

भारतीय हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में आग और बर्फ की एक अनोखी दास्तान सामने आ रही है। पश्चिमी से लेकर पूर्वी हिमालय तक, पूरी पर्वत श्रृंखला में अब आग उन ऊंचाइयों तक पहुंच रही है जिन्हें पहले सुरक्षित माना जाता था और साथ ही इनकी आवृत्ति और तीव्रता भी बढ़ रही है।
डाउन टू अर्थ द्वारा उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले एक दशक में पश्चिमी हिमालय के उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में जंगल की आग चार गुना बढ़ गई है। डाउन टू अर्थ ने सक्रिय फायर सीजन (जो आमतौर पर 1 नवंबर से 1 जून तक चलता है) के दौरान जंगली आग के रुझानों की जांच की। 2013-14 में, उपग्रह निगरानी ने 2,500 मीटर और उससे अधिक की ऊंचाई पर जंगली आग की 514 घटनाएं दर्ज की थीं। 2025-26 के फायर सीजन तक, यह संख्या बढ़कर 1,988 हो गई।
कुछ इसी तरह की गतिविधि हिमालय की श्रृंखला के एक बड़े हिस्से में दिखाई देती, जहां अध्ययनों ने 2001 के बाद से आग की गतिविधियों में एक उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है, जब उपग्रह-आधारित निरंतर अग्नि अवलोकन की सुविधा उपलब्ध हुई थी। पालमपुर स्थित हिमालयन जैवसंसाधन प्रौद्योगिकी संस्थान के शोधकर्ताओं द्वारा नैचुरल हैजर्ड्स में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि अधिक ऊंचाई पर जंगल की आग में महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है।
ऐतिहासिक रूप से, हिमालय के जंगलों में लगने वाली अधिकांश आग 2,000 मीटर से नीचे के क्षेत्रों में लगती थी, जहां सतह के पास का तापमान तुलनात्मक रूप से अधिक होता है और मानवीय गतिविधियां अधिक प्रचलित हैं। यह जानकारी हिमालय के जंगलों की आग का अध्ययन करने वाले कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, इरविन में पोस्टडॉक्टरल फेलो सोमनाथ बार ने दी है। लेकिन अब यह तरीका बदल रहा है। बार कहते हैं, “हमारे उपग्रह-आधारित अवलोकनों ने पूरे हिमालय में 2,000 से 4,000 मीटर की सीमा वाले उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आग की घटनाओं का पता लगाया है।”
आइजोल स्थित मिजोरम विश्वविद्यालय में भूगोल के वरिष्ठ प्रोफेसर विश्वंभर प्रसाद सती इस बात से सहमत हैं कि आग अब केवल निचले ढलानों तक सीमित नहीं रही है। मध्य और पूर्वी हिमालय में, पारंपरिक रूप से 2,800-3,000 मीटर से ऊपर आग दुर्लभ रही है। इसके बजाय, आग आमतौर पर कम ऊंचाई वाले जंगलों (1,000 मीटर से नीचे और 1,000 से 2,600 मीटर के बीच), विशेष रूप से साल और चीड़ के जंगलों में लगती थी। लेकिन सती कहते हैं कि अब जंगली आग की घटनाएं लगभग 3,000 मीटर की ऊंचाई तक देखी जा सकती हैं। अत्यधिक ऊंचाई वाली आग तुलनात्मक रूप से तीव्र होती है। बार के अनुसार, ये अक्सर “विशाल या उच्च-ऊर्जा वाली घटनाएं” होती हैं, जिन्हें संभवतः उन क्षेत्रों में सूखे बायोमास (जैविक कचरे) के रूप में ईंधन मिलता है जहां आग पर काबू पाने और प्रबंधन की व्यवस्था सीमित है। पूर्वी हिमालय की हालिया घटनाएं इस बदलाव को स्पष्ट करती हैं।
अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में जनवरी और फरवरी में जंगल की आग तेजी से बढ़ी। डाउन टू अर्थ के विश्लेषण से पता चलता है कि केवल 13 से 19 फरवरी के सप्ताह के दौरान, अरुणाचल प्रदेश में एक साल पहले की इसी अवधि की तुलना में लगभग 200 गुना अधिक जंगली आग की घटनाएं दर्ज की गईं। कुछ आग की घटनाएं असामान्य रूप से अधिक ऊंचाई पर हुईं, जिसके कारण भारतीय वायु सेना को लगभग 2,900 मीटर की ऊंचाई पर अग्निशमन अभियान चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। आग की बढ़ती संख्या जले हुए क्षेत्र के विस्तार में भी दिखाई देती है। जीआई-साइंस एंड रिमोट सेंसिंग में 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, 2001 और 2019 के बीच पश्चिमी हिमालय में कुल जला हुआ क्षेत्र 73 वर्ग किमी बढ़ गया। बार का अनुमान है कि पूर्वी हिमालय में आग लगने का पैमाना इससे भी बड़ा है। 2001 और 2020 के बीच इस क्षेत्र में सालाना औसतन 3,100 वर्ग किमी से अधिक जला हुआ क्षेत्र दर्ज किया गया।
जंगल की आग के मुख्य जलवायु कारकों में से एक “अल नीनो” है, जो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में “अल नीनो सदर्न ऑसिलेशन” का गर्म चरण है। अल नीनो की घटनाएं आमतौर पर भारत के अधिकांश हिस्सों में अधिक गर्मी और शुष्क स्थिति पैदा करती हैं, जो जंगल की आग लगने और फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाती हैं। बार ने बताया, “2004, 2006, 2009, 2010, 2012, 2014 और 2016 जैसे अत्यधिक आग वाले वर्ष अल नीनो वर्षों के अनुरूप रहे हैं, जो क्षेत्रीय अग्नि गतिविधि को तेज करने में बड़े पैमाने पर जलवायु दोलनों (ऑसिलेशन )की भूमिका को रेखांकित करते हैं।” लेकिन उच्च ऊंचाई वाली आग में वृद्धि पूरे हिमालय में एक व्यापक जलवायु परिवर्तन को भी दर्शाती है। यह क्षेत्र भारत के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे वनस्पतियों के स्वरूप बदल रहे हैं और जंगलों की सतह सूख रही है। पश्चिमी हिमालय के कई उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में, हाल के वर्षों में सर्दियों के दौरान बर्फबारी में कमी आई है, जिससे जंगल तेजी से ज्वलनशील होते जा रहे हैं। सर्दियों की वर्षा में यह गिरावट आंशिक रूप से पश्चिमी विक्षोभ में आए बदलावों से जुड़ी है।
ये अतिरिक्त उष्णकटिबंधीय तूफान हैं जो भूमध्य सागर के पास उत्पन्न होते हैं और पश्चिमी हिमालय में सर्दियों की अधिकांश वर्षा इनके कारण ही होती है। हाल के वर्षों में इनकी सक्रियता तेजी से वसंत और गर्मियों के महीनों की ओर खिसक गई है। अब ऐसे तूफान आने पर भी बहुत कम बर्फबारी होती है। उदाहरण के तौर पर, 2025-26 के शीत सत्र के दौरान केवल कुछ ही पश्चिमी विक्षोभों के कारण बर्फबारी हुई।
वर्षा के स्वरूप में बदलाव इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। सती कहते हैं, “जलवायु परिवर्तन के कारण, वर्षा लगातार जून और सितंबर के बीच मॉनसून के महीनों में केंद्रित होती जा रही है, जबकि साल का शेष समय शुष्क होता जा रहा है। यदि मॉनसून देरी से आता है, तो फायर सीजन के दौरान जंगल सूखे रहते हैं। तब पेड़ अधिक पत्तियां गिराते हैं, जिससे जमीन पर बायोमास बढ़ जाता है जो ईंधन का काम करता है।” फायर सीजन की अवधि भी बढ़ रही है, जो अब मार्च-मई से जून के मध्य तक खिंच गई है, क्योंकि दक्षिण-पश्चिमी मॉनसून के आगमन में लगातार देरी हो रही है।
हालांकि बार का मानना है कि मार्च से मई तक मॉनसून-पूर्व महीनों के दौरान वर्षा की कमी की तुलना में तापमान का अग्नि गतिविधि पर अधिक प्रभाव पड़ता है।
बार और सती दोनों का दावा है कि बार-बार लगने वाली आग वनों की संरचना को बदलकर मध्य और उच्च हिमालय की पारिस्थितिकी को नया रूप दे रही है। सती कहते हैं कि आग के प्रति संवेदनशील देशी प्रजातियां जैसे “रोडोडेंड्रोन” और “हिमालयन ओक” कम हो रही हैं और उनका स्थान आग को सहने वाले आक्रामक “पाइन” (चीड़) और “लैंटाना” जैसी झाड़ियों ने ले लिया है। वनों की संरचना घने क्षेत्रों से बदलकर अधिक खुले जंगलों में परिवर्तित हो रही है।
आग मिट्टी के पोषक तत्वों और नमी को भी खत्म कर देती है और अम्लता बढ़ा देती है, जिससे उर्वरता में गिरावट आती है और कटाव होता है। हिमालय की खड़ी ढलानों पर, वनस्पतियों का नुकसान मॉनसून के दौरान भूस्खलन का कारण बन सकता है, जो दीर्घकालिक पारिस्थितिक स्थिरता को प्रभावित करता है। बार कहते हैं, “2001 और 2020 के बीच हिमालय के लिए हमारी उत्सर्जन सूची से पता चलता है कि जंगल की आग हर साल औसतन 40.81 टेराग्राम कार्बन डाइऑक्साइड और 2.52 टेराग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड छोड़ती है, साथ ही मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, अमोनिया और सूक्ष्म कणों की भी पर्याप्त मात्रा निकलती है।”
वह आगे कहते हैं कि बायोमास जलने से निकलने वाला “ब्लैक कार्बन” भी आग के चरम सीजन के दौरान गंगोत्री और तपोवन जैसे हिमालयी ग्लेशियरों पर जमा हो रहा है। यह कार्बनिक पदार्थ सतह की परावर्तकता को कम करके, बर्फ के पिघलने की गति को तेज कर देता है। चूंकि हिमालय का दुर्गम क्षेत्र सक्रिय रूप से आग बुझाने के कार्य को कठिन बना देता है, इसलिए बार का कहना है कि उन्हें रोकना महत्वपूर्ण है। जमीनी अवलोकन से पता चलता है कि जंगलों की सतह पर सूखे चीड़ की सुइयां जमा होती हैं, जो आग को भड़काती है।
उपग्रह इमेजरी (चित्रण) फायर सीजन से पहले भारी ईंधन वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद कर सकती है, जिससे वन अधिकारियों को आग के फैलाव को सीमित करने के लिए “फ्यूल ब्रेक” बनाने, जमीनी वनस्पतियों को छांटने और जमा हुए कचरे को हटाने का समय मिल सकता है।