

केंद्र सरकार ने बस्तर क्षेत्र से ‘लाल आतंक’ खत्म कर देने का दावा तो किया है, लेकिन क्या कभी वह बस्तर से कुपोषण को भी खत्म करने का दावा करेगी ? यह बात छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिला स्थित अबूझमाड़ छात्र संगठन के अध्यक्ष लक्ष्मण मंडावी ने डाउन टू अर्थ से कही।
वे कहते हैं कि छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ अभी तक बाहरी दुनिया के लिए अबूझ रहा है। अब जब यहां थोड़ा-बहुत बाहरी लोगों का आना-जाना हो गया है तो सवाल उठता है कि क्या हमारी समस्याएं भी बाहरी दुनिया तक पहुंच रही हैं?
यहां से लाल आतंक की खबरें तो लगातार प्रकाशित या सुनाई पड़ती हैं, लेकिन इन इलाकों में लाल आतंक की छाया में यहां की बुनियादी जरूरतों से वंचित लोगों की आवाजें कभी बाहर नहीं आ पातीं। वास्तव में अबूझमाड़ के एक युवा आदिवासी की यह बात राज्य व केंद्र सरकार के नुमाइंदों के लिए एक बड़ा सवाल खड़ा करती है।
अबूझमाड़ इलाके में कहने के लिए पिछले दो-ढाई दशकों से तो चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी नजर आ जाएंगे, लेकिन आदिवासियों की बुनियादी जरूरतें आज भी इन इलाकों में एक सिरे से गायब है। नारायणुपर जिले में स्थित अबूझमाड़ का कुमुड़गुंडा भी एक ऐसा ही गांव है, जहां के हालात देखकर लगता है कि यहां के लोगों को केवल मरने के लिए ही जिंदा छोड़ दिया गया है।
गांव के सभी आदिवासी मड़िया जनजाति से हैं। ध्यान रहे कि यह एक संरक्षित जनजाति की श्रेणी में आती है। ऐसी जनजातियों की संख्या यहां दिन-प्रति-दिन स्वास्थ्य सेवाओं के आभाव में कम होती जा रही है। लेकिन इस बात का राज्य सरकार पर कोई असर नहीं दिख पड़ रहा है।
लक्ष्मण मंडावी कहते हैं कि हमारे आदिवासी समुदाय की संख्या दिन-प्रति-दिन कम होती जा रही है। इसका कारण है कि हमारे इलाके में स्वास्थ की कोई भी सुविधा नहीं है। वे कहते हैं कि हमारे गांव से कोयलीबेड़ा कस्बा 35 किलोमीटर दूर है, जहां स्वास्थ केंद्र है।
वहां तक पहुंचने के लिए यह रास्ता भी कोई आम रास्ता न होकर नदी-नाले और पहाड़ों को पार करने में पूरा दिन चला जाता है। अबूझमाड़ के आमाटोला गांव में पीढ़ियों से पारंपरिक ज्ञान के सहारे बीस-पच्चीस गांवों में पैदल ही बीमार लोगों की देखभाल करने वाली सत्तर वर्षीय अमिल मंडावी कहती हैं कि हम तो केवल अपने पुरखों से सीखे गए कुछ पारंपरिक स्वास्थ्य सेवाएं ही आदिवासियों को दे पाते हैं, अन्यथा अब तो इतनी नई-नई बीमारी पैदा हो गई है कि हम उनका इलाज ही नहीं ढूंढ़ पाते। वे कहती हैं कि पिछले कुछ दशकों में कुपोषण ने तेजी से हमारे इलाके में पैर पसारे हैं।
डाउन टू अर्थ ने अबूझमाड़ के ऐसे ही दो गांवों (कल्पर और कुमुड़गुंडा) का दौरा किया, जहां कुपोषण की स्थिति बहुत ही भयावह है। इसके अलावा भी इस इलाके में कई ऐसे गांव हैं जहां कुपोषण की स्थिति गंभीर बनी हुई है। राज्य सरकार ने अब तक इनकी सुध नहीं ली है।
कुपोषण प्रभावित कुमुडगुंडा अबूझमाड़ के उन गांवों में शामिल है जहां पहुंचना आज भी एक मुश्किल काम है। गांव में कुल जमा पांच ही घर हैं हालांकि उनकी बसाहट काफी दूर-दूर तक फैली हुई है। इस गांव की जनसंख्या कुल जमा 35 है।
गांव के आदिवासी पंडरन नूरुटी ने बताया कि इतनी कम जनसंख्या होने के बावजूद हम जैसे-तैसे परिवार को जीवित रख पा रहे हैं, हमारे यहां न तो स्कूल है, न स्वास्थ्य केंद्र, न आंगनबाड़ी। यहां तक कि जो सरकारी अनाज माह में पांच किलो मिलता है, उसे लेने जाने के लिए हमें यहां से 30 से 35 किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है।
वे कहते हैं कि यह दूरी आसान नहीं होती है, जंगल, पहाड़ और नदी-नालों को पार करने में ही पूरा दिन चला जाता है और बदकिस्मत से यदि राशन की दूकान बंद मिली तो आपकी सारी मेहनत अकारत (बर्बाद) हो गई। ध्यान रहे कि अबूझमाड़ का यह गांव काफी अंदुरुनी इलाके में बसा हुआ है। गांव के हर घर से कोई न कोई बच्चा कुपोषण का शिकार है।
इस संबंध में लक्ष्मण कहते हैं कि जब सरकार की एक भी योजना यहां नहीं पहुंची है तो बच्चे कुपोषित होंगे ही।
ध्यान रहे कि राज्य सरकार ने कुपोषण को आदिवासी क्षेत्रों सहित पूरे राज्य से मिटाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया हुआ है। लेकिन सरकारी आंकड़े ही यह बता रहे हैं कि कुपोषण को मिटाने के लिए चलाए जा रहे अभियानों के लिए स्वीकृत धनराशि पिछले तीन सालों में लगातार कम होती गई है।
उदाहरण के लिए मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना में 2022-23 के दौरान 80 लाख रुपए स्वीकृत किए गए थे। यह धनराशि 2023-24 में घटकर 76 लाख पर आ गई और 2024-25 में तो तीन गुना घट कर 23 लाख रुपए ही रह गई है।
इस संबंध में आदिवासी संगठन के सदस्य मनकू नेताम कहते हैं कि ये आंकड़े बता रहे हैं कि जब सरकार ही आदिवासी बच्चों के लिए स्वीकृत धनराशि कम करती जा रही है तो ऐसे में हमारे आदिवासी इलाकों से कैसे कुपोषण खत्म होगा।
राज्य सरकार की एक अन्य योजना में भी इसी प्रकार से धनराशि साल-दर-साल कम होती जा रही है। राज्य के महिला बाल विकास विभाग से मिली जानकारी के अनुसार राज्य सरकार द्वारा कुपोषण को कम करने के लिए बच्चों के लिए पूरक पोषण आहार योजना में भी 2022-23 में 30 करोड़ रुपए की धनराशि मंजूर की गई थी। यह 2023-24 में घटकर 29 करोड़ रुपए हो गई और 2024-25 में तो इसमें सीधे 33 फीसद कम करते हुए केवल 20 करोड़ रुपए ही स्वीकृत किए गए।
ध्यान रहे कि राज्य सरकार द्वारा कुपोषण को मिटाने के लिए चलाई जा रही योजनाओं की धनराशि में हर साल कमी होती जा रही है। यह सर्वविदित है कि ग्रामीणों के लिए चलाई जा रही योजनाओं के लिए खर्च की जाने वाली धनराशि को प्रतिवर्ष बढ़ाया जाता है क्योंकि प्रतिवर्ष योजनाओं से लाभ पाने वाले लाभार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी होती है न कि घटती है। राज्य सरकार ने कुपोषण को खत्म करने के लिए चलाई जा रही एक और योजना में कमी की है। यह है मुख्यमंत्री सुपोषण योजना।
इसके तहत राज्य सरकार ने 2022-23 में 27 करोड़ रुपए स्वीकृत किए थे। इसे 2024-25 में कम करके केवल दस करोड़ रुपए कर दिया। ऐसे में यह एक बड़ा सवाल है कि जब कुपोषण को खत्म करने के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं के लिए जारी की जाने वाली धनराशि ही प्रतिवर्ष कम की जा रही है तो ऐसे में कैसे राज्य के आदिवासी इलाकों सहित राज्य में फैला कुपोषण मिटेगा?
गांव के ही एक निवासी देवूराम कहते हैं कि अकेले अनाज की कमी ही कुपोषण का कारण नहीं है, बल्कि हमारे लिए पीने का पानी भी सालों से एक बड़ी समस्या बना हुआ है। वे कहते हैं कि हमारे दादा-परदादा नदी-नालों से ही पानी पीते थे और अपने निस्तार में भी उस पानी का ही उपयोग करते आए थे, लेकिन अब पिछले तीन-चार दशकों से हमारे इलाके का वातावरण बदल गया है, नदी-नालों में अब इतना पानी नहीं है कि वे अब हमारे रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा कर सकें।
देवूराम की बात सौ फीसदी सही है क्योंकि गांव की महिलाएं गांव के पास ही एक बरसाती नदी के किनारे बनाए गए गड्ढों में पानी रिसने का इंतजार करती सुबह-शाम नजर आ जाती हैं। वे इस इंतजार में घंटों बैठी या खड़ी रहती हैं कि कब पानी रिस-रिस कर गड्ढा भरे तो वे इसे अपनी लिए ले जा सकें।
ऐसे में यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस गांव में ग्रामीणों को साफ पानी भी मयस्सर नहीं हो पा रहा है। गांव के एक अन्य आदिवासी रहसुख कहते हैं कि कुछ साल पहले, हमारे गांव में एक हैंडपंप लगाया गया था। लेकिन उसका पानी आदमी तो दूर हमारे जानवर भी नहीं पीते हैं। वे कहते हैं कि अपनी समस्या के लिए जब हम जिला मुख्यालय जाते हैं तो सरकारी महकमा हमें कहता है कि तुम्हारा गांव जंगल के बहुत अंदर स्थित है, वहां तक सुविधाओं को पहुंचाना बहुत कठिन है।
रहसुख सवाल उठाते हुए कहते हैं कि जब हमारा गांव इतनी दूर है तो आपकी पुलिस तो पिछले दो-ढाई दशकों से सैकड़ों मर्तबा हमसे पूछताछ के लिए आए दिन हमारे गांव में छापामारी करती रहती है। हमारे गांव में पुलिस इतनी आसानी से कैसे पहुंच जाती है? वे कहते हैं कि जब हमसे पूछताछ के लिए पुलिस हमारे गांव तक पहुंच सकती है तो सरकारी योजनाएं क्यों नहीं पहुंच सकतीं ?