जलवायु संकट: तेल-गैस-कोयले से हर साल हो रहा है 12.4 करोड़ टन मीथेन उत्सर्जन

आईईए का आकलन इस संकट के बीच उम्मीद की एक किरण भी दिखाता है, जीवाश्म ईंधनों से होने वाले कुल मीथेन उत्सर्जन का करीब 70 फीसदी, यानी 8.5 करोड़ टन, मौजूदा तकनीकों से ही कम किया जा सकता है
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सारांश
  • दुनिया भले ही ऊर्जा उत्पादन के नए रिकॉर्ड बना रही हो, लेकिन इसके साथ एक खामोश और खतरनाक संकट भी गहराता जा रहा है और यह खतरा है बढ़ता मीथेन उत्सर्जन।

  • अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, 2025 में तेल, गैस और कोयले से हर साल करीब 12.4 करोड़ टन मीथेन उत्सर्जित हो रही है और इसमें कमी के कोई ठोस संकेत नहीं दिख रहे।

  • चिंताजनक यह है कि यह गैस जलवायु परिवर्तन को तेज करने में बेहद प्रभावी है, फिर भी इसे कम करने के सस्ते और कारगर उपाय मौजूद होने के बावजूद दुनिया उनका पूरा उपयोग नहीं कर पा रही।

  • रिपोर्ट एक उम्मीद भी दिखाती है, जीवाश्म ईंधन से होने वाले करीब 70 फीसदी (8.5 करोड़ टन) मीथेन उत्सर्जन को मौजूदा तकनीकों से ही कम किया जा सकता है, जिसमें से 3.5 करोड़ टन उत्सर्जन बिना किसी अतिरिक्त लागत के रोका जा सकता है।

  • इतना ही नहीं, अगर रिसाव और फ्लेयरिंग पर लगाम लगाई जाए, तो हर साल 200 अरब घन मीटर गैस बचाई जा सकती है।

  • इसके बावजूद, वैश्विक प्रयास अभी धीमे हैं और उत्सर्जन कुछ ही देशों में केंद्रित है। साफ है, समाधान मौजूद है, लेकिन असली चुनौती अब भी राजनीतिक इच्छाशक्ति और कार्रवाई की है।

दुनिया में भले ही ऊर्जा उत्पादन नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया हो, लेकिन इसके साथ जुड़ा एक खामोश संकट भी गहराता जा रहा है। यह संकट है दुनिया में बढ़ता मीथेन उत्सर्जन

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने अपने ताजा विश्लेषण ‘ग्लोबल मीथेन ट्रैकर 2026’ में जानकारी दी है कि 2025 में वैश्विक स्तर पर जीवश्म ईंधन की वजह से उत्सर्जित होने वाला मीथेन अब भी रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब बना हुआ है। चिंता की बात यह है कि इसे कम करने के तमाम वादों के बावजूद इसमें गिरावट के कोई संकेत नहीं दिख रहे।

यह स्थिति तब है, जब इस गैस के बढ़ते उत्सर्जन को कम करने के लिए सस्ती और कारगर तकनीकें पहले से मौजूद हैं।

रिकॉर्ड उत्पादन, रिकॉर्ड उत्सर्जन

रिपोर्ट ने इस कड़वी सच्चाई को भी उजागर किया है जहां 2025 में तेल, गैस और कोयले का उत्पादन इतिहास के अपने सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच गया। इसके साथ ही इन जीवाश्म ईंधनों की वजह से हर साल करीब 12.4 करोड़ टन मीथेन भी वातावरण में घुल रही है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हमारी ऊर्जा व्यवस्था की भारी कीमत है, जो जलवायु परिवर्तन के रूप समाज को भुगतनी होगी।

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आंकड़े दर्शाते हैं कि अकेले तेल क्षेत्र से 4.5 करोड़ टन मीथेन उत्सर्जित हो रहा। वहीं साथ ही कोयला खनन 4.3 करोड़ टन और प्राकृतिक गैस भी इसमें 3.6 करोड़ टन का योगदान दे रहे हैं।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती, दुनिया के कई हिस्सों में आज भी लोग लकड़ी, गोबर और अन्य पारंपरिक ईंधनों पर निर्भर हैं, जिनके अधूरे दहन से हर साल करोड़ दो करोड़ टन मीथेन और निकल रही है। यानी आधुनिक उद्योग से लेकर रोजमर्रा की रसोई तक, मीथेन का यह अदृश्य जाल हमारी हवा को लगातार जहरीला बना रहा है।

सबसे अहम और चौंकाने वाली बात यह है कि जीवाश्म ईंधन क्षेत्र अकेले ही इंसानी गतिविधियों से होने वाले कुल मीथेन उत्सर्जन के करीब 35 फीसदी के लिए जिम्मेवार है, यानी हर तीसरा कण उसी से निकल रहा है।

कुछ देशों में सुधार, लेकिन तस्वीर अधूरी

रिपोर्ट में इस तथ्य को भी उजागर किया है कि भले ही वैश्विक तस्वीर चिंताजनक है, लेकिन कुछ देशों में सुधार के संकेत मिले हैं। उदाहरण के लिए अल्जीरिया और अर्जेंटीना में तेल और गैस परियोजनाओं से होने वाली 'सुपर-एमिटर' घटनाओं में कमी आई है। इसी तरह चीन में कोयला खदानों से उत्सर्जन की वृद्धि धीमी पड़ी है, जिसका श्रेय सख्त नियमों और उत्पादन में बदलाव को जाता है।

हालांकि इसके बावजूद, वैश्विक स्तर पर उत्पादन बढ़ने के कारण कुल उत्सर्जन में कमी नहीं आ पाई है। यानी, दक्षता में सुधार हुआ है, लेकिन उत्पादन की रफ्तार उससे तेज है।

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सच कहें तो मीथेन उत्सर्जन को कम करना सिर्फ जलवायु के लिए ही नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी बेहद अहम है, क्योंकि आज दुनिया भर में बड़ी मात्रा में कीमती प्राकृतिक गैस बेवजह बर्बाद हो रही है, कहीं पाइपलाइन और उपकरणों से हो रहे रिसाव (लीक) के जरिए, तो कहीं फ्लेयरिंग के तहत इसे जलाकर खत्म कर दिया जाता है और वेंटिंग के जरिए सीधे वातावरण में छोड़ दिया जाता है।

आईईए का अनुमान है कि अगर मीथेन के रिसाव पर लगाम लगा दी जाए तो हर साल करीब 100 अरब घन मीटर गैस बचाई जा सकती है। वहीं, फ्लेयरिंग को खत्म करके इतनी ही अतिरिक्त यानी करीब 100 अरब घन मीटर और गैस और उपलब्ध हो सकती है। मतलब कि कुल मिलाकर 200 अरब घन मीटर गैस, जो कई देशों की सालाना जरूरत के बराबर है, बिना उत्पादन बढ़ाए ही बचाई जा सकती है।

यह आंकड़ा ऐसे समय में और भी मायने रखता है, जब मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण वैश्विक एलएनजी व्यापार का करीब 20 फीसदी यानी लगभग 110 अरब घन मीटर प्रभावित हो रहा है। साफ है, मीथेन पर काबू पाना सिर्फ पर्यावरण की लड़ाई नहीं, बल्कि ऊर्जा संकट से निकलने का सीधा और असरदार रास्ता भी है।

10 देशों में सिमटा 70 फीसदी उत्सर्जन

रिपोर्ट एक और अहम सच्चाई उजागर करती है कि मीथेन उत्सर्जन की यह समस्या दुनिया के कुछ गिने-चुने देशों में केंद्रित है। रिपोर्ट दर्शाती है कि 2025 में जीवाश्म ईंधन से होने वाले 8.5 करोड़ टन से अधिक मीथेन उत्सर्जन के लिए महज दस देश जिम्मेवार थे। 

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इनमें कोयले पर भारी निर्भरता के चलते चीन सबसे बड़ा उत्सर्जक बनकर उभरा, जबकि उसके बाद अमेरिका और रूस का स्थान है। यह तस्वीर साफ संकेत देती है कि अगर ये कुछ बड़े देश ईमानदारी से जल्द से जल्द ठोस कदम उठाएं, तो वैश्विक स्तर पर मीथेन संकट को काफी हद तक काबू में लाया जा सकता है, यानी समाधान दूर नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के बेहद करीब है।

बेहद सस्ता—कभी-कभी मुफ्त—है समाधान

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मीथेन उत्सर्जन कम करने के उपाय न केवल तकनीकी रूप से संभव हैं, बल्कि कई मामलों में बिना किसी अतिरिक्त लागत के लागू किए जा सकते हैं।

आईईए का आकलन इस संकट के बीच उम्मीद की एक किरण दिखाता है, जीवाश्म ईंधनों से होने वाले कुल मीथेन उत्सर्जन का करीब 70 फीसदी, यानी 8.5 करोड़ टन, आज की मौजूदा तकनीकों से ही कम किया जा सकता है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से करीब 3.5 करोड़ टन उत्सर्जन तो बिना किसी अतिरिक्त लागत के रोका जा सकता है।

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वजह साफ है, जो गैस आज रिसकर या जलकर बर्बाद हो रही है, बाजार में उसकी कीमत उसे बचाने की लागत से कहीं ज्यादा है। यानी यह सिर्फ पर्यावरण बचाने का नहीं, बल्कि समझदारी से संसाधन और पैसा बचाने का भी मौका है, जहां नुकसान रोकना ही मुनाफे में बदल सकता है।

तेल-गैस क्षेत्र में सबसे ज्यादा संभावना

तेल और गैस क्षेत्र में उत्सर्जन का करीब 80 फीसदी हिस्सा 'अपस्ट्रीम' (उत्पादन के शुरुआती चरण) से आता है। यही सबसे बड़ा अवसर भी है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर यहां उपलब्ध तकनीकों को लागू किया जाए, तो पांच करोड़ टन से अधिक उत्सर्जन कम किया जा सकता है।

साथ ही इसकी मदद से प्राकृतिक गैस उत्पादन में अपस्ट्रीम स्तर पर मीथेन उत्सर्जन की वैश्विक औसत तीव्रता को एक फीसदी से घटाकर 0.2 फीसदी तक लाया जा सकता है।

इसे काबू करने के मुख्य उपायों में रिसाव की पहचान और समय पर मरम्मत, मीथेन छोड़ने वाले उपकरणों की जगह इलेक्ट्रिक उपकरण लगाना, वाष्प पुनर्प्राप्ति इकाइयों का उपयोग करना और अतिरिक्त गैस को बर्बाद करने के बजाय बिजली उत्पादन में इस्तेमाल करना शामिल है। साफ है, अगर इन पर ठोस नीतियां बनें और उन्हें सख्ती से लागू किया जाए, तो आधा संकट तो यहीं काबू में आ सकता है।

अच्छी खबर यह है कि दुनिया में पहले से ही ऐसी नीतियां मौजूद हैं, जो मीथेन उत्सर्जन को तेजी से घटा सकती हैं।

अगर दुनिया भर के देश पहले से परखी नीतियों जैसे फ्लेयरिंग और वेंटिंग पर रोक, नियमित और अनिवार्य लीक जांच, और कड़े तकनीकी मानक को अपनाएं तो वैश्विक तेल और गैस क्षेत्र से होने वाला मीथेन उत्सर्जन को 50 फीसदी से भी ज्यादा घटाया जा सकता है। इसके साथ ही अगर उन्नत कदम, जैसे उत्सर्जन की कीमत तय करना (कार्बन प्राइसिंग), भी लागू किए जाएं, तो यह कमी 75 फीसदी से ऊपर पहुंच सकती है। यानी सही नीतियां हों, तो मीथेन संकट पर बड़ी और तेज चोट संभव है।

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आईईए के मुताबिक नॉर्वे इसका बेहतरीन उदाहरण है, जिसने 1971 में फ्लेयरिंग पर रोक लगाई और बाद में टैक्स लागू किया, आज वहां उत्सर्जन दुनिया में सबसे कम है।

वैश्विक वादे बढ़े, लेकिन जमीन पर रफ्तार सुस्त

मीथेन संकट को लेकर दुनिया में प्रतिबद्धताएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन असल चुनौती अब भी कायम है। 2021 में शुरू हुआ “ग्लोबल मीथेन प्लेज” अब 159 देशों तक पहुंच चुका है, जो 2030 तक उत्सर्जन में 30 फीसदी कटौती का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। उद्योग जगत भी पीछे नहीं है आज तेल और गैस उत्पादन का आधे से ज्यादा हिस्सा ऐसी कंपनियों के दायरे में आ चुका है, जो “नियर-जीरो” उत्सर्जन का वादा कर रही हैं।

लेकिन सच यह है कि इन बड़े-बड़े वादों के बावजूद जमीनी हकीकत धीमी है। आंकड़े बताते हैं कि उत्सर्जन में अब तक वैसी गिरावट नहीं आई, जैसी इन लक्ष्यों से उम्मीद की जा रही थी। यानी इरादे तो मजबूत दिखते हैं, पर कार्रवाई की रफ्तार अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुंची, जहां से असली बदलाव दिखाई दे सके।

इसी तरह अब दर्जनों सैटेलाइट अंतरिक्ष से मीथेन उत्सर्जन की निगरानी कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम मीथेन अलर्ट एंड रिस्पांस सिस्टम (मार्स) तो ऐसे बड़े रिसाव की जानकारी सीधे सरकारों और कंपनियों को देता है, ताकि तुरंत कार्रवाई हो सके।

समाधान सामने, इच्छाशक्ति की कमी

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू चिंताजनक है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, अगर 2025 में इन अलर्ट्स पर समय रहते ठोस कदम उठाए गए होते, तो वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में करीब 60 लाख टन तक की कमी लाई जा सकती थी। यानी तकनीक मौजूद है, चेतावनियां भी मिल रही हैं, कमी सिर्फ कार्रवाई की है।

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देखा जाए तो मीथेन उत्सर्जन आज जलवायु संकट की सबसे बड़ी और शायद सबसे आसानी से सुलझाई जा सकने वाली चुनौतियों में से एक है। तकनीक हमारे पास है, नीतियों का खाका तैयार है और आर्थिक फायदे भी बिल्कुल साफ हैं। फिर भी 2025 के आंकड़े एक कड़वी सच्चाई उजागर करते हैं, कि दुनिया अब तक इस सुनहरे मौके को पूरी तरह भुना नहीं पाई है।

ऐसे में अगर अब भी निर्णायक कदम न उठाए गए, तो यह ‘अदृश्य गैस’ आने वाले वर्षों में जलवायु संकट को और गहरा कर देगी। लेकिन अगर इरादों को तेजी से ठोस कार्रवाई में बदला गया, तो यही संकट एक ऐतिहासिक मौके में बदल सकता है, जहां ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और जलवायु समाधान को निर्णायक बढ़त मिलेगी।

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