

भारत सरकार बिजली क्षेत्र के बिखरे हुए आंकड़ों को एक राष्ट्रीय मंच पर लाने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय विद्युत मंत्रालय ने ड्राफ्ट नेशनल इलेक्ट्रिसिटी डेटा शेयरिंग फ्रेमवर्क (एईएडीएसएफ), 2026 जारी कर लोगों की टिप्पणियां मांगी हैं, जिसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा, बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, वितरण, ग्रिड संचालन और बिजली बाजार से जुड़े दर्जनों आंकड़ों को मानकीकृत तरीके से साझा करने का प्रस्ताव है। लेकिन इस महत्वाकांक्षी पहल की सबसे बड़ी सीमा भी इसके साथ ही सामने आती है। मंत्रालय ने साफ किया है कि इस फ्रेमवर्क को अपनाना पूरी तरह स्वैच्छिक होगा। यानी जिन सरकारी और निजी संस्थाओं के पास ये आंकड़े हैं, वे चाहें तो इस व्यवस्था का हिस्सा बनें और चाहें तो नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्वैच्छिक व्यवस्था भारत के बिजली क्षेत्र में वह पारदर्शिता ला पाएगी, जिसकी जरूरत वर्षों से महसूस की जा रही है।
यह मसौदा ऐसे समय आया है जब भारत 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता हासिल करने और ऊर्जा संक्रमण को गति देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात की ओर ध्यान दिलाते रहे हैं कि बिजली क्षेत्र का डेटा अलग-अलग एजेंसियों, राज्यों और कंपनियों में बिखरा हुआ है, जिससे शोध, नीति निर्माण, निवेश और नियामकीय निगरानी प्रभावित होती है।
मंत्रालय ने भी पहली बार इस समस्या को औपचारिक रूप से स्वीकार किया है। मसौदे में कहा गया है कि बिजली क्षेत्र के आंकड़े "खंडित डेटा साइलो, अलग-अलग प्रारूप, सीमित इंटरऑपरेबिलिटी और डेटा साझा करने के लिए एकीकृत शासन व्यवस्था के अभाव" जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। यही वजह है कि देश का बिजली क्षेत्र हर दिन विशाल मात्रा में परिचालन, नियोजन, वाणिज्यिक और उपभोक्ता संबंधी आंकड़े तैयार करने के बावजूद उनका प्रभावी उपयोग नहीं कर पा रहा है।
इसी स्थिति को बदलने के लिए मंत्रालय ने नेशनल इलेक्ट्रिसिटी डेटा सेंटर (एनईडीसी) और नेशनल इलेक्ट्रिसिटी डेटा पोर्टल (एनईडीपी) स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है। इनका उद्देश्य बिजली क्षेत्र के सार्वजनिक आंकड़ों के लिए एक साझा डिजिटल मंच तैयार करना है, जहां सभी डेटा मानकीकृत और मशीन-पठनीय प्रारूप में उपलब्ध होंगे। मसौदे के अनुसार यह व्यवस्था योजना निर्माण, ग्रिड संचालन, अनुसंधान, नवाचार और नियामकीय निर्णयों को बेहतर बनाने में मदद करेगी। हालांकि डेटा का स्वामित्व संबंधित संस्थाओं के पास ही रहेगा और वे चाहें तो अपने पोर्टल से या राष्ट्रीय पोर्टल के माध्यम से जानकारी साझा कर सकेंगी।
इस मसौदे की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि पहली बार सरकार ने सार्वजनिक किए जाने वाले बिजली क्षेत्र के आंकड़ों की विस्तृत सूची तैयार की है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा समेत 66 प्रकार के सार्वजनिक डेटासेट प्रस्तावित किए गए हैं। यानी बिजली उत्पादन के आंकड़े ही नहीं बल्कि बिजलीघरों की स्थापित क्षमता, प्लांट लोड फैक्टर, कोयला भंडार, ट्रांसमिशन लाइनें, सबस्टेशन, बिजली प्रवाह, राज्यों की बिजली मांग, पीक डिमांड, वितरण कंपनियों के तकनीकी एवं वाणिज्यिक नुकसान , प्रति व्यक्ति बिजली खपत, उपभोक्ताओं की संख्या, बिजली योजनाओं की प्रगति और बिजली बाजार से जुड़े आंकड़े भी शामिल हैं। इसका मतलब है कि पहली बार बिजली क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक डेटा के रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है।
नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए यह प्रस्ताव विशेष महत्व रखता है। सरकार राज्यवार और तकनीकवार सौर, पवन, बायोमास और लघु जलविद्युत क्षमता, रूफटॉप सोलर की प्रगति, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और कुल बिजली उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी जैसे आंकड़ों को सार्वजनिक करना चाहती है। अभी तक इनमें से कई आंकड़े अलग-अलग एजेंसियों की वेबसाइटों पर बिखरे हुए मिलते हैं या अलग-अलग प्रारूपों में उपलब्ध होते हैं। यदि इन्हें एकीकृत मंच पर नियमित रूप से उपलब्ध कराया जाता है तो निवेशकों, शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए ऊर्जा संक्रमण की वास्तविक प्रगति का आकलन करना आसान होगा।
मसौदा केवल डेटा प्रकाशित करने तक सीमित नहीं है बल्कि बिजली क्षेत्र के लिए एक नई डेटा गवर्नेंस व्यवस्था भी प्रस्तावित करता है। इसके तहत सभी साझा किए जाने वाले आंकड़ों को दो श्रेणियों में बांटा जाएगा।
टियर-1 में वे आंकड़े होंगे जिन्हें सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जा सकेगा क्योंकि उनसे परिचालन, गोपनीयता या राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई जोखिम नहीं है। दूसरी ओर टियर-2 में वे आंकड़े होंगे जिन्हें केवल पंजीकरण और केवाईसी सत्यापन के बाद ही उपलब्ध कराया जाएगा। इनमें फीडर स्तर के परिचालन संबंधी आंकड़े, विस्तृत ग्रिड डेटा और डी-आइडेंटिफाइड स्मार्ट मीटर डेटा जैसी सूचनाएं शामिल होंगी।
ड्राफ्ट उपभोक्ताओं की निजता पर भी विशेष जोर देता है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि किसी भी व्यक्तिगत पहचान योग्य जानकारी को साझा करने से पहले उसे अनाम , टोकनाइजेशन, एग्रीगेशन, वैल्यू बैंडिंग और अन्य तकनीकों के माध्यम से इस प्रकार बदला जाएगा कि किसी व्यक्ति या परिसंपत्ति की पहचान संभव न हो। साथ ही यह भी कहा गया है कि डेटा का पुनः वर्गीकरण डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुरूप होगा।
यह मसौदा बिजली क्षेत्र को केवल बिजली उत्पादन और वितरण तक सीमित नहीं मानता। इसमें कहा गया है कि बिजली क्षेत्र अब परिवहन, शहरी नियोजन, जलवायु कार्रवाई और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों से गहराई से जुड़ चुका है। इसलिए बिजली संबंधी आंकड़ों का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग अवसंरचना की योजना बनाने, भवनों की ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, जलवायु रिपोर्टिंग और ग्रीन फाइनेंस जैसी पहलों में भी किया जा सकेगा। यह संकेत देता है कि भविष्य में बिजली क्षेत्र का डेटा केवल ऊर्जा मंत्रालय तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि विभिन्न मंत्रालयों और क्षेत्रों के बीच साझा डिजिटल अवसंरचना का हिस्सा बन सकता है।
मसौदे का एक और उल्लेखनीय पहलू यह है कि इसमें पहली बार भारतीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता डेवलपर्स और स्टार्टअप्स का उल्लेख किया गया है। प्रस्ताव के अनुसार डेटा जारी करने वाली संस्थाएं अनुसंधान और नवाचार के लिए सीक्योर डाटा एनवॉयरमेंट्स विकसित कर सकती हैं, जहां संवेदनशील डेटा को डाउनलोड किए बिना सुरक्षित वातावरण में उसका विश्लेषण किया जा सके। मंत्रालय ने यह भी कहा है कि ऐसे मामलों में भारतीय एआई डेवलपर्स और स्टार्टअप्स को प्राथमिकता दी जा सकती है। यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो बिजली मांग के पूर्वानुमान, ग्रिड प्रबंधन, नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण और ऊर्जा दक्षता जैसे क्षेत्रों में एआई आधारित समाधान विकसित करने में मदद मिल सकती है।
फ्रेमवर्क के कार्यान्वयन के लिए भी समयसीमा तय की गई है। इसे अपनाने वाली प्रत्येक संस्था को 12 महीनों के भीतर अपने सभी उपलब्ध डेटासेट का मेटाडेटा कैटलॉग प्रकाशित करना होगा, जबकि 18 महीनों के भीतर सभी सार्वजनिक आंकड़े राष्ट्रीय बिजली डेटा केंद्र के माध्यम से खोजे जा सकेंगे। इन आंकड़ों की संरचना और प्रारूप तैयार करने की जिम्मेदारी केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण सीईए को दी गई है।
हालांकि यह मसौदा बिजली क्षेत्र में डेटा पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है, लेकिन इसकी सफलता का सबसे बड़ा प्रश्न वही है जिससे यह शुरू होता है। जब इस ढांचे को अपनाना अनिवार्य ही नहीं होगा, तब क्या सभी राज्य, वितरण कंपनियां और निजी बिजली उत्पादक अपने आंकड़े वास्तव में सार्वजनिक करेंगे? यदि बड़ी संस्थाएं इससे बाहर रहती हैं तो राष्ट्रीय डेटा पोर्टल अधूरा रह सकता है।
यही कारण है कि यह मसौदा एक ओर भारत के बिजली क्षेत्र में डेटा गवर्नेंस की नई शुरुआत का संकेत देता है, साथ ही यह भी बताता है कि पारदर्शिता केवल तकनीकी व्यवस्था बनाने से नहीं आएगी, बल्कि उसके लिए संस्थागत इच्छाशक्ति और व्यापक भागीदारी भी उतनी ही जरूरी होगी।
यदि यह दोनों शर्तें पूरी होती हैं, तो भारत पहली बार बिजली क्षेत्र के आंकड़ों को उसी तरह सार्वजनिक संपदा में बदल सकता है, जैसा आज मौसम, जनगणना या भू-स्थानिक आंकड़ों के साथ देखने को मिलता है।