क्या जलवायु परिवर्तन से दुनिया में पैर पसार रहा है 'ब्रेन ईटिंग अमीबा'? अध्ययन ने खोला राज

वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि बढ़ती गर्मी और बदलते पर्यावरण ने दुनिया में जानलेवा 'ब्रेन ईटिंग अमीबा' के प्रसार को बढ़ा दिया है, जिससे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है
'ब्रेन ईटिंग अमीबा'; फोटो: आईस्टॉक
'ब्रेन ईटिंग अमीबा'; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • जलवायु परिवर्तन के कारण 'ब्रेन ईटिंग अमीबा' का खतरा बढ़ रहा है। यह अमीबा गर्मी के साथ नए क्षेत्रों में फैल रहा है, जहां पहले इसका नाम भी नहीं सुना गया था।

  • अध्ययन में चेताया गया है कि कमजोर जल-आपूर्ति और निगरानी व्यवस्था इस खतरनाक सूक्ष्मजीव को तेजी से फैलने का मौका दे रही है।

  • ये अमीबा अपनी असाधारण सहनशक्ति के बल पर ऐसे हालात में भी जिंदा रह सकते हैं, जहां दूसरे कीटाणु मर जाते हैं। इसका बड़ा कारण है कि ये जीव भीषण गर्मी, क्लोरीन जैसे कीटाणुनाशक और यहां तक की सुरक्षित माने जाने वाली पानी की पाइपों में भी जिन्दा रह सकते हैं।

  • अप्रैल 2025 में प्रकाशित एक वैश्विक समीक्षा के अनुसार, 1962 से अब तक दुनिया भर में 'नेग्लेरिया फाउलेरी' से होने वाली बीमारी के कम से कम 488 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

  • अध्ययन में शोधकर्ताओं ने एक और खतरनाक पहलू की ओर ध्यान दिलाया है। वह यह है कि अमीबा कई बार अपने भीतर बैक्टीरिया और वायरस को छिपाकर रख सकते हैं। इससे ये रोगजनक कीटाणुनाशकों से बच जाते हैं और पीने के पानी की प्रणालियों में लंबे समय तक टिके रहते हैं।

जलवायु परिवर्तन केवल मौसम में बदलाव की वजह नहीं बन रहा, बल्कि यह नए रोगों के लिए भी रास्ते खोल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी के साथ ‘ब्रेन ईटिंग अमीबा' उन इलाकों तक पहुंचने लगा है, जहां पहले इसका नाम भी नहीं सुना गया था।

जल, मिट्टी और नमी भरे वातावरण में पाए जाने वाले ‘फ्री-लिविंग अमीबा’, जिन्हें आम भाषा में ‘दिमाग खाने वाले अमीबा’ कहा जाता है, अब दुनिया भर में स्वास्थ्य के लिए एक उभरता खतरा बनते जा रहे हैं। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन, पुराना होता जल-आपूर्ति ढांचा और कमजोर निगरानी व्यवस्था इन खतरनाक सूक्ष्मजीवों को तेजी से फैलने का मौका दे रही है।

जर्नल बायोकंटैमिनेंट में प्रकाशित अध्ययन में सामने आया है कि ये अमीबा अपनी असाधारण सहनशक्ति के बल पर ऐसे हालात में भी जिंदा रह सकते हैं, जहां दूसरे कीटाणु मर जाते हैं। इसका बड़ा कारण है कि ये जीव भीषण गर्मी, क्लोरीन जैसे कीटाणुनाशक और यहां तक की सुरक्षित माने जाने वाली पानी की पाइपों में भी जिन्दा रह सकते हैं।

अमीबा मिट्टी और पानी में पाए जाने वाले एकल कोशिकीय जीव होते हैं। बता दें कि जहां इंसानों के शरीर में 30 से 40 लाख करोड़ कोशिकाएं होती हैं, वहीं, अबीमा में महज एक कोशिका होती है। इसी के सहारे यह जीव अपना खाना ढूंढ़ता, खाता और पचाता है, फिर इसे अपशिष्ट के रूप में शरीर से बाहर निकाल देता है।

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'ब्रेन ईटिंग अमीबा'; फोटो: आईस्टॉक

‘ट्रोजन हॉर्स’ बनते अमीबा

हालांकि अधिकांश अमीबा नुकसानदायक नहीं होते, लेकिन कुछ प्रजातियां गंभीर और जानलेवा संक्रमण फैला सकती हैं। इनमें सबसे खतरनाक ‘नेग्लेरिया फाउलेरी' है, जिसे ‘दिमाग खाने वाला अमीबा’ भी कहा जाता है। यह तब शरीर में प्रवेश करता है जब संक्रमित पानी नाक के जरिए अंदर जाता है, जैसे स्विमिंग या तालाब में नहाते समय।

यह अमीबा मस्तिष्क में घातक संक्रमण पैदा कर देता है, जो अक्सर जानलेवा साबित होता है। इसे ब्रेन ईटिंग अमीबा इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह दिमाग में संक्रमण कर, दिमाग के ऊतकों को नष्ट कर सकता है। केरल में हाल के वर्षों में यह अमीबा कई जिंदगियों को निगल चुका है।

अप्रैल 2025 में प्रकाशित एक वैश्विक समीक्षा के अनुसार, 1962 से अब तक दुनिया भर में 'नेग्लेरिया फाउलेरी' से होने वाली बीमारी के कम से कम 488 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने एक और खतरनाक पहलू की ओर ध्यान दिलाया है। वह यह है कि अमीबा कई बार अपने भीतर बैक्टीरिया और वायरस को छिपाकर रख सकते हैं।

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इससे ये रोगजनक कीटाणुनाशकों से बच जाते हैं और पीने के पानी की प्रणालियों में लंबे समय तक टिके रहते हैं। वैज्ञानिक इसे 'ट्रोजन हॉर्स' प्रभाव कहते हैं, जो एंटीबायोटिक प्रतिरोध फैलाने में भी भूमिका निभा सकता है।

गर्म होती धरती, फैलता खतरा

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इस संकट को और गंभीर बना सकता है। जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है, वैसे-वैसे गर्म पानी पसंद करने वाले अमीबा उन इलाकों में भी फैल सकते हैं, जहां पहले वे दुर्लभ थे।

हाल के वर्षों में कई देशों में मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाले जलाशयों में इससे जुड़े संक्रमण के मामले सामने आए हैं, जिसने लोगों की चिंताएं बढ़ा दी है। इसके चलते, इंसानों में होने वाली बीमारी को 'प्राइमरी अमीबिक मेनिंगोएन्सेफलाइटिस  (पीएएम)' कहा जाता है। यह स्थिति बेहद दुर्लभ लेकिन जानलेवा होती है।

ऐसे में वैज्ञानिकों ने इसने निपटने के लिए ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण अपनाने की पर जोर दिया है, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण विज्ञान और जल प्रबंधन को एक साथ जोड़ा जाए। अध्ययन में मजबूत निगरानी, बेहतर जांच तकनीक और आधुनिक जल शोधन प्रणालियां अपनाने पर जोर दिया गया है, ताकि संक्रमण फैलने से पहले ही खतरे को रोका जा सके।

ऐसे में वैज्ञानिकों ने इसने निपटने के लिए ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण अपनाने की पर जोर दिया है, जिसमें मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण विज्ञान और जल प्रबंधन को एक साथ जोड़ा जाए। अध्ययन में मजबूत निगरानी, बेहतर जांच तकनीक और आधुनिक जल शोधन प्रणालियां अपनाने पर जोर दिया गया है, ताकि संक्रमण फैलने से पहले ही खतरे को रोका जा सके।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अमीबा केवल चिकित्सा या पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं हैं। ये दोनों के बीच की कड़ी हैं। इन्हें रोकने के लिए ऐसे समाधान चाहिए जो सीधे जनस्वास्थ्य की जड़ों की रक्षा करें।

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