कोसी पर बन रहा देश का लंबा पुल, फिर भी चचरी पुल के सहारे जिंदगी

सुपौल के भेजा और आसपास के गांवों में हजारों लोग आज भी कोसी नदी पार करने के लिए अस्थायी चचरी पुल पर निर्भर हैं। ग्रामीणों की मदद से बने इस पुल से गुजरने के लिए लोगों को पैसे देने पड़ते हैं। सवाल है कि करोड़ों रुपए की सड़क और पुल परियोजनाओं के बावजूद सुरक्षित आवागमन की सुविधा आखिरी छोर तक क्यों नहीं पहुंच पाई है।
बिहार के सुपोल जिले में लोगों द्वारा बनाया गया यह पुल आवागमल का एकमात्र साधन है। फोटो: राहुल कुमार गौरव
बिहार के सुपोल जिले में लोगों द्वारा बनाया गया यह पुल आवागमल का एकमात्र साधन है। फोटो: राहुल कुमार गौरव
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बिहार के सुपौल जिले के भेजा गांव की सुनीता देवी अपने दो बेटों के साथ अक्सर बाइक से परसरमा बाजार जाती हैं। गांव से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित इस बाजार तक पहुंचने के लिए उन्हें लगभग 60 रुपए खर्च करने पड़ते हैं, जिसमें पेट्रोल का खर्च शामिल नहीं है। सुनीता की तरह भेजा, टेंगरा, घोनवा, महापतिया और सोनबरसा समेत कई गांवों के लोगों को रोजमर्रा के कामों के लिए अतिरिक्त पैसे खर्च करने पड़ते हैं।

इसकी वजह कोसी नदी पर बना करीब एक किलोमीटर लंबा चचरी पुल है, जिससे लोग मरचैय चौक के पास नदी पार करते हैं। इसी इलाके में 13.3 किलोमीटर लंबे भेजा-बकौर कोसी पुल का निर्माण अंतिम चरण में है। इसकी मुख्य संरचना करीब 10.2 किलोमीटर लंबी है। इससे सुपौल और मधुबनी के बीच सड़क संपर्क बेहतर होने और यात्रा की दूरी लगभग 44 किलोमीटर कम होने की उम्मीद है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बड़े पुल का लाभ आसपास के गांवों तक भी पहुंच पाएगा?

क्षतिग्रस्त चचरी पुल से गुजरने की मजबूरी

सुपौल शहर से करीब 16 किलोमीटर दूर मरचैय चौक पहुंचने पर क्षेत्र में आवागमन की मुश्किलें साफ दिखाई देती हैं। चचरी पुल के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हैं। स्थानीय मजदूर मरम्मत में जुटे हैं, लेकिन पुल पार करने वालों के लिए जोखिम बना हुआ है।

ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान दो लोगों से पुल पार करने के लिए 60 रुपए और मोटरसाइकिल के लिए 30 रुपये (कुल 90 रुपए) लिए गए। कर्मचारी अन्य लोगों को रसीद दे रहे थे, लेकिन पत्रकार होने की जानकारी देने पर पैसे लेने के बावजूद रसीद नहीं दी गई।

वसूली कर रहे रोशन कुमार के मुताबिक, पुल का निर्माण सरकार ने नहीं, बल्कि ग्रामीणों ने मिलकर कराया है, इसलिए रखरखाव के लिए पैसे लिए जाते हैं। करीब ढाई साल पहले जिला परिषद सदस्य समेत अन्य लोगों की सहमति से इसे लगभग पांच से सात लाख रुपये खर्च कर बनाया गया था। हालांकि, रसीद पर किसी सरकारी विभाग का नाम नहीं है।

ग्रामीण छोटू यादव कहते हैं, “जब सरकार व्यवस्था नहीं कर रही है तो हम लोगों को ही व्यवस्था करनी होगी। नाव से जाने में ज्यादा रुपये खर्च होते हैं। सरकार पुल बनाएगी तो हमें ऐसी व्यवस्था क्यों करनी पड़ेगी?”

रोजाना 1,500 से अधिक लोगों की आवाजाही

चचरी पुल की मरम्मत में लगे उदित चौधरी के मुताबिक, हर दिन कम से कम 1,500 लोग पुल पार करते हैं। इनमें से करीब 500 लोगों से पैसे लिए जाते हैं, जबकि आसपास के गांवों के लगभग 1,000 लोगों से वसूली नहीं होती। यदि 500 लोगों से प्रतिदिन 30 रुपये लिए जाएं, तो रोजाना की वसूली लगभग 15,000 रुपये हो सकती है।

सुपौल के मानस झा का कहना है कि मुख्य सड़क की तुलना में यह छोटा रास्ता है, लेकिन शुल्क की रसीद पर पंजीकरण या रसीद संख्या जैसी जानकारी नहीं मिलती, जो रोजाना आने-जाने वालों के लिए एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गया है।

बड़ा पुल, लेकिन गांवों तक पहुंचने का रास्ता कहां?

भेजा-बकौर कोसी पुल से राष्ट्रीय राजमार्ग-27 और पटना की ओर आवागमन आसान होने के साथ नेपाल तथा पूर्वोत्तर भारत से संपर्क बेहतर होने की उम्मीद है। लेकिन स्थानीय ग्रामीणों की चिंता है कि बड़े पुल के साथ उनके गांवों को जोड़ने वाली पर्याप्त संपर्क सड़कें नहीं बनी हैं।

सोनबरसा गांव के 70 वर्षीय याकूब अली कहते हैं, “सरकार का इतना बड़ा पुल हम गांव वालों के लिए किसी काम का नहीं है, क्योंकि पुल पर चढ़ने के लिए काफी दूर जाना होगा। कोई पीपा पुल भी नहीं दिया गया है।” यदि मुख्य पुल तक पहुंचने के लिए संपर्क सड़कें उपलब्ध नहीं होंगी, तो परियोजना का लाभ सभी गांवों तक समान रूप से नहीं पहुंचेगा।

कोसी क्षेत्र में चचरी पुलों की जरूरत

कोसी नदी पर लंबे समय से काम कर रहे इंजीनियर और लेखक डॉ. दिनेश कुमार मिश्र के मुताबिक, इस क्षेत्र में नदी पार करने के लिए नाव और चचरी पुल महत्वपूर्ण साधन हैं। गांवों को जोड़ने वाली पर्याप्त अप्रोच सड़कें नहीं होने के कारण चचरी पुलों की जरूरत बनी हुई है।

कोसी की बदलती धारा और बाढ़ को देखते हुए केवल पुल बनाना पर्याप्त नहीं है। इसका उदाहरण बलवा पंचायत के गांवों को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 2022 में 8.37 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया पुल है, जो 2024 में तटबंध टूटने के बाद आई बाढ़ में क्षतिग्रस्त हो गया। यह घटना बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण की गुणवत्ता और समय पर रखरखाव की महत्ता को बताती है।

एमएलएसएम कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग से जुड़े विद्यानाथ झा का कहना है कि हर गांव तक पक्का पुल पहुंचाना संभव नहीं है, इसलिए ग्रामीणों के बनाए चचरी पुल स्थानीय जरूरतों को पूरा करते रहेंगे। हालांकि, सरकारी पुलों के रखरखाव और सुरक्षित आवागमन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

विकास का लाभ आखिरी गांव तक कब पहुंचेगा?

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच बिहार में सड़क और पुलों पर 46,173 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वहीं, आपदा प्रबंधन आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 में 35.16 करोड़ रुपये और 2023-24 में 100 करोड़ रुपये मरम्मत के लिए आवंटित किए गए थे।

इन निवेशों के बावजूद मरचैय चौक की स्थिति यह सवाल उठाती है कि विकास का आकलन केवल पुलों की लंबाई और खर्च से किया जाए या ग्रामीणों को मिलने वाली सुविधा, सुरक्षा और पहुंच से भी। जब तक बड़े पुलों को गांवों और बाजारों से जोड़ने वाली सड़कें नहीं बनतीं, तब तक लोगों को अस्थायी पुलों, नावों और अतिरिक्त खर्च पर निर्भर रहना पड़ेगा। विकास की असली सफलता तभी होगी, जब सुरक्षित और किफायती आवागमन की सुविधा गांव के आखिरी घर तक पहुंचे।

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