दूध गंगा नदी का उद्गम तत्ताकोटी पर्वत चोटी के पास पीर पंजाल के ग्लेशियरों से होता है। यह स्थान समुद्र तल से लगभग 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

फोटो: लेखक द्वारा उपलब्ध कराई गई।
दूध गंगा नदी का उद्गम तत्ताकोटी पर्वत चोटी के पास पीर पंजाल के ग्लेशियरों से होता है। यह स्थान समुद्र तल से लगभग 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। फोटो: लेखक द्वारा उपलब्ध कराई गई।

कश्मीर: जलवायु परिवर्तन से संकट में दूध गंगा, श्रीनगर पर कैसे बढ़ रहा है दबाव

जलवायु परिवर्तन से कश्मीर के पीर पंजाल में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और पानी की किल्लत से महिलाओं पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है
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महक (बदला हुआ नाम), 28 वर्ष, श्रीनगर के बाग-ए-मेहताब की निवासी हैं। उनके लिए नियमित जलापूर्ति का अभाव एक बुनियादी जरूरत को रोजमर्रा के संघर्ष में बदल चुका है।

महक ने बताया, “हर सुबह मैं इस उम्मीद में उठती हूं कि आज नियमित रूप से पानी आएगा, लेकिन इसकी कोई निश्चितता नहीं होती। पिछले कुछ वर्षों से हमें नहाने, कपड़े धोने और अन्य बुनियादी जरूरतों के लिए पर्याप्त पानी जुटाने में परेशानी हो रही है। हमने घर में पानी की तीन टंकियां लगवाई हैं, लेकिन उनका खर्च उठाना भी अब मुश्किल होता जा रहा है। पानी की आपूर्ति का कोई निश्चित समय नहीं है और कभी-कभी जो पानी मिलता है, वह साफ भी नहीं होता।”

महक ने कहा, “पानी को लेकर बनी रहने वाली इस अनिश्चितता ने मेरी मां को भावनात्मक रूप से भी प्रभावित किया है। वह तनाव में रहने लगी हैं और उनका मिजाज बदल जाता है, क्योंकि हर दिन की शुरुआत इसी चिंता से होती है कि पर्याप्त पानी मिलेगा या नहीं।”

श्रीनगर के पीर बाग की निवासी 60 वर्षीय जमरूद ने बताया, “गर्मियों के दौरान पानी की आपूर्ति बेहद अनियमित हो जाती है। पानी का बहाव कम रहता है और कभी-कभी लगातार चार दिनों तक नलों में पानी नहीं आता।”

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में स्थिति बेहद खराब हो गई है। गर्मियों में तापमान बढ़ने के साथ ही पानी की आपूर्ति लगभग ठप हो जाती है, जिससे रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी मुश्किल हो जाता है। यहां तक कि दो या तीन सदस्यों वाले परिवारों को भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता।

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दूध गंगा नदी का उद्गम तत्ताकोटी पर्वत चोटी के पास पीर पंजाल के ग्लेशियरों से होता है। यह स्थान समुद्र तल से लगभग 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

फोटो: लेखक द्वारा उपलब्ध कराई गई।

पानी की कमी से निपटने के लिए जमरूद ने बताया कि स्थानीय जलापूर्ति विभाग के कर्मचारियों और पड़ोसियों ने उनके परिवार को सलाह दी कि जब पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति बंद हो जाए, तो भूजल प्राप्त करने के लिए हैंडपंप लगवा लें। परिवार ने आपात स्थिति के लिए जमीन पर अतिरिक्त सिंटेक्स टंकियां भी लगवाईं, ताकि पानी जमा करके रखा जा सके।

उन्होंने कहा, “पानी जमा करने की अतिरिक्त व्यवस्था और हैंडपंप से हमें पानी की कमी के दौरान काफी मदद मिली है।”

पानी की टंकियों से परिवार जरूरत के समय के लिए पानी बचाकर रख सकता है, जबकि खराब मौसम के दौरान पाइपलाइन से आपूर्ति ठप होने पर हैंडपंप के जरिए भूजल प्राप्त किया जा सकता है।

पानी की किल्लत के बीच जीवन

श्रीनगर के ऊपरी हिस्से के बड़े इलाके के लिए दूध गंगा पेयजल का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। दूध गंगा को चाज़ कुल के नाम से भी जाना जाता है। यह झेलम नदी की एक सहायक नदी है। इसका उद्गम तत्ताकोटी पर्वत चोटी के पास पीर पंजाल के ग्लेशियरों से होता है। यहां इसकी ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 4,500 मीटर है। नदी के शुरुआती हिस्से में ग्लेशियरों, झरनों और बर्फ से पोषित झीलों का पानी आता है। यह नदी श्रीनगर पहुंचने से पहले बडगाम और पुलवामा की घाटियों से होकर लगभग 45 किलोमीटर का सफर तय करती है।

जलवायु परिवर्तन दूध गंगा पर दबाव बढ़ा रहा है।

जेएंडके आरटीआई मूवमेंट के संस्थापक और जेएंडके क्लाइमेट एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष राजा मुफ्तार भट ने कहा, “लेकिन बढ़ते तापमान, वर्षा के बदलते पैटर्न और बर्फ पिघलने की घटती मात्रा से नदी में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। वहीं, अत्यधिक तीव्र बारिश और बादल फटने की घटनाओं से बाढ़ तथा जल प्रदूषण का खतरा बढ़ सकता है।”

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ हाइड्रोलॉजी साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित वर्ष 2024 के एक अध्ययन, इंवेंटरी एंड स्टेटस ऑफ ग्लेशियर्स इन दी पीर पंजाल रेंज कश्मीर बेसिन बिटवीन 1980 एंड 2020 (कश्मीर बेसिन की पीर पंजाल पर्वतमाला में 1980 से 2020 के बीच ग्लेशियरों की स्थिति और उनकी सूची) में पीर पंजाल क्षेत्र के ग्लेशियरों के तेजी से घटने की बात सामने आई।

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दूध गंगा नदी का उद्गम तत्ताकोटी पर्वत चोटी के पास पीर पंजाल के ग्लेशियरों से होता है। यह स्थान समुद्र तल से लगभग 4,500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

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अध्ययन के मुताबिक, 1980 में 25.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 122 ग्लेशियरों का कुल क्षेत्रफल घटकर 2020 में केवल 15.9 वर्ग किलोमीटर रह गया। दक्षिण की ओर मुख वाले ग्लेशियर, उत्तर की ओर मुख वाले ग्लेशियरों की तुलना में तेजी से पिघल रहे हैं। इनमें 3,800 से 4,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियरों में सबसे अधिक सिकुड़न दर्ज की गई।

इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईयूएसटी) के कुलपति और पृथ्वी वैज्ञानिक शकील रोमशू ने कहा कि दूध गंगा पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के संकेत “बहुत स्पष्ट और तीव्र ” हैं।

उन्होंने बताया कि कश्मीर घाटी में दूध गंगा समेत 24 जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कश्मीर के सभी जलग्रहण क्षेत्रों में व्यापक रूप से एक जैसा है, चाहे वे मध्य कश्मीर, बडगाम, अनंतनाग या बारामूला में हों।

उन्होंने कहा, “हम अत्यधिक तीव्रता वाली बारिश और कभी-कभी अचानक आने वाली बाढ़ का अनुभव कर रहे हैं। सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है।”

रोमशू के मुताबिक, चार-पांच दशक पहले दूध गंगा के ऊपरी इलाकों में कहीं अधिक बर्फबारी होती थी, लेकिन अब इसमें गिरावट आई है।

उन्होंने कहा, “सर्दियों का तापमान भी बढ़ रहा है, खासकर फरवरी और मार्च में। जब बर्फबारी होती भी है, तो बर्फ तेजी से पिघलने लगती है।”

जल चक्र में बदलाव

बर्फबारी और तापमान के बदलते पैटर्न का असर पहले से ही कश्मीर में पानी की उपलब्धता पर पड़ रहा है।

रोमशू ने कहा, “पहले सर्दियों में गिरने वाली बर्फ कई महीनों तक जमी रहती थी और अप्रैल से जुलाई के बीच धीरे-धीरे पिघलती थी। इससे गर्मियों के दौरान पानी उपलब्ध होता था। लेकिन बर्फबारी में कमी और सर्दियों में तापमान बढ़ने के कारण अब बर्फ बहुत पहले पिघलने लगी है। अक्सर यह फरवरी और मार्च में ही पिघल जाती है।”

नदी के जलग्रहण क्षेत्र में अवैध निर्माण ने भी दबाव बढ़ा दिया है। श्रीनगर में नदी के प्राकृतिक प्रवाह को दो धाराओं में बांट दिया गया था। इनमें से एक धारा एक आर्द्रभूमि (वेटलैंड) में जाती थी, जबकि दूसरी अलोची बाग और बटमालू से होकर बहती हुई झेलम नदी में मिलती थी।

पिछले तीन दशकों के दौरान बटमालू वाली धारा को धीरे-धीरे कंक्रीट के ढांचों, पार्कों और बस स्टॉप के नीचे दबा दिया गया। सितंबर 2014 की बाढ़ के दौरान बाढ़ का पानी इसी निचले प्राकृतिक रास्ते से बहा और बटमालू से क़मरवारी तक के इलाके में भर गया।

कश्मीर के जल शक्ति विभाग (जल संसाधन), लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (पीएचई) की अधीक्षण अभियंता अनब्रीना अंजुम ने कहा, “दूध गंगा में पानी का प्रवाह कम होने से जलापूर्ति पहले ही प्रभावित हो चुकी है, खासकर शुष्क अवधि के दौरान।”

उन्होंने कहा, “वर्ष 2024 में दूध गंगा में कच्चे पानी की भारी कमी का सामना करना पड़ा, क्योंकि उस वर्ष कश्मीर में कुल वर्षा सामान्य से लगभग 80 प्रतिशत कम रही। उस साल दूध गंगा में पानी का बहाव काफी कम था, जिसके कारण जलापूर्ति में बाधाएं आईं।”

अनब्रीना अंजुम ने बताया, “दूध गंगा जल शोधन संयंत्र की क्षमता 45.5 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) है। यह श्रीनगर के ऊपरी हिस्से में रहने वाले 2 लाख से अधिक लोगों को पेयजल की आपूर्ति करता है। इनमें बाग-ए-मेहताब, क्रालपोरा, पीर बाग, हैदरपोरा, सनत नगर, बागत, बारजुल्ला, रामबाग और हरि सिंह हाई स्ट्रीट तक के इलाके शामिल हैं।”

उन्होंने कहा, “जब पानी की उपलब्धता कम हो जाती है और जल स्रोतों में प्राकृतिक प्रवाह घट जाता है, तब नौहर से संयंत्र तक पहुंचने वाले कच्चे पानी की कमी पूरी करने के लिए हमें क्रालपोरा स्थित लिफ्ट स्टेशन पर निर्भर रहना पड़ता है। भारी बारिश और बादल फटने की घटनाएं भी जलापूर्ति बाधित कर सकती हैं, क्योंकि इससे पानी में गाद और मिट्टी की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में फिल्टर प्रणाली को नुकसान से बचाने या उसके जाम होने का खतरा टालने के लिए हमें संयंत्र को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ता है। इसलिए लंबे समय तक सूखा रहने और अत्यधिक बारिश, दोनों ही दूध गंगा से होने वाली जलापूर्ति की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं।”

अंजुम ने बताया, “जब ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में नौहर की जलापूर्ति लाइन सूख जाती है और कम पानी वाले मौसम में प्रवाह घट जाता है, तब हमें क्रालपोरा स्थित पंपिंग स्टेशन पर निर्भर होना पड़ता है।”

उन्होंने बताया कि जलापूर्ति बनाए रखने के लिए विभाग उपलब्ध पानी के प्रवाह को पंपिंग स्टेशन की ओर मोड़ने की अस्थायी व्यवस्था करता है।

अंजुम ने आगे कहा कि जलवायु परिवर्तन इस चुनौती को और गंभीर बना सकता है। उन्होंने कहा, “हम हर बार पानी के वैकल्पिक स्रोत नहीं तलाश सकते, खासकर तब, जब जलवायु परिवर्तन के कारण पानी का संकट बढ़ रहा है।”

उन्होंने बताया कि अनियमित बारिश, बादल फटने की चरम घटनाएं और लंबे समय तक शुष्क मौसम बने रहने से बाढ़ और पानी की कमी, दोनों की समस्या पैदा हो सकती है। विभाग अगले 30 से 40 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर जलापूर्ति और जल संरक्षण के उपायों की योजना बना रहा है। इनमें जलग्रहण क्षेत्रों में सुधार और पानी के पुनः उपयोग को बढ़ावा देना भी शामिल है।

इस लेख के लेखक एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज हब के मेंटी (प्रशिक्षु) हैं। इस हब को जर्मनी की इंटरलिंक अकादमी से वित्तीय सहायता मिलती है।

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