आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: भीड़भाड़ वाले शहरों में कंजेशन प्राइसिंग का सुझाव

कंजेशन प्राइसिंग भीड़भाड़ वाली सड़कों पर चलने का शुल्क है। सर्वेक्षण में लंदन और सिंगापुर में कंजेशन प्रणाली के फायदा गिनाकर इसकी जरूरत पर जोर दिया गया है
Mumbai, India iStock
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केंद्र सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण 2026 में शहरों में मोबिलिटी यानी आवाजाही को बेहतर बनाने के लिए जो उपाय सुझाए हैं उनमें एक कंजेशन प्राइसिंग भी शामिल है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, घने व्यावसायिक जिलों में लक्षित कंजेशन प्राइसिंग, मांग आधारित पार्किंग प्रबंधन के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय अनुभवों की तरह यातायात कम कर सकती है, गति बढ़ा सकती है और उत्सर्जन घटा सकती है।

दरअसल कंजेशन प्राइसिंग भीड़भाड़ वाली सड़कों पर चलने का शुल्क है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इसका मूल विचार भीड़भाड़ से उत्पन्न बाहरी लागतों जैसे समय की हानि, प्रदूषण और ईंधन की बर्बादी को उपयोगकर्ताओं द्वारा ही वहन करना है ताकि सबसे अधिक भीड़भाड़ वाली सड़कों का उपयोग करने वाले यात्रा की वास्तविक कीमत चुकाएं।

इसके परिणामस्वरूप अत्यधिक भीड़वाले वाले कॉरिडोर पर पीक समय में निजी वाहनों की संख्या सीमित करने, यात्रा गति में सुधार लाने, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने, कार पूलिंग, ऑफ पीक यात्रा को हतोत्साहित करने का उद्देश्य पूरा होता है।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, सिंगापुर में इलेक्ट्रोनिक रोड प्राइसिंग (ईआरपी) प्रणाली के तहत पीक समय में टोल गैंट्री के नीचे गुजरते ही वाहनों से स्वत: शुल्क लिया जाता है। सिंगापुर के दशकों के आंकड़े इसके अत्यधिक प्रभावी होने को दर्शाते हैं। इसी तरह लंदन के उदाहरण से समझाया गया है कि लंदन कंजेशन चार्ज एक कॉर्डन आधारित क्षेत्र लाइसेंसिंग प्रणाली है जिसके तहत केंद्रीय लंदन के एक निर्धारित क्षेत्र में प्रवेश करने, बाहर निकलने या भीतर आवागमन करने पर वाहनों से प्रतिदिन शुल्क लिया जाता है।  

लंदन के यातायात पर इसका प्रभाव त्वरित और उल्लेनीय रहा। ट्रांसपोर्ट फाॅर लंदन (टीएफएल) के अनुसार, जोन के भीतर कुल यातायात में 16 प्रतिशत (कारों के लिए 30 प्रतिशत) की कमी आई, जबकि मोटरसाइकिल, टैक्सी, बस और साइकिल यातायात में वृद्धि हुई। इससे प्रति किलोमीटर विलंब के आधर पर मापी गई भीड़भाड़ में 32 प्रतिशत की कमी आई। साथ ही औसत यातायात गति 13 किमी/घंटा से बढ़कर 17 किमी/घंटा हो गई। टीएफएल का अनुमान है कि जोन में कार यात्राएं प्रतिदिन लगभग 1.5 लाख कम हुईं।

विशेषज्ञ भारत में भी इस प्रणाली की जरूरत पर बल देते हैं। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओरआरएफ) के फेलो रामनाथ झा के अनुसार, कंजेशन प्राइसिंग की परिकल्पना को कुछ लोग वैल्यू प्राइसिंग भी कहते हैं। ये कोई नया नुस्खा नहीं है। सबसे पहले सिंगापुर ने इसे 1975 में आजमाया था। उसके बाद से दुनिया के कई शहर डरहम (2002), लंदन (2003), स्टॉकहोम (2006), मिलानो (2008). गोथेनबर्ग (2013) और न्यूयॉर्क (2025) कंजेशन चार्ज का फार्मूला आजमा चुके हैं।

रामनाथ झा के अनुसार, भारत के बहुत से आर्किटेक्ट, परिवहन के विशेषज्ञ और शहरी योजनाकारों ने यह तर्क दिया है कि भारत के शहरों को भी कंजेशन चार्ज लगाने चाहिए। भारत के बड़े शहरों में ट्रैफिक की समस्या न्यूयॉर्क से भी भयंकर है लेकिन भारत के किसी भी शहर ने अब तक कंजेशन चार्ज लगाना जरूरी नहीं समझा है। 2018 में दिल्ली के उप-राज्यपाल ने इसका प्रस्ताव रखा था, मगर इस पर कोई काम नहीं हुआ। इसी तरह की कोशिशें मुंबई रीजनल डेवेलपमेंट अथॉरिटी (एमएमआरडीए) ने भी की हैं।

भारत में आवाजाही की समस्या के कारण खासकर शहरी क्षेत्रों में कई नकारात्मक असर दिखाई देते हैं, जिनमें एक से दूसरी जगह जाने में देरी, ईंधन की अधिक खपत और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि शामिल है। इसके अलावा यह बीमारियों में वृद्धि करने के साथ ही शहरों की आर्थिक उत्पादकता को भी प्रभावित करती है।

रामनाथ झा के अनुसार, शहरों में कंजेशन चार्ज लगाने के फायदे साफ नजर आते हैं।  खास तौर से तब जब तकनीक ने इस टैक्स की वसूली के तरीकों को पूरी तरह से स्वचालित बना दिया है, जिससे यातायात में कोई बाधा नहीं आती है। इससे ट्रैफिक की समस्या में कमी आने के साथ साथ शहरों की आमदनी भी बढ़ती है। इस रकम को कंजेशन चार्ज लागू करने और इसकी वसूली की लागत कम करने में लगाया जा सकता है।

इस बचत के पैसों को आवाजाही के नए मार्ग विकसित करने और सड़कों के रख-रखाव पर भी खर्च किया जा सकता है। उनके अनुसार, कंजेशन चार्ज लगाने से लोग सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने को प्रेरित होते हैं और फिर निजी गाड़ियों के ईंधन की खपत भी कम होती है।  

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