गुम हुई सर्दी: बिहार में बिगड़ा मौसम का चक्र, घट गई जाड़े की उम्र

बिहार में विंटर सीजन में लगभग बारिश नहीं हुई, जबकि रबी सीजन में थोड़ी बारिश होना बहुत जरूरी होता है
फरवरी और मार्च की असामान्य गर्मी के कारण बिहार के दरभंगा में गेहूं की फसल पर असर पड़ा, जिससे दाने भरने की प्रक्रिया प्रभावित हुई और उत्पादन घटने की आशंका है। फोटो: राजन कुमार झा
फरवरी और मार्च की असामान्य गर्मी के कारण बिहार के दरभंगा में गेहूं की फसल पर असर पड़ा, जिससे दाने भरने की प्रक्रिया प्रभावित हुई और उत्पादन घटने की आशंका है। फोटो: राजन कुमार झा
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बिहार में इस वर्ष सर्दियों का मौसम असामान्य उतार-चढ़ाव से भरा रहा। जनवरी 2026 के दूसरे सप्ताह में राज्य के 30 जिलों में कोल्ड वेव यानी शीतलहर की स्थिति बनी रही। मौसम विभाग ने घने कोहरे और शीतलहर को लेकर चेतावनी भी जारी की थी।  वहीं फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में तापमान तेजी से बढ़ने लगी। मौसम विभाग के अनुसार फरवरी 2026 में बिहार के कुछ हिस्सों में अधिकतम तापमान 32  डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। विशेषज्ञों का कहना है कि फरवरी में तापमान का 30 डिग्री से ऊपर जाना सर्दी के जल्दी समाप्त होने का संकेत माना जाता है।

लोगों को महसूस हो रही है बदली हुई सर्दी

मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड निवासी राजेंद्र झा (94 साल) एक रिटायर्ड शिक्षक, वे कहते हैं, "बाबू, अब तो मौसम का चक्का ही उल्टा घूमने लगा है। हमारे समय में जाड़ा अपना पूरा समय लेकर आता था और तसल्ली से जाता था। लेकिन अब जाड़े की उम्र जैसे घट गई है। दिसंबर में शुरू होता है और जनवरी खत्म होते-होते दम तोड़ देता है। सबसे बड़ी मुसीबत तो ये जल्दी आने वाली गर्मी है। अभी फागुन (फरवरी-मार्च) शुरू ही होता है कि सूरज आग उगलने लगता है। पहले जो बसंत की बयार बहती थी, अब उसकी जगह मार्च में ही लू जैसी गर्मी महसूस होने लगती है।"

राजेंद्र झा की ये बातें सिर्फ व्यक्तिगत अनुभव नहीं हैं, बल्कि मुजफ्फरपुर के गायघाट प्रखंड और पूरे उत्तर बिहार के बुजुर्गों की साझा यादों और चिंता की आवाज हैं।

मौसम में आए इस बदलाव के चलते लोग बीमार भी होने लगे हैं। वैशाली जिले के पातेपुर निवासी महावीर प्रसाद ने इस असामान्य मौसम के प्रभाव को अपनी तबीयत के जरिए बयां किया। वे कहते हैं कि अब सर्दियां बहुत पहले ही खत्म हो जा रही हैं। 3 फरवरी से जैसे ही मौसम अचानक बदल गया, उसके बाद से तबीयत ठीक नहीं रहने लगी। बलगम और खांसी बढ़ गई, पैरों में सूजन रहने लगी। कोई खाना पच ही नहीं पा रहा था। दिन में अत्यधिक गर्मी महसूस होती है और रात को ठंड लगती है, इस उतार-चढ़ाव के कारण तबीयत पर बहुत असर पड़ा।

कृषि, आजीविका और काम पर प्रभाव: फसलें झुलस गईं

मुसरीघरारी नगर पंचायत (समस्तीपुर जिला, बिहार) के निवासी परमानंद राय ने इस असामान्य गर्म सर्दी के कारण अपनी खेती पर पड़े भारी नुकसान की बात बताई। वे कहते हैं, "अचानक तापमान बढ़ने से जो भी ठंडी फसलें थीं, खासकर लेट से बुआई वाली जैसे आलू और तिलहन में उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान हुआ। हम लोग दो फसल आलू लगाते थे। पहले वाली दिसंबर अंत में या जनवरी के पहले सप्ताह में निकाल लेते थे। दूसरी वाली दिसंबर के पहले सप्ताह या नवंबर के अंत में लगाई जाती थी, जिसे फरवरी लास्ट में या मार्च के पहले सप्ताह में निकालते थे, वो फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई।"

उनकी एक कट्ठा जमीन में पहले 3 से 4 क्विंटल आलू निकल जाता था, लेकिन इस बार सिर्फ 1 से 1.5 क्विंटल ही निकला। यानी खेती की पूरी लागत भी नहीं निकली। सरसों की पैदावार में भी कमी आई। वे सरसों अभी यानी मार्च के दूसरे सप्ताह में तोड़ते थे, लेकिन इस बार 20 दिन पहले ही फसल कट गई। दाना भरने का समय नहीं मिला, इसलिए उत्पादन बहुत कम हुआ।

वैशाली जिले के प्रकाश रंजन ने इस गर्म सर्दी के प्रभाव को विस्तार से बताया। वे कहते हैं, "पछिया हवा चलने के कारण गेहूं की पैदावार पर इसका असर पड़ेगा। पहले जो एक कट्ठा जमीन में 70 से 100 किलो गेहूं होता था, वह घटकर अब सिर्फ 40 से 50 किलो तक रह जाएगा। इस बार कोहरा पड़ा ही नहीं, जिससे गेहूं की पोसाई अच्छी तरह होती है। अब तो सब्जियों में भी नुकसान ज्यादा हुआ है। ठंड नहीं होने के कारण लहसुन में कली नहीं बंधी, जिससे किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। खेतों में ज्यादा से ज्यादा पानी पटाना पड़ रहा है। अब मुनाफा कितना होगा, यह तो समय के गर्भ में है।"

फरवरी-मार्च में अचानक गर्मी ने रबी फसलों के चक्र को बिगाड़ दिया। लेट आलू और सरसों जैसी फसलें समय से पहले पक गईं या अधर में रह गईं, जिससे उपज घटी और आर्थिक नुकसान बढ़ा। किसानों के लिए यह न केवल फसल का नुकसान है, बल्कि साल भर की मेहनत और परिवार की आजीविका पर गहरा असर है।

वैज्ञानिक राय: सर्दी गर्म हो रही है

सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार के अध्यक्ष एवं इंडियन मेटियोरोलॉजिकल सोसायटी, पटना चैप्टर के प्रधान पार्थ सरथी कहते हैं, "इस साल जनवरी में कोल्ड वेव का कारण साइबेरिया के पास होने वाली विंड मूवमेंट थी, जो हिमालय के करीब आ गई। इससे उत्तर भारत में मजबूत कोल्ड वेव देखी गई, और इसका असर दूर-दूर तक फैला। यहां तक कि ओडिशा में भी कोल्ड वेव दर्ज हुई, जबकि वहां पहले कभी ऐसा नहीं देखा गया था।"

वह कहते हैं कि कोल्ड वेव खत्म होते ही हम उम्मीद कर रहे थे कि फरवरी या मार्च में पश्चिमी विक्षोभ शुरू होंगे, लेकिन अभी तक एक भी पश्चिमी विक्षोभ नहीं आया। पश्चिमी विक्षोभ जब आता है, तो तापमान नीचे आता है, बारिश होती है और क्लाउडी मौसम रहता है, जिससे 7-8 दिनों तक तापमान कम रहता है।

सामान्यतः सर्दी के महीनों में हर महीने 3-4 पश्चिमी विक्षोभ की उम्मीद की जाती है, लेकिन फरवरी में यह आवृति बिल्कुल नहीं रही, इसलिए फरवरी से ही तापमान इतना तेजी से बढ़ा। ये विक्षोभ एक तरह के साइक्लोन होते हैं, जो पश्चिमी भारत से शुरू होकर दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी यूपी, पूर्वी यूपी, बिहार, बंगाल और असम होते हुए निकल जाते हैं। जब ये सक्रिय रहते हैं, तो क्लाउडी मौसम और वर्षा होती है। इस बार इनकी आवृति बिल्कुल नहीं रही, इसलिए तापमान में अचानक बढ़ोतरी हुई।

इस अचानक तापमान वृद्धि के कारण अब दिन में तापमान बहुत बढ़ जाता है, जबकि रात में तापमान अभी भी कम रहता है। दिन और रात के तापमान में करीब 20 डिग्री सेल्सियस का अंतर हो रहा है। यह 20 डिग्री सेल्सियस का अंतर मानव स्वास्थ्य पर बहुत जबरदस्त असर डाल रहा है। अभी आप देखेंगे कि वायरल फीवर, सर्दी-खांसी जैसी बीमारियां बहुत बढ़ गई हैं।"

बिहार मौसम सेवा केंद्र के संयुक्त निदेशक (तकनीकी) डॉ. प्रभु सीएन ने कहा, "बिहार में विंटर सीजन में लगभग बारिश नहीं हुई, जबकि रबी सीजन में थोड़ी बारिश होना बहुत जरूरी होता है। यह मौसम और खेती दोनों के लिए आवश्यक है। इस बार ठंड भी ज्यादा नहीं पड़ी, जिसके कारण हवा में नमी की कमी रही। इसी वजह से तापमान औसत से 3 से 4 डिग्री बढ़ा हुआ रहा। दूसरा प्रमुख कारण ग्लोबाल वार्मिंग का असर है।

अब मौसम में बदलाव पहले की तुलना में अधिक तेजी से हो रहा है। स्थानीय मौसमीय घटनाओं (लोकल फेनोमेना) का प्रभाव बढ़ गया है, जिसके कारण मौसम के पैटर्न में अधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।

15 फरवरी से ही गर्मी शुरू हो गई। इस बार हमने कृषि के लिए एडवाइजरी जारी की है। हम लोग हर दिन मौसम संबंधी जानकारी दे रहे हैं, जिस पर काम किया जा रहा है।"

 क्या कहते हैं आंकड़े

मौसम विज्ञान विभाग, पटना की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 में बिहार का मौसम असामान्य रहा, जिसमें ठंड, कम बारिश और तापमान में उतार-चढ़ाव देखा गया। जनवरी 2026 में सामान्य से 99 प्रतिशत कम बारिश देखने को मिली। 6 दिन गंभीर सर्द दिवस, 8 दिन सर्द दिवस और एक दिन शीत लहर चली।

फरवरी माह में मौसम विभाग के अनुसार बिहार में औसत सामान्य वर्षा 10.4 मिमी है। जबकि फरवरी 2026 में कुल मासिक वर्षा सामान्य से 100 प्रतिशत कम रही। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के राष्ट्रीय मौसमी आउटलुक के अनुसार बिहार में मार्च से मई 2026 के दौरान तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

विभाग का अनुमान है कि मार्च महीने में भी राज्य के कई हिस्सों में औसत से अधिक गर्मी दर्ज की जा सकती है। इस संभावित स्थिति को देखते हुए मौसम विभागविभाग ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन को हीटवेव से निपटने के लिए हीट एक्शन प्लान को समय रहते लागू करने की सलाह दी है।

बिहार मौसम सेवा केंद्र के आंकड़ों के अनुसार मार्च 2026 के दौरान राज्य के कई जिलों में अधिकतम तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। आमतौर पर इस समय बिहार में तापमान 32 से 34 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। मार्च की शुरुआत में ही तापमान का इस स्तर तक पहुंचना इस वर्ष की असामान्य गर्म सर्दी और जल्दी शुरू हो रही गर्मी का संकेत है।

बिहार में इस वर्ष की गर्म सर्दी केवल एक असामान्य मौसम घटना नहीं है, बल्कि यह बदलते जलवायु पैटर्न का संकेत भी हो सकती है। यदि तापमान में वृद्धि और मौसम के पैटर्न में यह बदलाव जारी रहता है, तो आने वाले वर्षों में इसका असर बिहार की कृषि, ग्रामीण आजीविका और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यापक रूप से दिखाई दे सकता है।

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