आधे घंटे की ओलावृष्टि, पूरे सीजन का नुकसान: जलवायु परिवर्तन ने बदला कश्मीर के सेब बागानों का भविष्य

बढ़ते तापमान और अनियमित मौसम ओलावृष्टि की घटनाओं को बढ़ा रहे हैं, जिससे फसलें अपने सबसे महत्वपूर्ण चरण में क्षतिग्रस्त हो रही हैं और बागवानों के लिए जोखिम गहराता जा रहा है
कश्मीर में अब कम समय की लेकिन बेहद तीव्र ओलावृष्टि की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जो सेब के बागानों को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। फोटो : इरफान अमीन मलिक
कश्मीर में अब कम समय की लेकिन बेहद तीव्र ओलावृष्टि की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जो सेब के बागानों को गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। फोटो : इरफान अमीन मलिक
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कश्मीर के श्रीनगर से लगभग 80 किलोमीटर दूर दामहल गांव में शकील अहमद राठर अपने सेब के बाग के बीच खड़े हैं। पिछले हफ्ते आई ओलावृष्टि के बाद जो कुछ बचा है, वही अब उनकी हकीकत है।

तूफान मुश्किल से आधे घंटे चला, लेकिन नुकसान तुरंत हो गया। पेड़ों पर लगे लाल रंग के नाजुक फूल, जो फल बनने के लिए बेहद जरूरी होते हैं जमीन पर बिखरे पड़े हैं।

उनके आठ कनाल के बाग का लगभग 80-85 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो चुका है।

40 वर्षीय राठर कहते हैं, “अब यह एक पैटर्न बन गया है।” वह बार-बार होने वाले नुकसान को बदलते मौसम से जोड़ते हैं।

यह असर सिर्फ एक फसल तक सीमित नहीं है। फूलों के नष्ट होने का मतलब है कम फल लगना, और बार-बार पड़ने वाला दबाव पेड़ों को कई मौसमों तक कमजोर कर देता है।

वे कहते हैं, “इसका असर हर चीज पर पड़ता है — बाजार पर, हमारे घर पर, यहां तक कि शादी-ब्याह और निर्माण तक पर।” जो यह दिखाता है कि कश्मीर में सेब की खेती रोजमर्रा की जिंदगी से कितनी गहराई से जुड़ी है।

सबसे अहम समय पर नुकसान

पिछले सप्ताह हुई ओलावृष्टि ने कश्मीर के शोपियां, कुलगाम और बांदीपोरा के कई सेब उत्पादक क्षेत्रों को प्रभावित किया। कुछ जगहों पर यह थोड़ी देर रही, तो कहीं ज्यादा समय तक, लेकिन इसकी तीव्रता इतनी थी कि बड़े इलाकों में फूल पूरी तरह झड़ गए।

किसानों के लिए समय सबसे बड़ी समस्या बना। राठर कहते हैं, “अब उबरने की संभावना बहुत कम है।” फूल आने का समय ही तय करता है कि कितने फल लगेंगे। इस चरण में किसी भी तरह की बाधा सीधे उत्पादन को कम कर देती है। छोटे-छोटे ओले भी फूलों को गिरा देते हैं या नवजात फलों को नुकसान पहुंचाते हैं।

यह नुकसान उसी मौसम में पूरा नहीं किया जा सकता।

बदलता मौसम, बढ़ता खतरा

पिछले सप्ताह की घटना कोई अकेली घटना नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार, कश्मीर में कुल वर्षा घट रही है, तापमान बढ़ रहा है और मौसम अधिक अनियमित होता जा रहा है।

2023 में कश्मीर विश्वविद्यालय और हैदराबाद के एक संस्थान के शोधकर्ताओं के अध्ययन के अनुसार, 2007 से 2022 के बीच घाटी में 200 से अधिक ओलावृष्टि की घटनाएं दर्ज की गईं।

2007 में जहां सिर्फ 2 घटनाएं थीं, वहीं 2022 में यह संख्या बढ़कर 27 हो गई। पिछले दस वर्षों में ही 80 से अधिक गंभीर ओलावृष्टि दर्ज की गई हैं।

अब ये घटनाएं पूरे साल में समान रूप से नहीं होतीं, बल्कि अप्रैल से जून के बीच केंद्रित हो रही हैं, जो सेब के फूल आने का सबसे महत्वपूर्ण समय है।

इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, कश्मीर के सहायक प्रोफेसर यासिर अल्ताफ कहते हैं: “हम सिर्फ बारिश की मात्रा में नहीं, बल्कि उसके पैटर्न में बदलाव देख रहे हैं। सतह का तापमान बढ़ने से हवा के तेज ऊर्ध्वाधर प्रवाह बन रहे हैं, जो ओले बनने के लिए जरूरी होते हैं।”

कश्मीर की भौगोलिक स्थिति इस प्रभाव को और बढ़ा देती है। जब गर्म हवा तेजी से ऊपर उठती है और ऊपरी ठंडे वातावरण से टकराती है, तो ओलावृष्टि की स्थिति बनती है।

बागवानों की बढ़ती असुरक्षा

कश्मीर में पारंपरिक खेती से हटकर उच्च मूल्य वाली बागवानी की ओर झुकाव हुआ है, जिससे सेब अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गया है, लेकिन इससे जोखिम भी बढ़ गया है। सेब जैसी फसलें जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं।

एक भी असमय ओलावृष्टि, पाला या बारिश पूरी फसल बर्बाद कर सकती है। कुलगाम के कट्रासू गांव के किसान मोहम्मद यूसुफ भट कहते हैं: “अब हर साल ओलावृष्टि होती है। हम दवाइयां डालते हैं, सब करते हैं, लेकिन इसके सामने कुछ नहीं कर सकते।”

बार-बार के नुकसान से किसानों की आय और भरोसा दोनों कमजोर हो रहे हैं। कई किसान कर्ज में डूबते जा रहे हैं। कश्मीर विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर मोहम्मद मुस्लिम कहते हैं, “तापमान बढ़ने से वायुमंडलीय अस्थिरता बढ़ती है, और पश्चिमी विक्षोभ अब कम लेकिन अधिक तीव्र घटनाएं ला रहे हैं।”

शोपियां के फल मंडी के अध्यक्ष मोहम्मद अशरफ वानी बताते हैं, “पहले नुकसान सीमित होता था, अब कुछ ही मिनटों में पूरा बाग खत्म हो जाता है।” वे यह भी कहते हैं कि अब ओलावृष्टि का समय भी अनिश्चित हो गया है और यह फल बनने के बाद भी हो रही है, जिससे जोखिम और बढ़ गया है।

एक सीजन नहीं, कई साल का नुकसान

अध्ययनों के अनुसार, ओलावृष्टि से 30% से 70% तक नुकसान हो सकता है, और कई मामलों में पूरी फसल नष्ट हो जाती है। लेकिन इसका असर सिर्फ एक साल तक सीमित नहीं रहता।

बार-बार ओलावृष्टि से पेड़ कमजोर होते हैं, बीमारियों का खतरा बढ़ता है और उत्पादन क्षमता घटती है। डॉ. अल्ताफ कहते हैं: “यह सिर्फ एक साल का नुकसान नहीं है — यह कई वर्षों तक बाग की सेहत को प्रभावित करता है।”

समाधान क्यों नहीं पहुंच पा रहे?

सबसे प्रभावी उपायों में से एक एंटी-हेल नेट (ओलारोधी जाल) है, लेकिन इसका उपयोग केवल लगभग 0.06% बागवान ही कर पा रहे हैं — मुख्यतः इसकी लागत अधिक होने के कारण।

फसल बीमा भी सीमित है। सरकार की पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना लागू तो है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव कमजोर है।

किसानों में भरोसे की कमी है। भट कहते हैं, “हम सिर्फ देख सकते हैं।” इसका मतलब है कि नुकसान सीधे आर्थिक संकट में बदल जाता है। एक ही फसल पर निर्भर परिवारों के लिए एक खराब मौसम शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों को प्रभावित कर देता है।

मिनटों में तबाही

सूखा या धीरे-धीरे बदलता मौसम समय देता है, लेकिन ओलावृष्टि कुछ ही मिनटों में सब खत्म कर देती है। किसान महीनों तक मेहनत करते हैं। छंटाई, दवाइयां, देखभाल और एक तूफान सब खत्म कर देता है। डॉ. अल्ताफ इसे “जोखिम और तैयारी के बीच बढ़ता अंतर” बताते हैं।

आगे क्या किया जा सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, तुरंत और दीर्घकालिक दोनों तरह के उपाय जरूरी हैं। इनमें अल्पकालिक उपाय के तौर पर एंटी-हेल नेट पर सब्सिडी, बेहतर मौसम पूर्व चेतावनी प्रणाली, कुछ घंटों पहले सूचना देकर नुकसान कम करना शामिल हैं।

डॉ. मुस्लिम कहते हैं, “थोड़ा सा समय भी फर्क ला सकता है।”

दीर्घकालिक उपाय के तौर पर मजबूत फसल बीमा व्यवस्था, जलवायु-लचीली बागवानी तकनीक, स्थानीय स्तर पर मौसम पूर्वानुमान प्रणाली अपनाई जानी चाहिए।

शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की प्रोफेसर समीरा कय्यूम कहती हैं, “तापमान वृद्धि, अनियमित पश्चिमी विक्षोभ और वायुमंडलीय अस्थिरता — ये सभी मिलकर ओलावृष्टि को बढ़ा रहे हैं। और जब ये फूल आने के समय होती है, तो नुकसान कई गुना बढ़ जाता है।”

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