तेल की राजनीति बनाम हरित भविष्य : दुनिया किस दिशा में?

तेल की राजनीति बनाम हरित भविष्य : दुनिया किस दिशा में?

ईरान से हॉर्मुज तक तेल मार्गों पर दबाव और चीन की हरित तकनीक में बढ़त के बीच सवाल: क्या पुरानी तेल राजनीति टिक पाएगी या स्वच्छ ऊर्जा नया भू-राजनीतिक शक्ति केंद्र बनेगी?
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आज की दुनिया में ऊर्जा सिर्फ बिजली या पेट्रोल-डीजल भर नहीं रह गई है, बल्कि यह ताकत, राजनीति और भविष्य की दिशा तय करने का सबसे बड़ा साधन बन चुकी है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों को इसी नजरिए से समझना जरूरी है।

पहली नजर में यह तेल की वापसी का सवाल लगता है, लेकिन असल में यह उस पकड़ को बनाए रखने की कोशिश है, जो अमेरिका लंबे समय से वैश्विक व्यवस्था पर बनाए हुए है। यह केवल संसाधनों की लड़ाई नहीं, बल्कि प्रभाव और भविष्य की दिशा तय करने की भी जंग है।

ट्रम्प की सोच में तेल सिर्फ एक आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि नियंत्रण का साधन है। उनका यह कहना कि उन्हें “ईरान का तेल लेना पसंद है”, केवल एक बयान नहीं बल्कि एक रणनीतिक सोच का संकेत है। इसके मायने ये है कि वे केवल तेल निकालना नहीं चाहते, बल्कि यह तय करना चाहते हैं कि तेल किस रास्ते से गुजरेगा, किसे मिलेगा और किस कीमत पर बिकेगा।

यही कारण है कि ईरान, वेनेज़ुएला जैसे देशों पर दबाव बनाया जाता है। यह दबाव आर्थिक भी होता है और राजनीतिक भी, ताकि ये देश अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने के बजाय अमेरिका के प्रभाव में काम करें।

दुनिया इस समय ऊर्जा के बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों का तेजी से बढ़ता उपयोग यह साफ दिखाता है कि भविष्य धीरे-धीरे तेल पर निर्भरता से बाहर निकल रहा है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, 2024 में स्वच्छ ऊर्जा में निवेश लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंंच गया, जो जीवाश्म ईंधनों से अधिक है। यह बदलाव केवल पर्यावरण की चिंता के कारण नहीं, बल्कि आर्थिक कारणों से भी हो रहा है क्योंकि अब स्वच्छ ऊर्जा कई मामलों में सस्ती और टिकाऊ साबित हो रही है।

इलेक्ट्रिक वाहनों की बात करें तो 2023 में दुनिया भर में लगभग 1.4 करोड़ गाड़ियाँ बिकीं, जो कुल कार बिक्री का करीब 18 प्रतिशत था। इसके बाद यह रफ्तार और तेज हुई है और 2025-26 तक इनकी हिस्सेदारी 20 प्रतिशत के पार पहुँचती नजर आ रही है। कई देशों में तो यह बदलाव और भी तेज है, जहाँ नई गाड़ियों की बिक्री में हर चौथी या पाँचवीं गाड़ी इलेक्ट्रिक हो चुकी है।

पिछले एक दशक में सौर ऊर्जा की लागत लगभग 80–90 प्रतिशत तक घट चुकी है, जबकि पवन ऊर्जा भी पहले से काफी सस्ती हो गई है। बैटरी की कीमतों में भी करीब 85–90 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि अब कई देशों में सौर ऊर्जा कोयले से सस्ती पड़ने लगी है और इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ धीरे-धीरे आम लोगों की पहुँच में आ रही हैं।

इन तथ्यों के बावजूद ट्रम्प की नीतियाँ इस बदलाव के उलट दिशा में जाती दिखती हैं। वे जलवायु नीतियों को कमजोर करते हैं, पवन ऊर्जा जैसी परियोजनाओं को रोकते हैं और तेल-गैस उत्पादन को बढ़ावा देते हैं। इसके साथ ही वे अन्य देशों पर दबाव डालते हैं कि वे अमेरिकी गैस खरीदें। यह साफ संकेत है कि उनका लक्ष्य केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना है।

तेल उद्योग की स्थिति भी इस दिशा में संकेत देती है। बड़ी तेल कंपनियाँ अब नए बड़े निवेश करने से हिचक रही हैं। उत्पादन बढ़ाने के बजाय वे अपने मौजूदा ढांचे को संभालने और लागत कम करने पर ध्यान दे रही हैं। वैश्विक स्तर पर भी तेल और गैस में निवेश की रफ्तार उतनी तेज नहीं है, जितनी पहले हुआ करती थी।

ईरान के साथ बढ़ता तनाव केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि ऊर्जा मार्गों और वैश्विक आपूर्ति पर नियंत्रण की लड़ाई है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे रास्तों से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल गुजरता है, इसलिए यहाँ किसी भी तरह का तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

लेकिन इस रणनीति का एक उल्टा असर भी है। जब भी तेल आपूर्ति में खतरा बढ़ता है, देश वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ने लगते हैं। यानी जिस नीति के जरिए तेल की अहमियत बढ़ाने की कोशिश की जाती है, वही नीति लंबे समय में तेल की निर्भरता कम करने का कारण भी बन जाती है।

भारत इस पूरे परिदृश्य में महत्वपूर्ण लेकिन जटिल स्थिति में खड़ा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी का असर सीधे महंगाई और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

दूसरी ओर, भारत ने भविष्य की तैयारी भी शुरू कर दी है। 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य इसका बड़ा उदाहरण है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल हो चुका है। इलेक्ट्रिक वाहनों, खासकर दोपहिया और तीनपहिया वाहनों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है।

फिर भी भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन की है। उसे एक तरफ आज की जरूरतों के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा सुनिश्चित करनी है, वहीं दूसरी तरफ भविष्य के लिए साफ और टिकाऊ विकल्पों में निवेश बढ़ाना है।

भू-राजनीतिक स्तर पर भी भारत को संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। अमेरिका, रूस और मध्य-पूर्व तीनों के साथ संबंध बनाए रखना उसकी जरूरत है। ऐसे में ट्रम्प जैसी नीतियाँ भारत के लिए स्थिति को और जटिल बना देती हैं।

वैश्विक स्तर पर देखे तो बदलाव साफ दिखाई दे रहे हैं। चीन हरित तकनीकों में तेजी से आगे बढ़ रहा है और उत्पादन से लेकर बाजार तक अपनी पकड़ मजबूत कर चुका है। सोलर पैनल, बैटरी और इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में उसकी बढ़त यह संकेत देती है कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था का केंद्र धीरे-धीरे बदल रहा है।

ऐसे में अमेरिका का तेल के सहारे अपनी ताकत बनाए रखने का प्रयास बदलती दुनिया के खिलाफ एक संघर्ष जैसा लगता है। यह एक तरह से पुराने और नए रास्तों के बीच खींचतान है एक तरफ वह पुराना मॉडल है जो तेल और गैस पर टिका है, और दूसरी तरफ वह नया रास्ता है जो स्वच्छ ऊर्जा की ओर जा रहा है।

ट्रम्प की नीतियाँ पहले रास्ते को बचाने की कोशिश करती हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया धीरे-धीरे दूसरे रास्ते पर आगे बढ़ रही है। यह बदलाव धीमा जरूर है, लेकिन लगातार और गहरा है।

भारत जैसे देशों के लिए यही समय सबसे अहम है। अगर सही नीतियाँ अपनाई जाएँ, तो यह बदलाव अवसर बन सकता है। भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकता है। लेकिन अगर निर्णयों में देरी हुई या केवल पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बनी रही, तो आने वाले समय में चुनौतियाँ और बढ़ सकती हैं।

यह कहना गलत नहीं होगा कि तेल की वापसी वास्तव में वापसी नहीं है, बल्कि एक कोशिश है पुरानी व्यवस्था को बचाने की कोशिश। जबकि दुनिया धीरे-धीरे एक नए ऊर्जा युग की ओर बढ़ रही है। अब असली सवाल यह नहीं है कि तेल का दौर खत्म होगा या नहीं, बल्कि यह है कि आने वाले समय की ऊर्जा व्यवस्था किसके नियंत्रण में होगी और उसमें भारत अपनी जगह कैसे तय करेगा।

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