

“युवा आक्रोशित हैं। दुनिया भर में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। इन प्रदर्शनों में अधिकांश भागीदारी युवाओं की है। भले ही इनके कारण शासन परिवर्तन की मांग से लेकर महंगाई तक अलग-अलग हों, लेकिन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और डाउन टू अर्थ पत्रिका के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि युवाओं में ‘इको-एंग्जायटी’ बढ़ रही है। वे पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के लगातार हो रहे क्षरण तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने में दुनिया की ढिलाई के खिलाफ भी आवाज उठा रहे हैं।” यह बात डाउन टू अर्थ के प्रबंध संपादक रिचर्ड महापात्रा ने राजस्थान के निमली में चल रहे अनिल अग्रवाल डायलॉग के दौरान आयोजित एक सत्र में कहे।
महापात्रा ने स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट रिपोर्ट के नवीनतम (2026) संस्करण का संपादन किया है, जिसे सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) और डाउन टू अर्थ द्वारा हर वर्ष प्रकाशित किया जाता है। इस रिपोर्ट को ‘अनिल अग्रवाल डायलॉग’ में जारी किया गया। इसका आयोजन सीएसई ने किया है।
महापात्रा ने कहा, “हमारे विश्लेषण के अनुसार ये विरोध प्रदर्शन किसी चुने हुए नेतृत्व द्वारा संचालित नहीं हैं। बल्कि इन्हें विभिन्न विकास संबंधी मुद्दे ऊर्जा देते हैं और इन्हीं से ये लगातार बने हुए हैं। दुनिया में इस समय 10 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 2.4 अरब युवा हैं, जो स्वयं इन आंदोलनों का नेतृत्व कर रहे हैं।”
डीटीई सर्वे से इको-एंग्जायटी का आकलन
डाउन टू अर्थ (डीटीई) ने अक्टूबर-नवंबर 2025 के दौरान 16 से 25 वर्ष आयु वर्ग के 300 युवाओं के बीच एक सर्वेक्षण किया। लगभग 88 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि उन्हें अपने आसपास जलवायु में बदलाव महसूस हो रहा है, जबकि 67 प्रतिशत ने बताया कि ये परिवर्तन उनके दैनिक जीवन और जीवनशैली को प्रभावित कर रहे हैं। महापात्रा कहते हैं, “यह दिखाता है कि इको-एंग्जायटी कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुकी है। पिछले 25 वर्षों में जन्मी पीढ़ी ने शायद कभी ‘सामान्य’ जलवायु का अनुभव ही नहीं किया। हीटवेव से लेकर चक्रवात और बाढ़ तक पृथ्वी की धड़कन बदल चुकी है और युवा इसे पहले से कहीं अधिक तीव्रता से महसूस कर रहे हैं।” विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि फरवरी 1986 के बाद जन्मे लोगों ने संभवतः एक भी ऐसा महीना नहीं देखा होगा, जब तापमान पूरी तरह सामान्य रहा हो।
स्टेट ऑफ इंडिया एनवायरमेंट रिपोर्ट में प्रकाशित इस सर्वे के अनुसार 57 प्रतिशत प्रतिभागियों ने खुद को ‘चिंतित’ बताया। कई युवाओं ने कहा कि वे खुद को ‘लाचार’, ‘डरे और उदास’, ‘गुस्से में’ या ‘ठगा हुआ’ महसूस करते हैं।
असमानता, विकास से वंचित व अनिश्चित भविष्य प्रमुख कारण
रिपोर्ट के अनुसार 1990 के बाद से आय और संपत्ति की असमानता लगातार बढ़ रही है। एक आकलन के मुताबिक दुनिया की दो-तिहाई आबादी ऐसे देशों में रहती है, जहां असमानता में वृद्धि हुई है। कोई भी आकस्मिक घटना, जैसे चरम मौसम की वजह से आ रही आपदां, लोगों को गरीबी रेखा के नीचे धकेल सकती है।
महापात्रा कहते हैं, “विश्व बैंक के अनुसार हर पांचवां व्यक्ति जलवायु आपदाओं के खतरे में है। आज दुनिया में युवाओं की आबादी इतिहास में सबसे अधिक है। ऐसे में विकास से बाहर रह जाना और भविष्य की अनिश्चितताएं युवाओं के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रही हैं।”
रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के युवा रोजगार और आजीविका के पर्याप्त साधन न होने से परेशान हैं। वे अपनी जरूरतों को पूरा करने में नाकाम मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। अधिकांश विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में व्यापक रूप से आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा है।