Photo: Pragati Prava
Photo: Pragati Prava

समुद्रतटीय क्षेत्रों पर मंडराता खतरा और देश का भविष्य

जलवायु परिवर्तन से भारत की 7,500 किमी तटीय पट्टी पर तापमान वृद्धि, अनियमित वर्षा, समुद्र स्तर में बढ़ोतरी और चक्रवातों की तीव्रता के रूप में बहुआयामी संकट, जिससे करोड़ों लोगों की आजीविका, स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर पड़ने की आशंका है
Published on

जलवायु परिवर्तन को वैश्विक तापमान से जुड़ी समस्या के रूप में परिभाषित किया गया है। इससे निपटने के लिए दुनिया भर में कई नियम कानून बनाए गए, प्रतिबद्धताएं दिखाई गई, लेकिन जब उन पर अक्षरश: अमल की बारी आई, तो कदम पीछे खींच लिए गए। इसका सीधा असर अब भारत समेत कई देशों के समुद्री तटक्षेत्रों में साफतौर पर दिखने लगा है।

भारत की लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा के आसपास के क्षेत्र अब एक आसन्‍न जलवायु संकट का सामना कर रहे है, जो अगले कुछ वर्षों के भीतर वहां के लोगों के जीवन, आजीविका तथा पारिस्थितिक तंत्र को व्यापक रूप से बदल देगा। इन क्षेत्रों में तापमान के साथ साथ वर्षा का स्‍वरूप भी तेजी से बदल रहा है। समुद्र का बढता स्‍तर इस संकट को और जटिल बना रहा है। यह समस्‍या इसलिए भी गंभीर और चिंताजनक हैं, क्‍योंकि देश की तटीय पटटी केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थ व्‍यवस्‍था की एक प्रमुख धुरी है।

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ओर से हाल ही में जारी रपट भारतीय तटीय क्षेत्र : जलवायु अनुमान 2021–2040  के अनुसार,  जलवायु परिवर्तन के प्रभाव हमारी कल्पना से कहीं अधिक तेज़ी से सामने आ रहे हैं। अध्ययन में वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त सीएमआईपी6 जलवायु मॉडल का उपयोग किया गया है, जिसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप क्षेत्रीय स्तर पर संशोधित किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में आबादी वाले अधिकांश क्षेत्रों में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापवृद्धि की सीमा अपेक्षा से कहीं पहले छूने का खतरा पैदा हो चुका है। इसी सीमा को वैज्ञानिक पृथ्वी की जलवायु प्रणाली के लिए एक निर्णायक मोड़ मानते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि अब केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने की चर्चा पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि हमें अपने शहरों, गांवों और विकास योजनाओं को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढालना होगा।

अध्‍ययन से पता चलता है कि देश के लगभग चालीस तटीय जिलों में गर्मी के दौरान अधिकतम तापमान में एक डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि होने की संभावना है। केरल का एर्नाकुलम जिला इस परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण बन सकता है, जहाँ अधिकतम तापमान में लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि का अनुमान है।

यह वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार औसत तापमान में एक डिग्री की बढ़ोतरी भी गर्मी के दबाव, ऊर्जा की बढ़ती मांग, श्रम उत्पादकता में कमी और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को कई गुना बढ़ा देती है। इसका सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ेगा, जिनका जीवन खुले वातावरण में श्रम पर निर्भर है। जैसे मछुआरे, निर्माण श्रमिक, बंदरगाह कर्मी और खेतिहर मजदूर।

सवाल ‘वेट-बल्ब तापमान’ को लेकर भी है। यह केवल गर्मी का नहीं, बल्कि गर्मी और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव का सूचक है। यदि यह तापमान 31 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुँच जाए, तो मानव शरीर के लिए लंबे समय तक सामान्य रूप से काम करना कठिन हो जाता है। केरल में बढ़ते वेट-बल्ब तापमान से लेकर महाराष्ट्र में तीव्र होते मानसून तक, जलवायु में हो रहे विशिष्ट परिवर्तन पहले से ही पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को अविश्वसनीय बना रहे हैं। यानी जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और श्रम सुरक्षा का भी प्रश्न बन चुका है।

तापमान के साथ-साथ वर्षा का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। महाराष्ट्र और गुजरात के तटीय क्षेत्रों में मानसून की तीव्रता बढ़ने की संभावना है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, मुंबई उपनगर में गर्मियों के अधिकतम तापमान में 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है, जो गर्मी के अनुकूल शहरी नियोजन की बढ़ती आवश्यकता को रेखांकित करती है। वहीं भारी वर्षा की अवधि लगभग छह दिन बढ़ सकती है, जबकि सूरत और भावनगर जिलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून क्रमशः 23 और 24 फीसदी अधिक तीव्रता हो सकती है।

गौरतलब है कि मुंबई में अनियमित वर्षा के कारण झींगे सुखाने का पारंपरिक व्यवसाय प्रभावित हो रहा है। गोवा में नमक उत्पादकों की पूरी फसल कुछ घंटों की बेमौसम बारिश में नष्ट हो जाती है। समुद्र के बढ़ते तापमान के कारण मछलियां तट से दूर जा रही हैं, जिससे छोटी नावों वाले मछुआरों को पहले की तुलना में अधिक दूरी तय करनी पड़ती है और कई बार वे खाली हाथ लौटते हैं। यानी जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा बोझ वही समुदाय उठा रहे हैं, जिनका इस संकट को पैदा करने में सबसे कम योगदान है।

समुद्र का बढ़ता स्तर इस संकट को और जटिल बना रहा है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन मौजूदा परिदृश्य (SSP2-4.5) के अनुरूप जारी रहा, तो वर्ष 2050 तक वैश्विक समुद्र स्तर लगभग 15 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है। जबकि तटीय भूगोल में कुछ सेंटीमीटर का बदलाव भी तटरेखा, कृषि, जलस्रोत और मानव बस्तियों पर गहरा असर डालता है। समुद्र का बढ़ता पानी तटीय कटाव को तेज करेगा, भूजल में खारेपन को बढ़ाएगा और अनेक क्षेत्रों को स्थायी रूप से रहने योग्य नहीं रहने देगा।

एक और गंभीर पक्ष चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता है। विभिन्‍न अध्‍ययनों में मुताबिक समुद्री सतह का तापमान प्रति दशक लगभग 0.27 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ रहा है। गर्म समुद्र उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है, जिसके कारण वे अधिक शक्तिशाली और विनाशकारी बनते हैं। पिछले कुछ वर्षों में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बार-बार आए भीषण चक्रवात इस प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं। इसलिए तटीय राज्यों के लिए अब केवल आपदा राहत की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी, उन्हें चक्रवात-प्रतिरोधी आवास, सुरक्षित आश्रय, चेतावनी प्रणाली और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन योजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी।

सबसे संवेदनशील पक्ष सुंदरबन से जुड़ा है। बार-बार तटबंध टूटने के कारण समुद्री खारापन खेतों, तालाबों और पेयजल स्रोतों तक पहुँच रहा है। इससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो रहा है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा हो रही हैं। यानी जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी प्रश्न है।

भारत की तटीय पट्टी केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की एक प्रमुख धुरी है। करोड़ों लोगों की आजीविका सीधे समुद्र से जुड़ी है। तटीय क्षेत्रों की जलवायु सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई, तो इसका प्रभाव केवल तटीय राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और रोजगार पर भी इसका असर पड़ेगा। प्रश्न यह है कि हमारी विकास नीतियाँ इस चुनौती के लिए कितनी तैयार हैं? अब तक हमारा दृष्टिकोण मुख्यतः आपदा आने के बाद राहत पहुँचाने का रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ऐसी चुनौती है, जहाँ राहत से अधिक महत्त्व अनुकूलन का है।

ऐसे में प्रत्येक तटीय जिले के लिए स्थानीय जलवायु कार्ययोजना तैयार करनी होगी। तटीय शहरों में गर्मी से बचाव की येाजना, माकूल जल निकासी व्यवस्था और बाढ़-प्रतिरोधी आधारभूत ढाँचे विकसित करने होंगे। मैंग्रोव, तटीय आर्द्रभूमि और प्राकृतिक तटीय सुरक्षा तंत्र के संरक्षण को विकास परियोजनाओं के समान ही प्राथमिकता देनी होगी।

अगर अभी भी विकास की दिशा और प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में समुद्र केवल तटरेखा ही नहीं बदलेगा, बल्कि तटीय भारत की अर्थव्यवस्था, संस्कृति और सामाजिक संरचना को भी गहराई से प्रभावित करेगा।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in