बेहतर जीवन की तलाश: एक दशक में 81,000 प्रवासियों की मौत या लापता, आधे से अधिक की पहचान तक नहीं

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के मुताबिक, 2014 से 2025 के बीच प्रवास के दौरान कम से कम 4,414 बच्चों की मौत हुई
फोटो साभार: आईस्टॉक
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जब लोग अपना घर छोड़ने का फैसला करते हैं, तो दरअसल वे अपने ही मृत्यु प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर कर रहे होते हैं। उनकी बेबसी इस कदर होती है कि दर्जनों देशों के हजारों प्रवासी खतरनाक समुद्री रास्तों को पार करने, नदियों से भरे उष्णकटिबंधीय जंगलों से गुजरने और ट्रकों में ठूंसकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करने का जोखिम उठाते हैं। इन सबके पीछे उनकी एक ही तलाश होती है, एक ऐसा देश, जहां उन्हें सम्मानजनक और न्यायपूर्ण जीवन मिल सके।

दुनिया भर में प्रवास के ये रास्ते अब मौत के रास्तों में तब्दील हो चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की अंतरसरकारी संस्था, अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम), जो सुरक्षित, व्यवस्थित और मानवीय प्रवासन सुनिश्चित करने के लिए काम करता है, ने एक चिंताजनक आकलन जारी किया है। इसके मुताबिक, 2014 से 2025 के बीच 81,000 से अधिक प्रवासियों की मौत रास्तों में ही हो गई या वे लापता हो गए। रिपोर्ट के अनुसार, सबसे घातक प्रवासन मार्ग मध्य भूमध्यसागरीय मार्ग है, जहां 2014 से अब तक कम से कम 26,865 लोगों की जान जा चुकी है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में लगभग 30.4 करोड़ अंतरराष्ट्रीय प्रवासी हैं। इनमें से आधे निर्धारित भौगोलिक क्षेत्रों के भीतर ही रहते हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, क्षेत्रीय प्रवासन मार्ग उन रास्तों को कहते हैं, जिनके जरिए लोग एक ही भौगोलिक या राजनीतिक क्षेत्र के भीतर एक देश से दूसरे देश में जाते हैं। ये मार्ग पड़ोसी देशों को आपस में जोड़ते हैं और क्षेत्रीय स्तर पर लोगों की आवाजाही को आकार देते हैं।

प्रवासन के प्रमुख मार्गों में मध्य अमेरिकी मार्ग (जिसे लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई मार्ग भी कहा जाता है), मध्य भूमध्यसागरीय मार्ग, पूर्वी भूमध्यसागरीय मार्ग और पश्चिमी बाल्कन मार्ग, पश्चिमी भूमध्यसागरीय मार्ग, पश्चिमी अफ्रीकी अटलांटिक मार्ग, हॉर्न ऑफ अफ्रीका-पूर्वी मार्ग और पूर्वी-दक्षिणी अफ्रीका मार्ग शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) की जनवरी-अप्रैल 2026 की रिपोर्ट में इन मार्गों का मानचित्रण किया गया है। ये मार्ग बताते हैं कि प्रवासियों को अलग-अलग स्तर के खतरों का सामना करना पड़ता है। इनमें जानलेवा समुद्री यात्राओं से लेकर दूरदराज के ऐसे इलाकों से होकर गुजरने वाली जोखिम भरी जमीनी यात्राएं शामिल हैं, जहां निगरानी की व्यवस्था अक्सर बेहद कमजोर होती है।

प्रवास करने वाले लोगों की संख्या और इस प्रवासन की भयावहता लगातार बढ़ रही है। इसका एक और चिंताजनक पहलू बच्चों की मौतों से सामने आता है। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (आईओएम) की हाल ही में जारी रिपोर्ट डॉक्यूमेंटिंग दी डेथ्स ऑफ चाइल्ड माइग्रेंटस के मुताबिक, 2014 से 2025 के बीच 4,400 से अधिक प्रवासी बच्चों की मौत हो चुकी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रवासियों की कुल मौतों की तरह ही प्रवासी बच्चों की मौतों के आंकड़े भी वास्तविक संख्या से काफी कम दर्ज किए गए हैं। यानी, बेहतर दस्तावेजीकरण के अभाव में प्रवास के दौरान जान गंवाने वाले बच्चों की वास्तविक संख्या आधिकारिक आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है।

सभी प्रवासन मार्गों पर कुल प्रवासी मौतों में बच्चों की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत तक है। हालांकि, कुछ मार्गों पर यह अनुपात काफी अधिक है। बेलारूस-यूरोपीय संघ की सीमा पर दर्ज कुल मौतों में बच्चों की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत है। नाफ नदी और सीरिया से तुर्किये जाने वाले रास्ते पर मरने वाले प्रवासियों में 23 प्रतिशत बच्चे थे। पूर्वी भूमध्यसागरीय मार्ग पर यह 21 प्रतिशत, जबकि इंग्लिश चैनल और डेरियन नेशनल पार्क से गुजरने वाले मार्गों पर 14-14 प्रतिशत है।

प्रवास के दौरान दर्ज कुल 81,000 मौतों में से आधे से अधिक यानी 44,862 मामलों में मृतक की उम्र या आयु वर्ग की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इससे संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में प्रवासी बच्चों की मौतें कुल आंकड़ों में शामिल नहीं हो पाई होंगी या मृतकों की पहचान बच्चों के रूप में नहीं की जा सकी होगी।

रिपोर्ट में कहा गया है, “उदाहरण के लिए, मध्य भूमध्यसागरीय मार्ग पर 2024 में इटली और माल्टा पहुंचने वाले प्रवासियों में बच्चों की हिस्सेदारी 19 प्रतिशत थी, लेकिन दर्ज मौतों में उनकी हिस्सेदारी केवल 2 प्रतिशत थी। जनसांख्यिकीय आंकड़ों में मौजूद ये कमियां इस बात को उजागर करती हैं कि प्रवासी बच्चों की मौतें किस हद तक दर्ज होने से छूट सकती हैं।”

दुनिया भर के प्रवासन मार्गों पर बच्चों की मौतें अक्सर सबसे कम दर्ज किए जाने वाले पहलुओं में से एक हैं। प्रवास के दौरान जान गंवाने वाले बच्चे दो तरह से आधिकारिक आंकड़ों से छूट जाते हैं।

पहला, जैसा कि आईओएम की रिपोर्ट बताती है, ऐसे बच्चे जिनकी प्रवास के दौरान मौत तो हो जाती है, लेकिन उनकी मौत का कोई रिकॉर्ड ही दर्ज नहीं होता। दूसरा, ऐसे मामले हैं जिनमें प्रवासी की मौत दर्ज तो की जाती है, लेकिन मृतक की पहचान बच्चे के रूप में नहीं हो पाती। रिपोर्ट में ऐसे मामलों को ‘छिपे हुए आंकड़े’ कहा गया है।

आईओएम के डेटा, इनसाइट और नीति विभाग के मुख्य रणनीति अधिकारी स्टुअर्ट कैम्पो कहते हैं, “प्रवासन के दौरान जान गंवाने वाले हर बच्चे की गिनती होनी चाहिए, लेकिन आंकड़ों में ऐसे बहुत से बच्चों का जिक्र ही नहीं है।”

रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों सहित हजारों प्रवासी दूरदराज और खतरनाक रास्तों से अनियमित रूप से यात्रा करते हैं। इन रास्तों पर होने वाली मौतों की अक्सर खबर तक नहीं मिलती या वे किसी की नजर में नहीं आतीं। इसके अलावा, जीवित बचे लोगों में डर, आपराधिक गिरोहों की संलिप्तता और शवों को बरामद करने में आने वाली कठिनाइयों के कारण भी बड़ी संख्या में मौतें दर्ज नहीं हो पातीं। समुद्र में शवों को बरामद करना विशेष रूप से मुश्किल होता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आंकड़ों की यह कमी उन क्षेत्रों में सबसे अधिक है, जहां प्रवासन का दबाव ज्यादा है, लेकिन आधिकारिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था सीमित है।

2014 से 2025 के बीच प्रवास के दौरान हुई कुल मौतों में से 48,983 लोगों की जान डूबने से गई। इनमें से 36,626 लोगों की उम्र दर्ज नहीं की गई है। व्यापक रूप से यह माना जाता है कि उम्र की जानकारी के बिना दर्ज इन मौतों में ऐसे कई बच्चे भी शामिल हैं, जिनकी पहचान नहीं हो सकी।

आईओएम की रिपोर्ट में कहा गया है, “इस बात के संकेत हैं कि इन 44,862 मौतों के आंकड़ों में बच्चों की संख्या उनकी वास्तविक संख्या से कम दर्ज हुई है।” यहां 44,862 उन प्रवासियों की कुल संख्या है, जिनकी मौत दर्ज की गई, लेकिन उनकी उम्र का उल्लेख नहीं है।

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ प्रत्यक्ष अनुभवों और घटनाओं से पता चलता है कि समुद्री यात्राओं के दौरान बच्चों को अक्सर जहाजों के निचले हिस्से में रखा जाता है। इससे जहरीली गैसों और धुएं के संपर्क में आने जैसे खतरे बढ़ जाते हैं। जहाज के डूबने की स्थिति में उनके फंस जाने और बाहर न निकल पाने का जोखिम भी अधिक होता है।

आईओएम की इस रिपोर्ट में प्रवास के दौरान होने वाली मौतों से जुड़ी जानकारी जुटाने की प्रक्रिया का विस्तृत ब्योरा दिया गया है। साथ ही, इसमें आंकड़े दर्ज करने की मौजूदा व्यवस्था की कमियों को भी उजागर किया गया है।

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