दिन ही नहीं, रातें भी तप रही हैं: दिल्ली की घटती ठंडक पर सीएसई ने चेताया

सीएसई की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली में दिन-रात की प्राकृतिक ठंडक घट रही है। सबसे ज्यादा मार झुग्गी बस्तियों, दिहाड़ी मजदूरों, गिग वर्करों और बेघर लोगों पर पड़ रही है। हीट एक्शन प्लान में ठोस रणनीति के अभाव पर सवाल उठाया गया है
बाहर रह रहे लोगों को गर्मी का सीधा सामना करना पड़ रहा है। फोटो: विकास चौधरी
बाहर रह रहे लोगों को गर्मी का सीधा सामना करना पड़ रहा है। फोटो: विकास चौधरी
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25 मई 2026 को दिल्ली में पिछले 14 वर्षों की सबसे गर्म रात रिकॉर्ड की गई। हर गर्मी में दिन के समय भीषण गर्मी की मार झेलने वाली राजधानी में अब रातों को भी राहत नहीं मिल रही है।सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा आज जारी की गई एक नई रिपोर्ट में यह बात कही गई है।

सीएसई में सस्टेनेबल हैबिटेट कार्यक्रम की प्रबंधक और रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका मिताशी सिंह के अनुसार, “भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की परिभाषा में ‘वार्म नाइट्स’ यानी गर्म रातें उन रातों को कहा जाता है, जब अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहे और न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री से 6.4 डिग्री सेल्सियस अधिक हो। 25 मई को दिल्ली का न्यूनतम (रात्रिकालीन) तापमान 32.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिससे यह पिछले 14 वर्षों की सबसे गर्म रात बन गई। यह स्थिति तब रही जब पूरे महीने दिन का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना हुआ था।”

सीएसई की रिपोर्ट "मेकिंग दिल्ली हीट रेजिलिएंट" दिल्ली के उन कमजोर वर्गों पर केंद्रित है, जो गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इनमें निर्माण श्रमिक, गिग वर्कर, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, बेघर लोग, अनाधिकृत बस्तियों में रहने वाले लोग, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं।

सीएसई के सस्टेनेबल हेबिटेट कार्यक्रम के निदेशक रजनीश सरीन कहते हैं, “अनुमान है कि ये कमजोर समुदाय दिल्ली की कुल आबादी का कम-से-कम 50 प्रतिशत हैं। बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए उनके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं, इसलिए वे अपेक्षाकृत संपन्न लोगों की तुलना में अधिक गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं। वे अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए पूरे दिन कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन जब रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिलती, तो उनकी स्थिति और कठिन हो जाती है। इसके अलावा, यदि गर्मी के कारण उनका काम प्रभावित होता है या वे बीमार पड़ जाते हैं, तो उन्हें मजदूरी का नुकसान भी उठाना पड़ता है।”

मई 2024 में सीएसई ने "दिल्ली: अर्बन हीट स्ट्रेस ट्रैकर" नामक एक अध्ययन जारी किया था। इस अध्ययन में अनुमान लगाया गया था कि 2014-23 के दशक के दौरान दिल्ली में दिन और रात के तापमान के बीच होने वाली प्राकृतिक ठंडक (डायर्नल कूलिंग) में 9 प्रतिशत की कमी आई है।

मिताशी सिंह कहती हैं, “इसका मतलब है कि यदि 2001-10 के दशक में दिन और रात के भूमि सतह तापमान (लैंड सरफेस टेम्परेचर) के बीच का अंतर लगभग 12 डिग्री सेल्सियस था, तो 2023 में यह अंतर घटकर 9.8 डिग्री सेल्सियस रह गया।”

सिंह आगे कहती हैं, “रात के समय अधिक तापमान मानव स्वास्थ्य पर और भी गंभीर असर डाल सकता है। दिन भर गर्मी के कारण शरीर में जो तापीय दबाव (हीट स्ट्रेस) जमा होता है, रात में तापमान कम न होने से शरीर उसे बाहर नहीं निकाल पाता। इससे हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है, नींद का चक्र प्रभावित हो सकता है और शरीर की कोशिकाओं तथा ऊतकों की मरम्मत की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। सरल शब्दों में कहें तो इससे शरीर को लंबे समय तक रहने वाला शारीरिक नुकसान हो सकता है।”

सरीन का कहना है, “हालांकि दिल्ली के हीट एक्शन प्लान में शहर के विभिन्न कमजोर वर्गों का उल्लेख किया गया है, लेकिन इन प्लान में गर्मी से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं दी गई है। यदि इस दिशा में कार्रवाई नहीं की गई, तो बढ़ते तापमान से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जाएगी। कमजोर वर्ग की सुरक्षा के लिए दिल्ली को वैज्ञानिक और व्यवस्थित उपायों की आवश्यकता है।”

सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार, बढ़ती गर्मी के कारण लोग तेजी से एयर कंडीशनर (एसी) का सहारा ले रहे हैं। मिताशी सिंह बताती हैं कि हाल ही में दिल्ली में बिजली की अधिकतम मांग 8,231 मेगावाट तक पहुंच गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, एसी के बढ़ते उपयोग से ऊर्जा व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है और शहरी ऊष्मा द्वीप (अर्बन हीट आइलैंड) प्रभाव भी और गंभीर हो जाता है। चल रहा एसी अपने आसपास के वातावरण में गर्म हवा छोड़ता है, जिससे बाहर रहने वाले और प्राकृतिक वातावरण के सहारे ठंडक पाने वाले लोगों के आसपास की हवा और गर्म हो जाती है।

रिपोर्ट कहती है, “असल में यह शीतलन असमानता (कूलिंग इनइक्विलिटी) को बढ़ावा देता है।” यानी जो लोग एसी का उपयोग कर सकते हैं, उन्हें तो राहत मिलती है, लेकिन जो लोग बाहर काम करते हैं या जिनके पास एसी की सुविधा नहीं है, उनके लिए गर्मी और बढ़ जाती है।

तापीय दबाव कम करना और कमजोर वर्ग की सुरक्षा

दिल्ली गर्मियों की रातों में अपनी ठंडक खोती क्यों जा रही है? इसके पीछे कई कारण हैं। शहर में तेजी से और सघन निर्माण हुआ है। हरित क्षेत्र और जलाशय लगातार कम हुए हैं। कई इमारतों में पर्याप्त छाया और तापरोधन की व्यवस्था नहीं है। भवनों का डिजाइन भी अक्सर हवा के बेहतर प्रवाह को ध्यान में रखकर नहीं बनाया जाता। इसके अलावा एसी और वाहनों से निकलने वाली गर्मी आसपास के वातावरण को और गर्म कर देती है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए सीएसई ने दोहरी रणनीति पर आधारित एक रोडमैप सुझाया है। इसमें पूरे वर्ष लागू किए जाने वाले कई उपाय शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक क्षेत्रों, कार्यालय परिसरों, बाजारों और अनौपचारिक बस्तियों में ऊष्मा-रोधी (शेडिंग) या ताप-कुशल छतों (इंसुलेशन) को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। गर्मी को अधिसूचित आपदा घोषित करने की भी सिफारिश की गई है।

अध्ययन में हीट डैशबोर्ड विकसित करने का सुझाव दिया गया है। नई इमारतों को जलवायु-अनुकूल डिजाइन के आधार पर बनाया जाना चाहिए। पुरानी इमारतों में भी आवश्यक बदलाव किए जाने चाहिए ताकि वे कम गर्म हों।

रिपोर्ट में सार्वजनिक शीतलन सुविधाओं के विकास पर भी जोर दिया गया है। साथ ही, गर्मी से निपटने के लिए मौजूदा सरकारी योजनाओं और जलवायु कोषों का बेहतर उपयोग करने की सिफारिश की गई है।

दूसरी रणनीति उन लोगों पर केंद्रित है जो गर्मी के सीधे संपर्क में रहते हैं। इनमें निर्माण श्रमिक, रेहड़ी-पटरी विक्रेता, डिलीवरी कर्मी और अन्य बाहरी कामगार शामिल हैं।

इसके तहत काम के दौरान अनिवार्य शीतलन अवकाश (कूलिंग ब्रेक) सुनिश्चित करने, काम के समय में बदलाव करने, मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) तैयार करने तथा भीषण गर्मी की आपात स्थितियों में विशेष वित्तीय, चिकित्सीय और अन्य सहायता उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया गया है।

रजनीश सरीन कहते हैं, “गर्मी से बढ़ती संवेदनशीलता से निपटने के लिए अब सक्रिय ताप प्रबंधन (हीट मैनेजमेंट) की जरूरत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे कभी-कभार होने वाली घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक कठोर वास्तविकता है, जो आगे भी बनी रहेगी और संभव है कि और गंभीर हो जाए। जलवायु जोखिमों के इस दौर में शहरों को रहने योग्य बनाए रखने के लिए इस चुनौती का प्रभावी ढंग से सामना करना अब बेहद जरूरी हो गया है।”

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