

1973 का संकट
इसे पहले तेल संकट के रूप में भी जाना जाता है। इसकी शुरुआत अक्टूबर 1973 में इजराइल और अरब देशों के गठबंधन के बीच हुए योम किप्पुर युद्ध से हुई थी। ओपेक, खासकर इसके अरब सदस्यों ने इजराइल का समर्थन करने वाले देशों (मुख्य रूप से अमेरिका, पश्चिमी यूरोप और जापान) पर तेल प्रतिबंध लगा दिया था। तेल की कीमतें 3 डॉलर प्रति बैरल से चार गुना बढ़कर 12 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। अमेरिका व यूरोप के गैस स्टेशनों पर भारी किल्लत और लंबी कतारें दर्ज की गईं। इसके बाद वैश्विक आर्थिक मंदी और मुद्रास्फीति का दौर शुरू हुआ।
1979 का संकट
इसकी शुरुआत ईरानी क्रांति से हुई, जिसने ईरान के शाह को सत्ता से बेदखल कर दिया था। इसके कारण ईरान में तेल उत्पादन ठप हो गया और निर्यात में भारी गिरावट आई। दहशत में की गई खरीदारी और सट्टेबाजी की वजह से कीमतें और बढ़ गईं। तेल के दाम 15 डॉलर प्रति बैरल से दोगुने होकर 39 डॉलर तक पहुंच गए, जिससे वैश्विक महंगाई और आर्थिक सुस्ती फिर से बढ़ गई। इस संकट ने ऊर्जा संरक्षण और वैकल्पिक ऊर्जा के प्रति रुचि को और गहरा कर दिया।
1990 में कीमतों में उछाल
यह संकट अगस्त 1990 में इराक द्वारा कुवैत पर किए गए आक्रमण या खाड़ी युद्ध के कारण पैदा हुआ था। वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने कीमतों में भारी उछाल पैदा किया। तेल के दाम अस्थायी रूप से 20 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 40 डॉलर के पार चले गए। 1991 की शुरुआत में जब गठबंधन सेनाओं ने कुवैत को आजाद करा लिया, तब कीमतें फिर से स्थिर हो गईं।
2008 में तेल की कीमतों में उछाल
इसकी मुख्य वजह वैश्विक मांग में मजबूत बढ़ोतरी थी, खासतौर पर चीन और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर से। भू-राजनीतिक तनाव (पश्चिम एशिया) और सीमित अतिरिक्त क्षमता के कारण आपूर्ति में कमी आई। जुलाई 2008 में तेल की कीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। इसके बाद वैश्विक आर्थिक सुस्ती आई और 2008 के अंत में वैश्विक मंदी के कारण कीमतों में भारी गिरावट देखी गई।
2020 में तेल की कीमतों में गिरावट
इसकी शुरुआत कोविड-19 लॉकडाउन के कारण वैश्विक मांग में आई भारी गिरावट से हुई। साथ ही 2020 की शुरुआत में रूस और सऊदी अरब के बीच छिड़े प्राइस वॉर ने आपूर्ति की अधिकता को और बढ़ा दिया। अप्रैल 2020 में इतिहास में पहली बार डब्ल्यूटीआई कच्चे तेल का वायदा भाव कुछ समय के लिए नकारात्मक हो गया, जिससे तेल और गैस क्षेत्र में कई कंपनियां दिवालिया हो गईं।
2026 में तेल की कीमतों में उछाल
अमेरिका-ईरान तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें 2 मार्च को 80 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 9 मार्च को 120 डॉलर हो गईं। एक सप्ताह से भी कम समय में कीमतों में 50 प्रतिशत का उछाल दर्ज हुआ। ईंधन की बढ़ी कीमतें भारत और कई अन्य एशियाई देशों के लिए जोखिम बढ़ा रही हैं। उदाहरण के तौर पर परिवहन, विनिर्माण, उर्वरक और खाद्य उत्पादन की लागत में बढ़ोतरी की आशंका बनी हुई है।