सूरत में प्रवासी मजदूरों का 'गांव चलो अभियान': आठ घंटे की शिफ्ट और साप्ताहिक छुट्टी की मांग पर अडिग

टेक्सटाइल नगरी सूरत में 25 लाख से अधिक प्रवासी मजदूर काम करते हैं, इनमें बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा आदि प्रदेशों के लोग सबसे अधिक हैं
सूरत शहर का नजारा। फोटो: आईस्टॉक
सूरत शहर का नजारा। फोटो: आईस्टॉक
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टेक्सटाइल उद्योग के कारण चर्चित गुजरात के सूरत में इन दिनों एंब्रायोडरी मशीन पर काम करने वाले मजदूरों ने ‘गांव चलो अभियान’ छेड़ रखा है। इस अभियान का नारा है, या तो कंपनी मालिक उन्हें आठ घंटे की शिफ्ट और हर हफ्ते एक दिन की छुट्टी दे या फिर वे अपनी नौकरी छोड़कर अपने गांव लौट जाएंगे।

अपनी इन मांगों को लेकर सूरत में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों ने पिछले अगस्त महीने से लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस शृंखला में 15 अक्तूबर, 2026 को भी सूरत के कलेक्टर कचहरी में प्रदर्शन करेंगे।

टेक्सटाइल और डायमंड कटिंग जैसे उद्योगों के लिए मशहूर सूरत में देश के कई राज्यों से प्रवासी मजदूर काम करते हैं। मजदूर संगठनों के मुताबिक सूरत जिले में प्रवासी मजदूरों की संख्या 25 से 30 लाख है, इनमें आठ से दस लाख मजदूर एंब्रायोडरी मशीनों पर काम करते हैं। ये कुशल मजदूर हैं और इन्हें हर महीने 25 से 30 हजार रुपए तक मिल जाते हैं। अब ये मजदूर आठ घंटे की शिफ्ट और हफ्ते में एक दिन की छुट्टी की मांग कर रहे हैं।

स्थानीय मीडिया के मुताबिक सूरत में इस आंदोलन की शुरुआत 16 अगस्त, 2026 को हुई, जब हजारों एंब्रायोडरी वर्करों ने काम रोककर प्रदर्शन किया और कुछ इकाइयों में टकराव की खबरें आईं, जिसमें आठ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया।

मगर इस प्रदर्शन का नतीजा यह रहा है कि 18 से 21 अगस्त के बीच श्रम विभाग ने 400 उद्यमियों से बातचीत की। उद्यमी हफ्ते में एक दिन की छुट्टी को लेकर तो सहमत हो गये, मगर वे आठ घंटे की शिफ्ट पर तैयार नहीं हुए। 12 सितंबर को फिर मजदूरों ने कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन किया।

29 सितंबर 2026 को उप श्रम आयुक्त ने टेक्सटाइल एम्ब्रॉयडरी जॉब वर्क एसोसिएशन ऑफ सूरत (तेजस) और सदर्न गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसजीसीसीआई) को पत्र भेजकर केंद्र और राज्य के चार श्रम कानूनों के कड़ाई से पालन का निर्देश दिया था।

इसके बाद 10-11 अक्तूबर को तेजस एसोसिएशन ने फिर से बैठक की और कहा कि वे आठ घंटे की ड्यूटी और साप्ताहिक अवकाश के लिए तैयार हैं, मगर वे उस स्थिति में मजदूरों को सिर्फ 14,300 रुपए प्रति माह ही दे पाएंगे।

12 घंटे रोजाना काम करने पर वे मजदूरों को 35 हजार रुपए प्रति माह देंगे। बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता भी देंगे। संगठन ने यह भी कहा कि जो मजदूर आठ घंटे काम और साप्ताहिक अवकाश चाहते हैं, उन्हें माल खराब होने पर 50 फीसदी जुर्माना देना होगा और वे मोबाइल लेकर मिल के अंदर नहीं आ सकेंगे। तेजस एसोसिएशन में सूरत के 40 हजार एंब्रायोडरी मिल मालिक शामिल हैं।

वहीं सूरत के सार्वजनिक मजदूर एकता यूनियन के अध्यक्ष मलखान सिंह वर्मा ने बताया, “हम ईंट-गारा वाले मजदूर नहीं हैं। हम कुशल मजदूर हैं। हम जब रोज मालिकों को 10 से 12 हजार रुपए कमाकर देते हैं, तो हमें भी दिन का एक हजार से बारह सौ रुपए मिलना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “हफ्ते में एक दिन की छुट्टी भी जरूरी है, क्योंकि एक दिन कपड़े धोने, परिवार के साथ रहने, दोस्ते के साथ घूमने फिरने के लिए चाहिए। हम अपनी मांग पर अडिग हैं और 15 अक्तूबर को हम फिर से प्रदर्शन करने जा रहे हैं।”

हालांकि मलखान यह संकेत भी देते हैं कि कई मजदूर आठ के बदले 12 घंटे काम करने पर तो तैयार लगते हैं, मगर उन्हें हफ्ते में एक दिन की छुट्टी यानी साप्ताहिक अवकाश चाहिए।

मलखान कहते हैं, “पुलिस-प्रशासन और सरकार के लोग भी हमारा सहयोग नहीं कर रहे। कई मजदूरों पर मुकदमा कर दिया गया है। गांव चलो अभियान शुरू करने वाले मजदूर नेता अजय दुबे पर पथराव का झूठा आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया है। केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह भी सूरत आए तो उन्होंने मिल मालिकों से ही मुलाकात की, मजदूरों की परेशानी सुनने नहीं आए. जबकि सबसे अधिक मजदूर उनके राज्य बिहार से आए हैं।”

मलखान सिंह वर्मा का आरोप है कि आंदोलन के दौरान तीन से चार सौ मजदूरों को नौकरी से निकाल दिया गया। कुछ मजदूरों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालकर दूसरी कंपनियों को उन्हें काम पर नहीं रखने का संदेश दिया गया।

नौ और दस अक्तूबर को सूरत में मौजूद केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इस विवाद को लेकर पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवाल पर कहा, “मालिक और मजदूर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस समस्या को परिवार की तरह सुलझाएं। कुछ राजनीतिक तत्व सूरत के माहौल को खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। जहां तक सामूहिक पलायन की बात है, ऐसा कुछ भी नहीं है।” लेकिन मजदूरों को आठ घंटे काम और हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मिलनी चाहिए या नहीं, इस पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं कहा।

12 घंटे काम की अनुमति देने वाले कानून पर भी विवाद

गुजरात में काम के घंटों को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि में सितंबर 2025 में पारित फैक्ट्रीज (गुजरात संशोधन) विधेयक भी चर्चा में है। इस संशोधन में निर्धारित शर्तों के अधीन दैनिक कार्य अवधि को 12 घंटे तक बढ़ाने की अनुमति का प्रावधान किया गया था।

विधेयक का कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने विरोध किया था। उस समय कांग्रेस विधायक जिग्नेश मेवाणी ने कानून के दुरुपयोग की आशंका जताते हुए कहा था कि आठ घंटे की ऐतिहासिक कार्य शिफ्ट मजदूरों को शोषण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने आशंका व्यक्त की थी कि काम के घंटे बढ़ाने से श्रमिकों के शोषण की स्थिति पैदा हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता और कांग्रेस नेता असलम साइकिल वाला के अनुसार, मजदूरों की नाराजगी लंबे समय से बढ़ रही थी और अब वह खुलकर सामने आई है। उन्होंने आरोप लगाया कि श्रमिकों को लंबे समय तक काम करने के लिए मजबूर किया जाता है और साप्ताहिक अवकाश सहित जरूरी सुविधाओं का अभाव है।

साइकिल वाला ने यह भी आरोप लगाया कि आंदोलन को दबाने के लिए मजदूर यूनियन के नेता अजय दुबे को गलत ढ़ंग से गिरफ्तार कर लिया गया1

अजय दुबे की गिरफ्तारी पर खाटोदरा पुलिस स्टेशन के पुलिस इंस्पेक्टर एन.वी. भरवाड़ ने बताया कि यह गिरफ़्तारी एक कारखाना मालिक से गाली गलौज और फिरौती मांगने के मामले में हुई है| गिरफ्तारी का आन्दोलन से कोई लेना देना नहीं है।।

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