एथेनॉल ब्लेंड नीति: हम जल्दी में ही हैं!
भारतीय सड़कों पर इन दिनों खामोश से लेकिन बेहद प्रभावशाली बदलाव दौड़ रहा है। दशकों से "कितना माइलेज देती है" के मंत्र पर चलने वाले भारतीयों के लिए पेट्रोल पंपों पर वाहन के लिए मिलने वाला ईंधन अब बदल चुका है।
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और विदेशी मुद्रा बचाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य के साथ सरकार ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (ईं 20) को अनिवार्य कर दिया है। जहाँ सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि और 'आत्मनिर्भर भारत' की ओर एक ठोस कदम बता रही है, वहीं जमीनी स्तर पर वाहन मालिकों, विशेषज्ञों और उद्योग जगत के बीच इस 'ट्रांजिशन' को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है। साल भर पहले, मुख्य सवाल था कि "क्या हम बहुत जल्दी में हैं?"।
आज, जब ‘ईं 20’ ईंधन देश भर में अनिवार्य कर दिया गया है, तो जवाब उन लाखों वाहन मालिकों की शिकायतों में छिपा है जो कम माइलेज और इंजन की खराबी से जूझ रहे हैं। पिछले साल जो एक नीतिगत चेतावनी भर थी, आज वह सड़कों पर एक 'नेशनल एक्सपेरिमेंट' का रूप ले रही है।
क्यों जरूरी है ‘ईं 20’?
सरकार के लिए ईं 20 केवल एक ईंधन नीति नहीं, बल्कि उर्जा सुरक्षा और वैश्विक नीति के सन्दर्भ में एक व्यापक रणनीतिक ढाल है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग दो तिहाई हिस्सा आयात करता है, जिससे अर्थव्यवस्था वैश्विक तेल कीमतों और पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रति संवेदनशील रहती है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, एथेनॉल मिश्रण ने अब तक लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत की है। इसके अलावा, एथेनॉल का ऑक्टेन नंबर पेट्रोल से अधिक होता है, जिससे ईंधन अधिक सफाई से जलता है और कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है। किसानों के दृष्टिकोण से देखें तो गन्ने, मक्का और अनाज की ख़राब पैदावार से एथेनॉल बनाने की नीति ने कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक नया बाज़ार खोल दिया है, जिससे किसानों की आय में वृद्धि की उम्मीद जताई गई है।
माइलेज की हकीकत
जैसे ही ‘ईं 20’ पूरे देश में मानक ईंधन बन गया, वैसे ही "माइलेज कम होने" की शिकायतों ने सोशल मीडिया से लेकर दफ्तरों तक में जगह बना ली। यहाँ सरकारी आंकड़ों और जनता के अनुभव के बीच एक बड़ी खाई नजर आती है।
ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया और सरकार का कहना है कि प्रयोगशाला परीक्षणों में माइलेज में केवल 1-6% की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, आम आदमी के लिए यह गणित अलग है। सिटी ड्राइविंग में अगर माइलेज 15 किमी से घटकर 14.5 किमी हो जाए तो शायद कोई फर्क न पड़े, लेकिन लोगों की शिकायत है कि गिरावट इससे कहीं अधिक है।
सिटिजन प्लेटफॉर्म 'लोकलसर्कल्स' द्वारा 44,000 से अधिक वाहन मालिकों पर किए गए एक विस्तृत सर्वे के अनुसार, 66% मालिकों ने पाया कि उनके वाहनों के माइलेज में 10% से अधिक की गिरावट आई है, जबकि 23% लोगों ने तो 20% से भी ज़्यादा कमी की बात कही है।
तकनीकी रूप से इसका मुख्य कारण एथेनॉल की कम 'कैलोरीफिक वैल्यू' है; एथेनॉल में पेट्रोल की तुलना में ऊर्जा घनत्व कम होती है, जिसका सीधा मतलब है कि उतनी ही शक्ति पैदा करने के लिए इंजन को अधिक ईंधन जलाना पड़ता है। पुराने इंजन, जिनमें आधुनिक इंजनों की तरह एडाप्टिव मैनेजमेंट सिस्टम नहीं होते, इस ईंधन के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते और परिणामस्वरूप उपभोक्ता की जेब पर बोझ बढ़ जाता है।
इंजन की सेहत और तकनीकी चुनौतियां
माइलेज के बाद सबसे बड़ी चिंता वाहनों के रख रखाव को लेकर आ रही है। एथेनॉल वातावरण से नमी सोखने वाला तरल होता है। यही नमी पुराने वाहनों के मेटल फ्यूल टैंक, इंजेक्टर और फ्यूल लाइनों में जंग का कारण बनती है।
यद्यपि वाहन निर्माता सार्वजनिक रूप से सुरक्षा का दावा कर रहे हैं, लेकिन ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया की एक आंतरिक रिपोर्ट, जो सरकार और उद्योग के लिए कड़ी का काम करती है, स्पष्ट साक्ष्य पेश करती है कि ‘ईं 20’ ईंधन उन वाहनों के रबर घटकों (होज, गास्केट, सील और ओ-रिंग्स) को तेज़ी से खराब कर सकता है जो मूल रूप से केवल E10 के लिए प्रमाणित थे, यानी 2023 के पहले के वाहन।
प्रयोगशाला परीक्षण में नए मानक के टर्बोचार्ज्ड इंजन 265 घंटों के ही बाद समस्याएँ दिखानी शुरू कर दीं, और एक अन्य मामले में इंजन के 'एग्जॉस्ट वाल्व' गड़बड़ी दर्ज की गई, जो अत्यधिक गर्मी और यांत्रिक दबाव के कारण पुर्जों के क्षतिग्रस्त होने का संकेत है।
असल चुनौती उन पुराने वाहनों (प्री-2023) के लिए है जो देश के कुल वाहनों का लगभग 80% हिस्सा हैं; इन इंजनों में आधुनिक इंजनों की तरह 'एडाप्टिव मैनेजमेंट सिस्टम' नहीं होते जो ईंधन की प्रकृति के अनुसार खुद को ढाल सकें। जब प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में नए इंजन 'रेड फ्लैग' दिखा रहे हैं, तो पुराने वाहनों के ईंधन प्रणालियों पर ‘ईं 20’ का प्रभाव एक गंभीर जोखिम बन जाता है।
इन प्रयोगशाला साक्ष्यों का समर्थन उपभोक्ताओं के अनुभव से भी होता है; 44000 वाहन मालिको के सर्वे में 55% लोगो ने यह भी बताया कि 2025 की शुरुआत से उनके वाहनों में रख-रखाव और पुर्जों के मरम्मत की जरूरते बढ़ी हैं।
'नेशनल एक्सपेरिमेंट' और पारदर्शिता का अभाव
इस पूरे प्रक्रम में सबसे विवादित मोड़ तब आया जब सरकार के अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान ‘ईं 20’ को एक "जारी प्रयोग" करार दिया और कहा कि इसके परिणाम अगले साल तक स्पष्ट होंगे।
हालांकि कानून मंत्रालय ने बाद में इस टिप्पणी से पल्ला झाड़ लिया, लेकिन इसने जनता के बीच भरोसे के संकट को जन्म दिया। सवाल यह उठा कि यदि यह अभी भी एक 'प्रयोग' है और डेटा अभी भी इकट्ठा किया जा रहा है, तो फिर इसे देश के करोड़ों 'लिगेसी' (पुराने) वाहनों के लिए अनिवार्य क्यों कर दिया गया जो इस ईंधन के लिए डिज़ाइन ही नहीं थे?
आज सड़कों पर मौजूद लगभग 80% वाहन 2023 के पहले के हैं, जिन्हें बिना किसी विकल्प के इस 'नेशनल एक्सपेरिमेंट' का हिस्सा बना दिया गया है।मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टो के अनुसार सरकार ने इस प्रकल्प को लागू करने के पहले वाहन निर्माताओं और तेल रिफाइनरों के साथ व्यापक परामर्श तो किया, लेकिन इन तकनीकी परीक्षणों के परिणामों को आम वाहन खरीदारों के साथ साझा करने में भारी कोताही बरती, जिससे इंजन की सेहत को लेकर भ्रामक जानकारियों और अविश्वास पनपा।
भारत की इस नीति की तुलना अक्सर ब्राजील से की जाती है, लेकिन हकीकत में वहाँ के ग्राहकों के पास पंप पर शुद्ध पेट्रोल या अलग-अलग प्रतिशत वाले सम्मिश्रण 'ईंधन चुनने की आज़ादी' होती है, और छूट भी मिलती है।
इसके विपरीत, भारतीय उपभोक्ताओं को एथेनॉल के कम इंधन क्षमता और 10-20% तक गिरते माइलेज के बावजूद पूरी कीमत चुकानी पड़ रही है। इसके अलावा, पुराने वाहनों के मालिकों के लिए वारंटी और बीमा दावों को लेकर कानूनी अस्पष्टता बनी हुई है, और सरकार इस अनिश्चितता के माहौल में भी एक कदम आगे बढ़ते हुए एथेनॉल के अलग अलग समिश्रण ईं 22, ईं 25, ईं 27 और ईं 30 के मानक के लिए अधिसूचना जारी कर चुकी है।
पर्यावरण और भविष्य की राह
एक और पहलू जिस पर अब तक चर्चा कम हुई है, वह है एथेनॉल, पानी और खाद्यान्न से जुड़ी पर्यावरणीय विरोधाभास। भारत वर्तमान में भारतीय खाद्य निगम के बचे हुए चावल और गन्ने से एथेनॉल बना रहा है। चावल और गन्ना एक बहुत अधिक पानी सोखने वाली फसल है और मिथेन उत्सर्जन का बड़ा स्रोत भी है।
हालांकि चावल की जगह कम पानी उपयोग वाले l मक्के के खेतों को प्रोत्साहन मिल रहा है। यहाँ तक कि कम पानी लेने वाले फीडस्टॉक के साथ भी एथेनॉल के लिए पानी की एक भारी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी जो अपने आप में एक बड़ी विरोधाभास है। सनद रहे एक लीटर एथेनॉल बनाने में लगभग 2500 लीटर पानी की जरुरत होती है।
पानी के साथ-साथ इस प्रकल्प में आर्थिक विरोधाभास के पहलु से भी इंकार नहीं कर सकते है। सरकार पहले ऊंचे मूल्य पर चावल की खरीद करती है, फिर उसके भंडारण पर पैसा खर्च करती है, और अंततः इसे एथेनॉल उत्पादकों को भारी रियायती दरों पर बेच देती है। इस प्रकार एथेनॉल उत्पादन मुख्य रूप से अधिक चावल के निस्तारण पर टिकी हुई प्रतीत है जो आर्थिक रूप से न्यायसंगत नहीं है।
मौजूदा उपजे भ्रम, तकनीकी चिंताओं और वाहन निर्माताओं के सुझाव को देखते हुए सरकार भविष्य की ईं 25 (25% एथेनॉल) को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का संकेत दिया है। और यह जरुरी भी है ताकि इंजनों की री-कैलिब्रेशन और सुरक्षा मानकों के बीच तालमेल बैठने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।
‘ईं 25’ नीति के आर्थिक और राष्ट्रीय हित निर्विवाद हैं, लेकिन इसका सफल होना केवल आंकड़ों की बचत पर नहीं, बल्कि आम नागरिक के विश्वास पर निर्भर करता है। वर्तमान में उपभोक्ता खुद को एक ऐसे 'प्रयोग' का हिस्सा महसूस कर रहा है जिसकी लागत वह कम माइलेज और बढे हुए रख रखाव के खर्चे के रूप में चुका रहा है।
जब तक प्रयोगशाला के 'रेड फ्लैग्स' और सड़कों पर उपभोक्ताओं के कड़वे अनुभव के बीच की खाई बनी रहेगी, तब तक इस नीति को 'जन-केंद्रित' नहीं माना जा सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि सफलता के लिए सरकार को तीन स्तरों पर काम करना होगा: पहला, पंपों पर उपभोक्ताओं को ईंधन का विकल्प देना; दूसरा, एथेनॉल उत्पादन के लिए टिकाऊ फसलों का चुनाव करना; और तीसरा, नीतिगत पारदर्शिता के साथ पुराने वाहनों के मालिकों को विश्वास में लेना। जब तक ऐसा नहीं होता, ‘ईं 25’ की यह दौड़ एक ऐसी सड़क पर बनी रहेगी जहाँ सरकार की गति तेज है, लेकिन जनता का आत्मविश्वास डगमगा रहा है।


