

हर साल जब हमारी वर्षगांठ आती है तो हमें एहसास होता है कि हम एक साल और बड़े हो गए हैं। ऐसे में मैं बीते हुए समय को याद करती हूं और उसका ब्यौरा लिखती हूं। लेकिन इस साल जब हम डाउन टू अर्थ हिंदी पत्रिका के प्रकाशन के 10 साल पूरे कर रहे हैं तो मैं वर्तमान और आने वाले सालों में हमारे सामने मौजूद कामों के बारे में बात करना चाहती हूं। हम एक ऐसी नई दुनिया की दहलीज पर हैं जो अलग-अलग और विवादित सच्चाइयों से बनी है। यह वह समय है जब हमें अपना सिर ऊंचा रखना है और अपने पैर मजबूती से जमीन पर टिकाए रखने हैं। यह उन मूल्यों (मानवतावाद, न्याय और समानता) को गहराई से समझने का समय है जिनमें हम विश्वास करते हैं।
यह बात फिर से कहना अजीब लगता है कि जोर से कहने की तो बात ही छोड़िए लेकिन यह वह दौर है जब जिन चीजों को हम कभी सामान्य मानते थे, वे अब बेहिसाब लालच, बेहिसाब सत्ता और पहले कभी न देखी गई क्रूरता की धुंध में गायब होती नजर आ रही हैं। हमें इंसान के तौर पर अपना संतुलन खोने का खतरा है। लेकिन हम उम्मीद नहीं छोड़ सकते। हम उस सोच को आगे बढ़ाना नहीं छोड़ सकते जो घटनाओं को बदल दे, जैसे प्रेरणा देने वाले आदर्शों को सामने लाना और सत्ता के सामने सच बोलना। मैं अपने सभी सुधी पाठकों को साफ-साफ बताना चाहती हूं कि यह आसान नहीं है। मैं आपके सामने तथ्यों को छिपाऊंगी नहीं या ऐसा दिखावा नहीं करूंगी कि सब ठीक है। सच तो यह है कि ज्ञान अब पवित्र नहीं रहा। समस्या कई तरह की है।
पहली यह है कि अब मीडिया पर भरोसा कम हो गया है, जानकारी देने वाले को दागदार, पक्षपाती या झूठा माना जाता है। दूसरी बात है कि जानकारी के इतने सारे स्रोत हैं कि हमने अपने-अपने दायरे बना लिए हैं। हम वही फॉलो करते हैं, पढ़ते हैं और अपनाते हैं जो पहले से ही हमारे पक्ष में है। अगर कोई नई जानकारी हमारी मान्यताओं का समर्थन नहीं करती तो हम उससे खुद को दूर कर लेते हैं। इससे नए पाठकों तक पहुंचना या नए विचारों तक पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। इन सबके बीच हम तेजी से बेसब्र होते जा रहे हैं, हमें जल्दी से समझने के लिए न्यूज चाहिए न कि ऐसा ज्ञान जिस पर गहराई से सोचा जा सके। और फिर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) है, जो जानकारी की दुनिया को पूरी तरह बदल रहा है। आज हमें जो खबरें मिलती हैं, वह बहुत एडवांस्ड मशीनों द्वारा तैयार कर परोसी जाती हैं।
खबरों के बदलते इस समीकरण में डाउन टू अर्थ कहां फिट बैठता है? हमारी समस्या (जो असल में हमारी ताकत है) यह है कि हम किसी खास खांचे में फिट नहीं बैठते। हम सरकार के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं, न इस सरकार के और न ही किसी और के, हम न तो वामपंथी हैं और न ही दक्षिणपंथी। हम मजबूती से उस विकास के पक्ष में हैं जो सबको साथ लेकर चलने वाला (इनक्लूसिव) और टिकाऊ (सस्टेनेबल) हो। हम ऐसी जानकारी के पक्ष में हैं जो तथ्यों पर आधारित और निष्पक्ष हो क्योंकि यह जमीनी स्तर से रिपोर्ट की जाती है। हम उन आवाजों को सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं जिन्हें सुना नहीं गया है। हमारा सचमुच मानना है कि हम अपनी लेखनी के जरिए विकास की प्रयोगशाला में भूमिका निभाते हैं, हम आपको भविष्य बदलने के लिए तैयार करते हैं।
हम कभी भी घमंड के साथ यह दावा नहीं करते कि हम भविष्य बदलते हैं। हम जानकारी के ऐसे बीज बोते हैं जो समाज में भूमिका निभाते हैं और फिर बदलाव लाते हैं। यहीं हम खड़े हैं, हमेशा की तरह अपने रास्ते पर अडिग। क्लाइमेट इमरजेंसी (जलवायु आपातकाल), युद्ध और गरीबी, एआई के सुपर-साइकिल भविष्य को और भी अनिश्चित बनाते हैं। लेकिन हमें यकीन है कि हम इन जरूरतों को नजरअंदाज नहीं कर सकते, रोशनी बनाए रखना, गरीबी से लड़ना और लोगों व प्रकृति दोनों के लिए सचमुच टिकाऊ दुनिया बनाना।
यह कोई उपदेश नहीं है, यह हमारी प्रतिबद्धता का बयान है जो चीज हमें जमीन से जोड़े रखती है। आपका भरोसा ही हमारी ताकत है। हम आपकी बातें सुनते हैं और जब आप हमें बताते हैं कि हमारे काम से फर्क पड़ता है तो इससे हमें मजबूती मिलती है। यह सचमुच हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह एक अभूतपूर्व समय है।
पिछले लगभग 10 सालों में हमने जो देखा है, जो डॉक्यूमेंट किया है और जो सामने लाए हैं, उसकी तुलना उस चीज से नहीं की जा सकती जो हमें अभी रिपोर्ट करनी है और आप तक पहुंचानी है। यह भारी उथल-पुथल और अव्यवस्था का समय है लेकिन साथ ही यह इस बात की बड़ी उम्मीद का समय भी है कि अगर हम मिलकर काम करें तो यह नई दुनिया कैसे बन सकती है। इसीलिए हमारा मानना है कि हमारा काम हमारे लिए तय है। आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका है जमीनी हकीकत से सीखना और आम लोगों की उद्यमशीलता और सूझ-बूझ से ताकत हासिल करना। यही चीज हमें जमीन से जोड़े रखेगी। इसलिए हमारे साथ बने रहें। इस जबरदस्त तूफानी समर में आप ही हमारा सहारा हैं।