बीरन: विलुप्त होती परंपरा से उभरती आजीविका की नई राह

बीरन पारिजात वृक्ष की टहनी के रेशे और सूताखर नामक जंगली घास से मिलाकर तैयार किया जाता है पर यह आसान नहीं है
बीरन यानी ऐसा श्रृंगार जिसे महिलाएं एवं पुरुषों दोनों ही सांस्कृतिक पर्व दसरा, गिरदा, बैगा नृत्य में उपयोग करते रहे हैं। फोटो: राकेश कुमार मालवीय
बीरन यानी ऐसा श्रृंगार जिसे महिलाएं एवं पुरुषों दोनों ही सांस्कृतिक पर्व दसरा, गिरदा, बैगा नृत्य में उपयोग करते रहे हैं। फोटो: राकेश कुमार मालवीय
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क्या आपने कभी उत्सवों में बैगा आदिवासियों की तस्वीरों पर गौर किया है। नहीं तो करिएगा। प्रकृति के करीब रहने वाले यह आदिवासी अपने साज—श्रृंगार को भी प्रकृति से ही करते हैं। इनमें सबसे खास होती हैं, खास प्रकार से बनी मालाएं। एक—एक कड़ी को जोड़कर विभिन्न आकार वाली यह मालाएं एक खास प्रकार की घास और पारिजात के रेशों को मिलाकर तैयार की जाती रही है। वक्त के साथ यह कला विलुप्त हो रही है। पर इन दिनों यह बैगा आदिवासियों के लिए रोजगार का एक साधन बन गई है।

छत्तीसगढ़ राज्य के कबीरधाम जिले की मैकाल पर्वत श्रृंखला के तलहटी में बसा है तरेगांव। यह बैगा बाहुल्य इलाका बैगा समुदाय की जीवन शैली प्रकृति, संस्कृति एवं अपनी परंपराओं से जुड़ा रहा है। पर वक्त के साथ कम होते वन क्षेत्र, जैव विविधता, विलुप्त होती घास से ऐसी कई परम्पराएं, रीति—रिवाज, सांस्कृतिक विरासत, हस्तशिल्प पर संकट गहराता जा रहा है।

बीरन का श्रृंगार भी एक ऐसा आयाम है जो लगातार प्रचलन से बाहर होता जा रहा था। बीरन यानी ऐसा श्रृंगार जिसे महिलाएं एवं पुरुषों दोनों ही सांस्कृतिक पर्व दसरा, गिरदा, बैगा नृत्य में उपयोग करते रहे हैं। बीरन हस्तशिल्प प्रकृति, कला कौशल का बेजोड़ संगम है। इसे तैयार करना समुदाय की प्रेम, साधना और समर्पण से कम नहीं है। बीरन पारिजात वृक्ष की टहनी के रेशे और सूताखर नामक जंगली घास से मिलाकर तैयार किया जाता है पर यह आसान नहीं है। इसके लिए कुशल शिल्पकार होना जरूरी है। बीरन की एक रिंग तैयार करने में 5 मिनट का समय लगता है, एक माला में 60 से 80 रिंग होते हैं।

 कबीरधाम क्षेत्र में पर्यावरण प्रभाव, बढ़ते एकल फसल खेती (मोनो क्रॉपिंग) के प्रभाव से धीरे—धीरे सुताखर घास कम होते जा रहे हैं। क्योंकि सुताखर घास केवल कोदो—कुटकी मिलेट्स के खेतों में ही उगती है। पारिजात वृक्ष गांव से दूर नदी एवं पहाड़ियों के पास एक दो वृक्ष ही बचे हुए हैं। नई पीढ़ियों में बीरन हस्तशिल्प बुनाई की रुचि में कमी एवं परंपरागत कौशल ज्ञान भी लुप्त होता जा रहा था।

इस समस्या को एक साल पहले समझा सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री अर्जुन सिंह और बैगा समाज के प्रदेश अध्यक्ष इतवारी मछिया जी ने। विचार किया कि बैगा समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखना होगा तो प्रकृति का संरक्षण करना होगा।

फिर शुरू हुई घास, पारिजात वृक्ष एवं बीरन हस्तशिल्प कला को संरक्षण करने की पहल। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम में संस्था ग्रामोदय ग्राम विकास समिति क्षेत्र में कृषि पारिस्थितिकी, पोषण, संवहनीय आजीविका एवं प्राकृतिक खेती के लिए विशेष संरक्षित जनजाति परिवारों के साथ कार्य कर रही है, समुदाय के मुखिया ने ग्राम बैठकों में बीरन हस्तशिल्प को संरक्षण करने के लिए संस्था के साथ घास एवं पारिजात के संरक्षण, हस्तशिल्प को बढ़ावा देने की बीड़ा उठाया।

बीरन को निरंतर बनाए रखने के लिए समुदाय सूताखर घास एवं पारिजात वृक्ष के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं। फोटो: राकेश कुमार मालवीय
बीरन को निरंतर बनाए रखने के लिए समुदाय सूताखर घास एवं पारिजात वृक्ष के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं। फोटो: राकेश कुमार मालवीय

ग्रामोदय के उपाध्यक्ष श्रीमती कली बाई बैगा ने कहा कि अकेले संस्था एवं समुदाय के पहल से प्रकृति, कला एवं संस्कृति का संरक्षण करना कठिन चुनौती है, इसके लिए हमें विभिन्न हितधारकों को जोड़ना होगा।

फिर ग्रामोदय की टीम ने विभिन्न शासकीय विभागों और बीरन शिल्पकार महिलाओं को एक मंच पर लाने के लिए बीरन उत्सव का आयोजन की तैयारी में जुटे। शासकीय विभागों से समन्वय एवं संवाद कठिन रहा, विभाग पहुंच विहीन गांवों में समुदाय के कार्यक्रमों में शामिल होने हिचक रहे थे, उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि इसका संरक्षण कैसे कर सकते हैं? 

समुदाय एवं संस्था के संगठित प्रयासों से आखिरकार बीरन उत्सव आयोजित हुआ। बीरन उत्सव में समुदाय एवं शासकीय विभागों के मध्य अत्यंत ही रोचक एवं मैत्रीपूर्ण संवाद ने कार्यक्रम को शानदार बना दिया। शासकीय विभागों के प्रमुखों ने इस अवसर को बहुत ही मूल्यवान बनाते हुए शासकीय योजनाओं से बीरन के संरक्षण एवं समुदाय की ओर से नए पीढ़ियों को बीरन हस्तशिल्प को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया गया।

बीरन उत्सव अभिसरण का एक ऐतिहासिक कार्यक्रम रहा, जिला मुख्यालय से लगभग 90 किलोमीटर दूर सरकारी विभागों के अधिकारी जिसमें जिला पंचायत, आदिम जाति कल्याण विभाग, वन विभाग, बैंक, प्रशिक्षण केंद्र, नाबार्ड जैसे प्रमुख विभाग मैकाल पर्वत के आदिवासी दूरस्थ गांव में पहली बार पहुंचे।

समुदाय के लिए भी नया अवसर था। पहली बार बीरन को आजीविका और उद्यमिता से जोड़ा गया और इसकी कीमत भी तय की गई। एक और परम्परा शुरू हुई कि आयोजनों में अतिथियों को बीरन की माला पहनाई जाए।

ग्रामोदय संस्था के चंद्रकांत यादव बताते हैं कि बीरन अब एक विरासत से आजीविका एवं उद्यमिता की ओर बढ़ रहा है। इससे महिलाओं को नए रोजगार मिल रहा है। छिंदपुर और पिपरहा दो ऐसे गांव हैं जहां महिलाएं समूह बनाकर बीरन को व्यवस्थित रूप से तैयार कर रहे हैं। शासकीय एवं गैर शासकीय कार्यक्रमों में शामिल होकर प्रदर्शनी एवं विक्रय स्टॉल सजा रहे हैं।

पिछले छह महीने में लगभग 10 हजार रुपए की आय अर्जित कर चुके हैं। बीरन बनाने वाली श्रीबाई दीदी कहती हैं कि रोजगार नहीं होने से हम मैदानी क्षेत्रों में पलायन पर जाते थे। शोषण, परिवार से दूर रहते हुए मात्र 300 रुपए प्रति दिवस मजदूरी पर गन्ने के खेतों में कठिन परिश्रम करना पड़ता था,  लेकिन अब हम अपने गांव और घर पर ही रहते हुए प्रकृति और संस्कृति का संरक्षण करते हुए बीरन तैयार करने का काम कर रहे हैं।

हमें बेहतर आय की शुरुआत हुई है, एक बीरन की माला तीन सौ रुपए में बिक रही है, पर बड़ी बात यह है कि एक खोती जा रही कला का संरक्षण हो पा रहा है।

बीरन को निरंतर बनाए रखने के लिए समुदाय सूताखर घास एवं पारिजात वृक्ष के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं। महिलाओं द्वारा घांस को बढ़ावा देने कोदो कुटकी मिलेट्स के उत्पादन को प्रोत्साहित करने की भी शुरूआत हुई है। पारिजात वृक्ष के वृक्षारोपण हेतु नर्सरी की तैयारी की गई है। बीरन हस्तशिल्प प्रकृति आधारित आजीविका की नई राह गढ़ रहा है।

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