भारत में 23.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी के शिकार, बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पांचवां हिस्सा अब भी गरीबी के जोखिम में

बहुआयामी गरीबी सूचकांक का नवीनतम अपडेट बताता है कि भारत में बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच के मामले में अच्छी प्रगति हुई है, लेकिन अब भी बड़ी आबादी पीछे है
फोटो : विकास चौधरी/सीएसई
फोटो : विकास चौधरी/सीएसई
Published on: 
सारांश
  • दुनिया में वर्ष 2025 में इस श्रेणी के गरीबों की संख्या में 5.15 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई

  • भारत में 23.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी का सामना कर रहे हैं

  • इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं की कमी प्रमुख कारण है।

  • संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, गरीबी में कमी के बावजूद जनसंख्या वृद्धि के चलते गरीबों की संख्या बढ़ रही है।

  • यह स्थिति समग्र विकास के लिए गंभीर चुनौती पेश करती है।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा जारी वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के ताजा अपडेट के अनुसार, वर्ष 2025 में इस श्रेणी के गरीबों की संख्या में 5.15 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई।

इस सूचकांक की शुरुआत वर्ष 2010 में की गई थी। इसका उद्देश्य लोगों की गरीबी को केवल उनकी आय के आधार पर नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं में अभाव के आधार पर मापना है। इसमें 108 देश शामिल हैं, जो दुनिया की कुल आबादी के 78 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यह सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर से जुड़े 10 संकेतकों पर आधारित है। इनमें पोषण, बाल मृत्यु दर, स्कूली शिक्षा तथा पानी और स्वच्छता तक पहुंच जैसे पहलू शामिल हैं। यदि कोई व्यक्ति इन संकेतकों में से कम से कम एक-तिहाई में वंचित है, तो उसे बहुआयामी गरीब माना जाता है।

गरीबी को मापने के इस सूचकांक को अपनाए जाने के बाद यह पहली बार है, जब बहुआयामी गरीबों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2025 में दुनिया में 120 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से जूझ रहे थे। इनमें हर दूसरा व्यक्ति बच्चा था, जबकि पांच में से चार से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते थे।

बहुआयामी गरीबों की आबादी में वृद्धि चिंताजनक है। यह इस बात का संकेत है कि लोगों को समग्र मानव विकास के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस सूचकांक में शामिल सभी संकेतक एक-दूसरे से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक के पूरा न होने पर दूसरी बुनियादी जरूरतों के पूरा होने में भी बाधा आ सकती है।

यूएनडीपी के प्रशासक अलेक्जेंडर डी क्रू ने कहा, “गरीबी में वृद्धि दुनिया के लिए खतरे की घंटी होनी चाहिए। इन आंकड़ों के पीछे 120 करोड़ लोगों का संघर्ष छिपा है, जिन्हें एक-दूसरे से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इनमें भूख, स्कूली शिक्षा से वंचित रहना और स्वच्छ पानी या बिजली की कमी शामिल हैं। यह अस्वीकार्य है।”

हालांकि, नवीनतम अपडेट गरीबी के बढ़ते संकट को दर्शाता है, लेकिन पिछले 15 वर्षों में कई देशों ने बहुआयामी गरीबी कम करने में सफलता भी हासिल की है। इनमें उप-सहारा अफ्रीका के छह देशों सहित कुल 33 देश शामिल हैं, जिन्होंने 15 साल से भी कम समय में बहुआयामी गरीबी का स्तर घटाया है।

दुनिया में बहुआयामी गरीबी का स्तर सबसे अधिक उप-सहारा अफ्रीका में है।

चीन ने दुनिया में सबसे तेजी से बहुआयामी गरीबी कम की। वहां बहुआयामी गरीबी का स्तर वर्ष 2010 में 9.5 प्रतिशत था, जो 2014 में घटकर 4.2 प्रतिशत रह गया।

भारत ने भी बहुआयामी गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय कमी की है। मौजूदा सरकार इसे अपनी प्रमुख उपलब्धियों में से एक के रूप में पेश करती रही है।

वर्ष 2005-06 में भारत की 55.1 प्रतिशत आबादी बहुआयामी गरीबी से प्रभावित थी। वर्ष 2019-21 तक यह आंकड़ा घटकर 16.4 प्रतिशत रह गया।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अनुसार, बहुआयामी गरीबों की संख्या में वृद्धि का प्रमुख कारण आबादी में बढ़ोतरी है। दूसरे शब्दों में, बहुआयामी गरीबी कम तो हो रही है, लेकिन इसकी रफ्तार जनसंख्या वृद्धि की दर से तेज नहीं है।

सूचकांक के साथ जारी एक टिप्पणी में कहा गया है, “यह वृद्धि दो कारकों का नतीजा है। पहला, उन 95 देशों में आबादी की शुद्ध वृद्धि, जिनके आंकड़े अपडेट नहीं किए गए हैं। इन देशों में आबादी में कुल 1.58 करोड़ की वृद्धि हुई। यदि गरीबी की दर को स्थिर मान लिया जाए तो केवल वर्ष 2023 से 2024 के बीच आबादी के आंकड़ों में बदलाव के कारण ही इन 95 देशों में गरीबों की संख्या 1.58 करोड़ बढ़ जाती है।”

नए सूचकांक में शामिल संकेतक बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच के अभाव की गंभीर स्थिति को उजागर करते हैं। उदाहरण के लिए, बाल मृत्यु दर को देखें। सूचकांक के अनुसार, दुनिया में 14.5 करोड़ बहुआयामी गरीब ऐसे परिवारों में रहते हैं, जहां पिछले पांच वर्षों के दौरान किसी बच्चे की मृत्यु हुई है।

इसी तरह, दुनिया में 100 करोड़ से अधिक लोग अब भी खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन (लकड़ी, कोयला, उपले और फसल के अवशेष) का इस्तेमाल करते हैं। उप-सहारा अफ्रीका और भारत सहित दक्षिण एशिया में लोगों को सभी संकेतकों में बड़े पैमाने पर अभाव का सामना करना पड़ रहा है। इनमें पोषण, आवास और स्कूली शिक्षा शामिल हैं।

हालांकि, बहुआयामी गरीबी कम करने में भारत ने प्रगति की है, लेकिन विभिन्न संकेतकों के आंकड़े बुनियादी विकास के क्षेत्र में बड़ी कमियों को उजागर करते हैं। वर्ष 2024 में भारत में 23.8 करोड़ से अधिक लोग बहुआयामी गरीब थे। इसके अलावा, लगभग 19 प्रतिशत आबादी पर बहुआयामी गरीबी में फिसलने का खतरा था।

बहुआयामी गरीबी के तीन आयाम हैं—स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर। इनमें जीवन स्तर का गरीबी में सबसे बड़ा योगदान है, जो लगभग 40 प्रतिशत है। इस आयाम में खाना पकाने के ईंधन, स्वच्छता, पेयजल, बिजली, आवास और संपत्ति जैसे संकेतक शामिल हैं।

इसका अर्थ है कि बहुआयामी गरीबी में कमी के बावजूद भारत में बुनियादी सुविधाओं के विकास और उनकी उपलब्धता के मामले में अभी भी काफी पीछे है।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in