

नन्हा अलादीन यूं ही वेला घूम रहा था कि अचानक उसके पैर में कुछ टकराया। पाठकों, आपने एकदम सही गेस किया। वह चिराग ही था!
चिराग गंदा था, इसलिए नन्हा अलादीन उसे घिसने लगा। हे पाठक! आपका गेस इस बार भी सही है। चिराग से पहले धुआं निकला और फिर एक जिन्न प्रकट हुआ।
नन्हा अलादीन आश्चर्य से बोला, “अलादीन का जादुई चिराग!”
जिन्न ने एक झापड़ लगाते हुए मासूमियत से कहा, “सर जी! हाल ही में हिंदी-दिवस बीता है, कृपया हिंदी अपनाएं। आप का नाम अलादीन नहीं, अमर देव है जिसे मुगलों ने बदल कर अलादीन कर दिया है। यह चिराग नहीं बल्कि एक प्रदीप-यंत्र है। एंड लास्ट बट नॉट लीस्ट मैं जिन्न नहीं.. एक प्रेत हूं!”
प्रेत ने कहा, “क्या हुकुम है मेरे आका? सॉरी! आई मीन, क्या आदेश है प्रभु!”
अमर देव बोला, “मैं समय-यंत्र की मदद से समय-यात्रा का इच्छुक हूं!”
अब चौंकने की बारी प्रेत जी की थी। उसने तड़ से अपने कच्छे की जेब से फादर कामिल बुल्के की अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश निकाल कर कहा, “प्रभु टाइम मशीन से टाइम ट्रेवल के लिए इच्छुक हैं! तो ऐसे बोलिए न! इसके लिए इतनी कठिन शब्दावलियों की क्या जरूरत है? टाइम ट्रेवल के लिए यह टाइम सही नहीं है। मैं आपकी इच्छा रेट्रो इमेज कि मदद से पूरी कर सकता हूं।”
इतना कहते हुए प्रेत ने अपने कच्छे की दूसरी जेब से मार्केट में आए सबसे रीसेंट मॉडल का स्मार्टफोन निकालकर अमर देव के सामने रख दिया और बोला, “प्रभु, आप कृपया इस रेट्रो ऐप से अपना सेल्फी लें।”
अमर देव ने सेल्फी ली और देखते ही देखते एआई ने अमर देव का हुलिया अस्सी के दशक के किसी बम्बइया फिलिम के हीरो जैसा कर दिया। चेक वाली शर्ट, बेल-बॉटम पेंट और घुंघराले बाल!
अमर देव ने पूछा, “यह बांगड़ू व्यक्ति कौन है?”
प्रेत बोला, “हे प्रभु यह आपका अस्सी के दशक का रेट्रो इमेज है! चलिए अब हम अपनी यात्रा शुरू करते हैं।”
इतना कहकर वह एक हवाई कालीन ले आया जिस पर सवार होकर दोनों देश भ्रमण पर निकल पड़े। वह एक नदी के ऊपर से उड़ रहे थे जिसका पानी एकदम मैला था और पानी से झाग निकल रहा था। अमर देव ने अपने स्मार्ट फोन के रेट्रो इमेज ऐप से देखा तो नदी एकदम से साफ हो गई। झाग, मैल की जगह वहां मछलिओं और अन्य जलीय जानवर दिख रहे थे। अमर देव को बड़ा आश्चर्य हुआ। थोड़ी देर में वह पहाड़ों की चोटियों के ऊपर से उड़ रहे थे। पहाड़ों से बर्फ ग्लेशियर गायब हो गए थे पर रेट्रो ऐप से पूरी चोटियां बर्फ से ढकी दिखीं। जगह-जगह ग्लेशियर दिखे। आगे बढ़ने पर वह किसी आधुनिक महानगर के ऊपर पहुंच गए। नीचे अंतहीन ट्रैफिक जाम लगा हुआ था। पर यह क्या? रेट्रो इमेज ऐप से ट्रैफिक जाम गायब हो गया था।
थोड़ी देर में वे लोग एक धू-धू बंजर के ऊपर से उड़ रहे थे जहां हजारों डम्पर-ट्रक चीटियों की तरह रेंग रहे थे। रेट्रो इमेज ऐप से पूरी जगह घने जंगल से ढक गई थी। आदिवासियों के उत्सव के ढोल की मधुर ध्वनि भी सुनाई पड़ रही थी।
अमर देव को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? उसने प्रेत से पूछा, “हे प्रेत, अपनी रेट्रो इमेज यानी अस्सी के दशक में नदियां साफ हैं, जंगल हरे-भरे हैं, पहाड़ बर्फ से ढके हुए हैं, आखिर आज इनकी हालत इतनी खराब क्यों है?”
प्रेत बोला, “प्रभु इसी का नाम विकास है!”
अमर देव ने अपने पूरे अनुभव को अपनी किताब “माई एक्सपेरिमेंट्स विथ डेवलपमेंट” में लिख मारा। कहते हैं इस किताब पर संसद में बहुत हंगामा हुआ और राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए इस किताब के प्रकाशन पर पाबंदी लगा दी गई।