछले दो वर्षों में यह संख्या 16 से घटकर 11 रह गई है। कई देशों ने या तो अपने अंतिम निर्माण परियोजना पूरी कर ली हैं या फिर नई परियोजनाओं को स्थगित कर दिया है। 

फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों ने अपने आख़िरी निर्माण प्रोजेक्ट पूरे कर लिए हैं। वहीं अर्जेंटीना, ब्राज़ील और जापान ने निर्माण कार्यों को या तो रोक दिया है या पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इन सबके बीच केवल पाकिस्तान ऐसा देश है, जो हाल के वर्षों में इस सूची में नया नाम बनकर उभरा है।

आज दुनिया में 31 देश ऐसे हैं, जहां व्यावसायिक रूप से परमाणु बिजलीघर संचालित हो रहे हैं। लेकिन इनमें से भी केवल आठ देश ही नए रिएक्टर बना रहे हैं। इसके अलावा तीन देश बांग्लादेश, मिस्र और तुर्किये पहली बार अपने यहां परमाणु रिएक्टर बना रहे हैं। गौरतलब है कि इन तीनों देशों में यह काम रूसी परमाणु उद्योग की सहायता से हो रहा है।

शोधकर्ताओं का विश्लेषण बताता है कि वर्ष 2025 परमाणु उद्योग के लिए एक और निराशाजनक वर्ष रहा। जिस समय दुनिया जलवायु संकट से जूझ रही है और स्वच्छ ऊर्जा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है, उस समय परमाणु ऊर्जा अपेक्षित भूमिका निभाने में असफल रही है। वर्ष में दुनिया भर में केवल चार नए रिएक्टर चालू हुए, जबकि सात रिएक्टर स्थायी रूप से बंद कर दिए गए।

आज वैश्विक स्तर पर केवल 404 परमाणु रिएक्टर ही संचालित हैं, जो 2002 के 438 से काफी कम हैं। परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी वैश्विक बिजली उत्पादन में घटकर 9 फीसद रह गई है, जबकि 1996 में यह 17.5 फीसद थी। 

यह गिरावट बताती है कि परमाणु ऊर्जा न केवल विस्तार में पीछे छूट रही है, बल्कि अपने ऐतिहासिक प्रभुत्व को भी खोती जा रही है। आमतौर पर परमाणु संयंत्र को बनने में दस से पंद्रह साल लगते हैं, और लागत अक्सर शुरुआती अनुमान से दोगुनी-तिगुनी हो जाती है।

परमाणु ऊर्जा केवल ऊर्जा उत्पादन का प्रश्न नहीं है, वह हमेशा से वैश्विक राजनीति, सैन्य शक्ति और सुरक्षा चिंताओं से भी जुड़ी रही है। यही कारण है कि जब भी किसी क्षेत्र में युद्ध या तनाव की स्थिति बनती है, तो परमाणु संयंत्र सबसे अधिक जोखिम वाले ठिकानों में गिने जाते हैं। वे स्थिर लक्ष्य होते हैं, जिन पर हमला केवल एक देश ही नहीं बल्कि पूरी मानवता के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।

चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी आपदाएँ बताती हैं कि एक दुर्घटना पूरे देश और कई पीढ़ियों को प्रभावित कर सकती है। लेकिन आज यह खतरा केवल तकनीकी या प्राकृतिक आपदा तक सीमित नहीं रह गया है।

इतिहास गवाह है कि परमाणु संयंत्रों पर सैन्य हमले कोई नई बात नहीं हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस खतरे को अभूतपूर्व रूप से उजागर कर दिया है। इज़राइल द्वारा इराक और सीरिया के परमाणु ठिकानों पर हमले, ईरान-इराक युद्ध में परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाना, और अमेरिका द्वारा इराक के शोध रिएक्टर को नष्ट करना वहीं यूक्रेन का जापोरिज़्झिया परमाणु संयंत्र, जो यूरोप का सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र है, आज भीषण सैन्य तनाव के बीच खड़ा है। ये सभी उदाहरण बताते हैं कि शांतिपूर्ण परमाणु हमेशा सैन्य राजनीति की छाया में रहा है।

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी  ने इस स्थिति को अत्यंत नाजुक और अस्थिर बताया है। वर्ष 2025 में चेर्नोबिल के क्षतिग्रस्त चौथे रिएक्टर के ऊपर बने सुरक्षा गुंबद पर एक ड्रोन हमले ने गंभीर नुकसान पहुँचाया था। यह घटना बताती है कि दशकों पुरानी परमाणु आपदाएँ भी आज के युद्धों में दोबारा खतरे में पड़ सकती हैं। इसके अलावा यूक्रेन में कम से कम 10 बार ऐसे सब-स्टेशनों पर हमले हुए, जो परमाणु संयंत्रों को बिजली आपूर्ति करते हैं। उर्जा एंजेसी के अनुसार ये सब-स्टेशन परमाणु सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि इन्हीं के माध्यम से रिएक्टरों को ठंडा रखने और अन्य सुरक्षा प्रणालियाँ चलाने के लिए बिजली मिलती है।

चीन एकमात्र बड़ा बाजार है, जहाँ अभी भी परमाणु निर्माण के कुछ प्रोजेक्‍ट देखे जा सकते है यही कारण है कि वर्ष 2025 में बनी अधिकांश नई निर्माण-शुरुआतें चीन में ही केंद्रित रहीं। 2025 में कुल 11 नए परमाणु रिएक्टरों के निर्माण कार्य की शुरुआत हुई, जिनसे लगभग 12 गीगावॉट क्षमता जुड़ने की संभावना है।

वहीं दूसरी ओर इसी कड़ी में ताइवान ने वर्ष 2025 में अपना अंतिम परमाणु रिएक्टर बंद कर दिया और वह परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को पूरी तरह छोड़ने वाला दुनिया का पाँचवाँ देश बन गया। इससे पहले इटली (1990), कज़ाख़स्तान (1999), लिथुआनिया (2009) और जर्मनी (2023) ऐसा कर चुके हैं।

इसके बावजूद वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन दावा करता है कि वर्ष 2050 तक वैश्विक परमाणु क्षमता 1,446 गीगावॉट तक पहुँच सकती है। लेकिन एसोसिएशन  इन दावों को अवास्तविक मानती है।

अब दूसरी ओर देखें तो अक्षय ऊर्जा अलग तस्वीर पेश करती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी  के अनुसार वर्ष 2025 से 2030 के बीच दुनिया में 4,600 गीगावॉट नई नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित होगी, जो पिछले पाँच वर्षों की तुलना में दोगुनी है। एजेंसी का अनुमान है कि वर्ष 2026 के मध्य तक अक्षय ऊर्जा कोयले को पछाड़कर दुनिया का सबसे बड़ा बिजली स्रोत बन जाएगी।

वर्ष 2024 में जहां वैश्विक बिजली उत्पादन में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी 32 फीसद थी, वहीं 2030 तक इसके 43 फीसद तक पहुँचने की संभावना है। 2025–2030 के दौरान वैश्विक बिजली मांग में होने वाली वृद्धि का 90 फीसद से अधिक हिस्सा नवीकरणीय ऊर्जा पूरी करेगी।

यह सिर्फ ऊर्जा का सवाल नहीं है, यह सत्ता और लोकतंत्र का सवाल भी है। परमाणु ऊर्जा एक अत्यधिक केंद्रीकृत मॉडल है। इसे केवल राज्य या विशाल कॉरपोरेट ढाँचे ही नियंत्रित कर सकते हैं। वहीं अक्षय ऊर्जा विकेन्द्रित मॉडल है। एक गांव, एक कस्बा, एक घर भी ऊर्जा उत्पादक बन सकता है। 

इसीलिए अक्षय ऊर्जा केवल तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि ऊर्जा लोकतंत्र की बुनियाद है। यह स्थानीय रोजगार पैदा करती है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करती है और नागरिकों को उपभोक्ता से उत्पादक बनने का अवसर देती है।

इस वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की स्थिति निर्णायक है। भारत एक ओर सौर ऊर्जा में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन  के ज़रिए भारत ने वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाई है। सौर और पवन क्षमता में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी स्टोरेज और विकेन्द्रित ऊर्जा प्रणालियाँ भारत के लिए एक नए ऊर्जा भविष्य के द्वार खोल रही हैं।

दूसरी ओर भारत आज भी परमाणु ऊर्जा को रणनीतिक आवश्यकता के रूप में देखता है। नए परमाणु संयंत्रों की योजनाएँ बनी हुई हैं, जबकि वे अत्यधिक महँगे, समय-साध्य और जोखिमपूर्ण हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ ऊर्जा का सवाल सामाजिक न्याय से जुड़ा है, यह एक गंभीर नीति-विरोधाभास है।

क्या भारत की ऊर्जा नीति कुछ गिने-चुने बड़े परियोजनाओं पर आधारित होगी, या वह गाँव-गाँव और घर-घर ऊर्जा पहुँचाने का साधन बनेगी? क्या ऊर्जा सत्ता के केंद्रीकरण का औज़ार होगी, या लोकतंत्र के विस्तार का माध्यम? अक्षय ऊर्जा इन सवालों का व्यावहारिक उत्तर देती है। यह कम लागत में अधिक बिजली देती है। स्थानीय समुदायों को सशक्त करती है, वही पर्यावरणीय न्याय को मजबूत भी करती है। साथ ही जलवायु संकट के समाधान में अधिक कारगर है।

परमाणु ऊर्जा इसके विपरित है। यह महंगी और सुरक्षा जोखिम पैदा करती है। यह सैन्य और राजनीतिक तनाव से जुड़ी रहती है। परमाणु ऊर्जा का संकट केवल तकनीकी नहीं, वैचारिक है। यह उस सोच की विफलता है जो मानती थी कि मानव सभ्यता को बचाने के लिए विशाल, केंद्रीकृत और जोखिमपूर्ण तकनीकों की ज़रूरत है।

भारत के सामने आज ऐतिहासिक अवसर है। वह या तो परमाणु ऊर्जा के बीसवीं सदी के मॉडल से चिपका रहे, या इक्कीसवीं सदी के अक्षय ऊर्जा मॉडल का नेतृत्व करे। परमाणु ऊर्जा बीते युग की शक्ति-राजनीति का प्रतीक है। अक्षय ऊर्जा आने वाले युग की नैतिकता और लोकतंत्र का। दुनिया के आँकड़े, युद्ध के अनुभव और तकनीकी रुझान तीनों एक ही दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं भविष्य परमाणु का नहीं, अक्षय ऊर्जा का है। अगर दुनिया भविष्य को सुरक्षित और टिकाऊ बनाना चाहती है, तो उसे परमाणु ऊर्जा के भ्रम से बाहर निकलकर नवीकरणीय ऊर्जा की वास्तविकता को अपनाना होगा।

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