

जलवायु परिवर्तन के असर से हिमाचल के गांवों में खेती, जल संरक्षण और आपदा प्रबंधन के तरीकों में बदलाव शुरू।
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में हिमाचल की 12 पंचायतों में जलवायु परिवर्तन से निपटने के 25 स्थानीय उपाय सामने आए।
हिमाचल में अब आपदा के बाद राहत के बजाय पहले से तैयारी और जोखिम कम करने पर जोर दिया जा रहा है।
सिरमौर के थाना कशोगा में महिलाओं ने पांच पुरानी बावड़ियों को फिर से बहाल किया।
शोगी गांव में आपदा प्रबंधन समिति बनाकर ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार और सुरक्षित निकासी का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। कभी भारी बारिश, कभी बादल फटना तो कभी अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन ने लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान ने गांवों को एक बड़ा सबक दिया है। अब लोग केवल आपदा आने के बाद राहत का इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि उससे पहले ही बचाव और बदलाव की तैयारी में जुट गए हैं।
किसानों ने फसलें बदलनी शुरू कर दी हैं। महिलाएं पुराने जलस्रोतों को बचाने के लिए आगे आई हैं और पंचायतें आपदा से निपटने की तैयारी कर रही हैं। मंडी, कुल्लू, सिरमौर और शिमला जिलों की 12 ग्राम पंचायतों में चल रहे ऐसे प्रयासों का जिक्र काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के एक नए अध्ययन में किया गया है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के सहयोग से तैयार इस अध्ययन में जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पांच क्षेत्रों में 25 समाधान सुझाए गए हैं।
सेब और अनार छोड़ नई फसलों की ओर किसान
जलवायु परिवर्तन का असर पहाड़ी खेती और बागवानी पर साफ दिखाई देने लगा है। मौसम में बदलाव, कम बर्फबारी और फसलों में बीमारियों के बढ़ते खतरे ने किसानों को अपनी खेती का तरीका बदलने के लिए मजबूर किया है।
अध्ययन में कहा गया है कि कुल्लू के बजौरा में किसान पहले सेब की खेती से अनार की ओर बढ़े थे, लेकिन अब अनार की फसल में वायरस का प्रकोप बढ़ने के कारण वे पर्सिमन (जापानी फल) की खेती अपना रहे हैं। वहीं, शिमला के संधू गांव में प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ रहा है। यहां 20 से अधिक परिवार प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं। ग्रामीणों के मुताबिक, इससे उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ है और फसलें मौसम की मार के प्रति अधिक टिकाऊ साबित हुई हैं।
अध्ययन के मुताबिक, सिरमौर के पराड़ा गांव में भी किसान खेती के नए तरीके अपना रहे हैं। यहां लहसुन के साथ सेब की खास किस्मों की खेती की जा रही है। खेती में विविधता लाने का मकसद मौसम की अनिश्चितता के बीच किसानों की आमदनी को सुरक्षित रखना है।
महिलाओं ने फिर जिंदा कीं सूखती बावड़ियां
पहाड़ों में पानी की कमी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कभी गांवों की प्यास बुझाने वाले प्राकृतिक जलस्रोत अब धीरे-धीरे सूख रहे हैं। ऐसे में सिरमौर के थाना कशोगा गांव की महिलाओं ने पुरानी बावड़ियों को बचाने का बीड़ा उठाया है।
अध्ययन के अनुसार, गांव में कभी 35 बारहमासी बावड़ियां थीं, लेकिन अब केवल 10 ही बची हैं। पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट और सेंटर फॉर बिजनेस एंड एंटरप्रेन्योरियल डेवलपमेंट से प्रशिक्षण मिलने के बाद महिलाओं के समूह इनकी देखभाल में जुट गए हैं। महिलाएं हर महीने बावड़ियों की सफाई करती हैं। इस पहल से अब तक पांच जलस्रोतों को फिर से बहाल किया जा चुका है, जबकि पांच से छह अन्य पर काम चल रहा है।
आपदा आने से पहले तैयारी
अध्ययन में कहा गया है कि शिमला के पास स्थित शोगी गांव ने वर्ष 2023 में आई बाढ़ और भूस्खलन के बाद आपदा प्रबंधन की दिशा में कदम उठाया। यहां एनजीओ एडीआरए इंडिया की मदद से गांव आपदा प्रबंधन समिति बनाई गई। समिति के माध्यम से ग्रामीणों को प्राथमिक उपचार, सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने और आपात स्थिति में एक-दूसरे की मदद करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
हालांकि प्रदेश के अभी बहुत कम गांवों में ऐसी समितियां बनी हैं। ऐसे में इस पहल को दूसरी पंचायतों तक पहुंचाने की जरूरत है, ताकि आपदा के समय ग्रामीण खुद भी राहत और बचाव कार्यों में भूमिका निभा सकें।
25 उपायों से मजबूत होगी गांवों की तैयारी
सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में खेती, जल प्रबंधन, सामुदायिक आपदा प्रबंधन, बुनियादी ढांचे और विकास नियोजन से जुड़े 25 उपायों की पहचान की गई है। अध्ययन में कहा गया है कि किसी भी पहल को सफल बनाने के लिए स्थानीय लोगों की भागीदारी बेहद जरूरी है। जब किसी किसान, महिला समूह या गांव की समिति को कृषि विज्ञान केंद्र, स्वयंसेवी संस्था या सरकारी योजना का सहयोग मिलता है, तो उसके परिणाम बेहतर होते हैं।
राहत से आगे बढ़कर बचाव पर जोर
अध्ययन के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2020 से 2025 के बीच प्राकृतिक आपदाओं से 21,097 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और दो हजार से अधिक लोगों की जान गई। राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अब जीआईएस, त्वरित घटना रिपोर्टिंग प्रणाली और नई तकनीकों की मदद से जोखिम का पहले पता लगाने पर जोर दे रहा है। वर्ष 2026 में आपदा रक्षक योजना भी शुरू की गई है।
अध्ययन में अधिकारियों का मानना है कि अब हर ग्राम पंचायत की अपनी आपदा प्रबंधन योजना होनी चाहिए, ताकि गांव के जोखिम को समझकर समय रहते तैयारी की जा सके।
हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है और इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसे में हिमाचल के गांवों की ये छोटी-छोटी पहलें एक बड़ा संदेश देती हैं। किसानों के खेतों से लेकर महिलाओं की बावड़ियों और गांव की आपदा समितियों तक, हर जगह बदलाव की कोशिश जारी है। साफ है कि पहाड़ के लोग अब मौसम की मार झेलने के बजाय उसके साथ जीने और उससे निपटने के नए रास्ते तलाश रहे हैं।