बदलती जलवायु के कारण चूहों से फैलने वाली घातक बीमारियों के खतरे बढ़ने के आसार

बदलती बारिश से बढ़ रही चूहों की संख्या, लासा वायरस संक्रमण का खतरा बढ़ा; शोध में इंसानों में बीमारी के मामलों से मिला सीधा मौसमी संबंध
शोध के अनुसार, संक्रमित मां से बच्चों में वायरस पहुंचने से चूहों की आबादी में संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है।
शोध के अनुसार, संक्रमित मां से बच्चों में वायरस पहुंचने से चूहों की आबादी में संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है।फोटो साभार :आईस्टॉक
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सारांश
  • बारिश बढ़ने से चूहों की संख्या में तेजी आ सकती है, जिससे लासा वायरस के संक्रमण का खतरा बढ़ने की आशंका है।

  • वैज्ञानिकों ने पाया कि संक्रमित चूहों की संख्या बढ़ने के करीब एक महीने बाद इंसानों में लासा बुखार के मामले बढ़े।

  • शोध के अनुसार, संक्रमित मां से बच्चों में वायरस पहुंचने से चूहों की आबादी में संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है।

  • नाइजीरिया के 6,000 से अधिक मामलों के अध्ययन में 83 प्रतिशत बार बीमारी के चरम का समय सही पहचाना गया।

  • वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम के साथ इंसानी व्यवहार और स्वास्थ्य निगरानी भी बीमारी के प्रसार को प्रभावित करते हैं।

बारिश में बदलाव केवल खेती और पानी की व्यवस्था को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि इसका असर इंसानों की सेहत पर भी पड़ सकता है। एक नए शोध में वैज्ञानिकों ने पाया है कि ज्यादा बारिश से कुछ खास चूहों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है। इन चूहों की संख्या बढ़ने के साथ लासा वायरस के संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है। लासा वायरस इंसानों में लासा बुखार नाम की बीमारी पैदा करता है।

यह शोध लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। शोध के नतीजे वैज्ञानिक पत्रिका ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ में प्रकाशित हुए हैं।

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बारिश से बढ़ती है चूहों की संख्या

वैज्ञानिकों ने अफ्रीका में पाए जाने वाले नटाल मल्टीमैमेट माउस नाम के चूहे पर अध्ययन किया। इसका वैज्ञानिक नाम मास्टोमीस नटालेंसिस है। यह चूहा लासा वायरस का प्रमुख वाहक माना जाता है।

शोधकर्ताओं ने करीब 30 साल तक जुटाए गए आंकड़ों और 20 हजार से ज्यादा चूहों की जानकारी का अध्ययन किया। इसमें मौसम, बारिश, चूहों की संख्या और वायरस के संक्रमण से जुड़े आंकड़े शामिल थे। अध्ययन में पाया गया कि ज्यादा बारिश होने पर चूहों के लिए भोजन की उपलब्धता बढ़ सकती है। इससे उनके प्रजनन में तेजी आती है और चूहों की संख्या बढ़ जाती है। जब चूहों की संख्या बढ़ती है तो संक्रमित चूहों की संख्या बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाती है।

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मां से बच्चों में भी पहुंचता है वायरस

शोध की एक अहम जानकारी यह है कि लासा वायरस चूहों की आबादी में लंबे समय तक बना रह सकता है। वैज्ञानिकों के मॉडल के अनुसार, संक्रमित गर्भावस्थाओं में करीब 80 प्रतिशत मामलों में वायरस मां से उसके बच्चों तक पहुंच सकता है।

इससे वायरस एक प्रजनन मौसम से दूसरे प्रजनन मौसम तक चूहों की आबादी में बना रह सकता है। यही कारण है कि पर्यावरण में बदलाव के बाद चूहों की संख्या बढ़ने पर संक्रमण का खतरा भी बढ़ सकता है।

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नाइजीरिया के मामलों से मिला अहम संकेत

वैज्ञानिकों ने तंजानिया में मिले आंकड़ों के आधार पर एक मॉडल तैयार किया। इसके बाद उन्होंने इस मॉडल को नाइजीरिया में लासा बुखार के मामलों के साथ जांचा।

इसके लिए 2018 से 2025 के बीच नाइजीरिया के पांच राज्यों में दर्ज 6,000 से ज्यादा पुष्ट लासा बुखार के मामलों को देखा गया। अध्ययन में पाया गया कि संक्रमित छोटे चूहों की संख्या में बढ़ोतरी आम तौर पर इंसानों में बीमारी के मामलों में बढ़ोतरी से करीब एक महीने पहले हुई।

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83 प्रतिशत तुलना में संक्रमित चूहों में अनुमानित बढ़ोतरी और इंसानों में बीमारी के चरम के बीच का अंतर 28 दिनों के अंदर रहा। इससे संकेत मिलता है कि चूहों में संक्रमण का अध्ययन बीमारी के बढ़ते खतरे का पहले से पता लगाने में मदद कर सकता है।

बीमारी का खतरा कैसे बढ़ता है

लासा बुखार पश्चिम अफ्रीका में पाया जाने वाला एक रोग है। इंसान संक्रमित चूहों के सीधे संपर्क में आने से संक्रमित हो सकते हैं। चूहों के पेशाब या मल से दूषित भोजन और घर की चीजों के संपर्क में आने से भी संक्रमण फैल सकता है। गंभीर मामलों में यह बीमारी जानलेवा हो सकती है।

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हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल बारिश के आधार पर यह नहीं बताया जा सकता कि इंसानों में कितना बड़ा प्रकोप होगा। लोगों का व्यवहार, चूहों के संपर्क में आने की संभावना और बीमारी की पहचान की व्यवस्था जैसे कई दूसरे कारण भी महत्वपूर्ण हैं।

बदलते मौसम के बीच बढ़ी चिंता

शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु और पर्यावरण में बदलाव से इंसानों, जानवरों और रोग फैलाने वाले वायरस के बीच संबंध भी बदल सकते हैं। इसलिए केवल मौसम का अध्ययन करना पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि मौसम से जानवरों की संख्या और उनके बीच संक्रमण कैसे प्रभावित होता है।

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वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के मॉडल भविष्य में लासा बुखार के अलावा अन्य बीमारियों के अध्ययन में भी काम आ सकते हैं। खासकर ऐसी बीमारियां जिनमें चूहे या दूसरे छोटे स्तनधारी संक्रमण फैलाने में भूमिका निभाते हैं।

यह अध्ययन यह समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है कि पर्यावरण में होने वाले बदलाव इंसानों के स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि इन मॉडलों को और बेहतर बनाने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों और लंबे समय के आंकड़ों की जरूरत होगी।

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