

यूरोप एक बार फिर भीषण गर्मी की चपेट में है।
जुलाई 2026 में पूरे महाद्वीप में फैली हीटवेव ने वैज्ञानिकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की पुरानी चेतावनियों को फिर से प्रासंगिक बना दिया है। अत्यधिक गर्मी अब कोई असाधारण मौसमी घटना नहीं मानी जाती, बल्कि मानव स्वास्थ्य के सामने तेजी से उभरते सबसे बड़े खतरों में गिनी जा रही है। अस्पताल गर्मी से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामलों के लिए तैयारियां कर रहे हैं, सरकारें आपातकालीन परामर्श जारी कर रही हैं और जलवायु वैज्ञानिक हीटवेव को एक ऐसी "मूक आपदा" के रूप में देखने लगे हैं, जिसका असर दूरगामी होता है।
लेकिन इतिहास याद दिलाता है कि यह पहली बार नहीं है जब भीषण गर्मी ने मानव घटनाक्रम की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो।
आज से लगभग 169 वर्ष पहले, 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, एक दूसरी सेना भी ऐसे ही संघर्ष में फंस गई थी। उसका मुकाबला केवल विद्रोही सिपाहियों से नहीं था, बल्कि भारतीय ग्रीष्म ऋतु की निर्मम गर्मी से भी था। दिल्ली रिज की पथरीली ऊंचाइयों पर ब्रिटिश सैनिक ऐसे प्रतिद्वंद्वी से जूझ रहे थे जिसे न तो तोपों से हराया जा सकता था और न ही अनुशासित पैदल सेना से। विद्रोही सिपाहियों की गोलियों के साथ-साथ हैजा, दूषित पानी, थकान और ऐसी झुलसा देने वाली गर्मी भी उनका पीछा कर रही थी, जिसका वर्णन करते हुए ब्रिटिश अधिकारी तक असहाय दिखाई देते हैं।
7 जून 1857 को ब्रिटिश सेना ने दिल्ली रिज पर कब्जा कर लिया। उत्तर-पश्चिम दिशा से शहर पर नजर रखने वाली यह पथरीली ऊंची भूमि अरावली पर्वतमाला का सबसे उत्तरी सिरा भी है, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला माना जाता है। इसके बाद 14 सितंबर को दिल्ली पर अंतिम हमले तक, यानी तीन महीने से भी अधिक समय तक, ब्रिटिश सैनिक इसी खुले और असुरक्षित मोर्चे पर डटे रहे। उनका लक्ष्य था विद्रोही सिपाहियों से दिल्ली को दोबारा अपने नियंत्रण में लेना।
नीचे मैदान में विद्रोही सैनिक तैनात थे, जो भारतीय गर्मी के पूरी तरह अभ्यस्त थे। ऐतिहासिक अभिलेख यह भी बताते हैं कि 1857 का दिल्ली रिज आज की तरह घने पेड़ों से आच्छादित नहीं था।
रिज ने ब्रिटिश सेना को रणनीतिक बढ़त तो दी, लेकिन इसके अलावा लगभग कुछ भी नहीं।
पथरीली जमीन पर प्राकृतिक छाया लगभग नदारद थी। सैनिक खुले आसमान के नीचे सप्ताहों तक डटे रहे और लगातार विद्रोहियों के हमलों का सामना करते रहे। लेकिन युद्ध उनकी मुश्किलों का केवल एक हिस्सा था। भीड़भाड़ वाले शिविरों में बीमारी तेजी से फैल रही थी, पीने का पानी अक्सर दूषित होता था, स्वच्छता की स्थिति दयनीय थी और भीषण गर्मी इन सभी कठिनाइयों को कई गुना बढ़ा रही थी।
ब्रिटेन के नेशनल आर्मी म्यूजियम के आधिकारिक अभिलेख इन परिस्थितियों का बेहद सजीव चित्र प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, ब्रिटिश कमांडर मेजर जनरल सर हेनरी बार्नार्ड सहित अनेक सैनिकों की मृत्यु हैजे से हुई। संग्रहालय के अभिलेख यह भी दर्ज करते हैं कि पूरी घेराबंदी के दौरान सैनिक विद्रोहियों के निरंतर हमलों और "गर्मी के झुलसा देने वाले मौसम" के बीच फंसे रहे। यह विवरण उस समय के सैन्य पत्राचार और प्रत्यक्षदर्शियों के वृत्तांतों पर आधारित है।
दिल्ली रिज की उन परिस्थितियों का शायद सबसे सजीव वर्णन चार्ल्स जॉन ग्रिफिथ्स ने किया है। वे 61वीं रेजिमेंट ऑफ फुट के अधिकारी थे, दिल्ली की घेराबंदी में शामिल रहे और बाद में उन्होंने अपना संस्मरण "ए नैरेटिव ऑफ द सीज ऑफ दिल्ली: विद एन अकाउंट ऑफ द म्यूटिनी एट फिरोजपुर इन 1857" प्रकाशित किया।
उन्होंने लिखा"गर्मी असहनीय थी। मेरे तंबू की छाया में रखा थर्मामीटर 112 डिग्री फ़ारेनहाइट दिखा रहा था।"
यह तापमान लगभग 44.4 डिग्री सेल्सियस के बराबर है।
यह टिप्पणी इसलिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह किसी इतिहासकार का बाद का निष्कर्ष नहीं, बल्कि युद्ध में मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी सैनिक का अनुभव है। हालांकि इसकी व्याख्या सावधानी से की जानी चाहिए। ग्रिफिथ्स ने अपने तंबू की छाया में रखे निजी थर्मामीटर का तापमान दर्ज किया था। यह किसी आधिकारिक मौसम वेधशाला में मानकीकृत उपकरणों से किया गया तापमान मापन नहीं था।
फिर भी उनका संस्मरण एक बेहद सुसंगत तस्वीर सामने रखता है। गर्मी, हैजा, मक्खियों का प्रकोप और लगातार बनी रहने वाली थकान सैनिकों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके थे। शिविर का जीवन अब नियमित सैन्य अनुशासन से अधिक, शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति की कठिन परीक्षा बन गया था।
यहां तक कि सैन्य अभियान भी मौसम की शर्तों पर चलने लगे थे। जहां संभव होता, सैनिक रात के समय मार्च करते और दिन के सबसे तपते घंटों में तंबुओं की छाया में विश्राम करते। अत्यधिक गर्मी अब युद्ध की रणनीति और रसद व्यवस्था को भी प्रभावित करने लगी थी।
दिल्ली रिज पर ब्रिटिश सेना के लिए सबसे बड़ा हत्यारा हमेशा बंदूक की गोली नहीं थी।
शिविर में फैले हैजे ने सैनिकों को बुरी तरह जकड़ लिया था। 5 जुलाई 1857 को स्वयं ब्रिटिश सेना के कमांडर मेजर जनरल सर हेनरी बार्नार्ड की मृत्यु भी हैजे से हो गई।
उस समय के सैन्य अभिलेख बार-बार बताते हैं कि भीषण गर्मी में लगातार ड्यूटी, शारीरिक थकावट और बेहद खराब स्वच्छता ने सैनिकों को बीमारियों के प्रति अधिक असुरक्षित बना दिया था। आधुनिक इतिहासकार भी आम तौर पर इस बात से सहमत हैं कि दिल्ली अभियान के दौरान बीमारी से होने वाली मौतें कई बार प्रत्यक्ष युद्ध में हुई मौतों के बराबर, बल्कि कुछ अवधियों में उनसे भी अधिक थीं।
इस लिहाज से दिल्ली रिज का अनुभव इतिहास में उन शुरुआती उदाहरणों में गिना जा सकता है, जहां पर्यावरणीय परिस्थितियों ने एक सैन्य अभियान को सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में बदल दिया।
यहां एक स्वाभाविक सवाल उठता है।
क्या 1857 में दिल्ली में सचमुच असाधारण गर्मी पड़ी थी?
इतिहास इस प्रश्न का सीधा उत्तर देने के बजाय सावधानी बरतने की सलाह देता है।
उस वर्ष दिल्ली का कोई ऐसा सतत और मानकीकृत तापमान रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जिसके आधार पर यह वैज्ञानिक रूप से कहा जा सके कि 1857 दिल्ली का सबसे गर्म या असाधारण रूप से गर्म वर्ष था।
इसलिए इतिहासकार उस समय के मौसम को समझने के लिए सैनिकों की डायरियों, चिकित्सा रिपोर्टों, प्रशासनिक पत्राचार और बाद में गठित सरकारी जांच आयोगों की रिपोर्टों का सहारा लेते हैं।
यह अंतर समझना जरूरी है। प्रत्यक्षदर्शियों के संस्मरण हमें बताते हैं कि लोगों ने उस मौसम को किस तरह महसूस किया, जबकि मानकीकृत मौसम संबंधी आंकड़े वैज्ञानिकों को अलग-अलग दशकों और वर्षों के तापमान की विश्वसनीय तुलना करने का आधार देते हैं।
इस संदर्भ में महत्वपूर्ण जानकारी भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के पूर्व महानिदेशक आर. आर. केलकर द्वारा 2025 में प्रकाशित दो शोधपत्रों से मिलती है।
अपने शोधपत्र "जर्नी ऑफ इंडिया मेटियोरोलॉजिकल डिपार्टमेंट ड्यूरिंग लास्ट 150 इयर्स" में केलकर बताते हैं कि यद्यपि भारत मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना औपचारिक रूप से 1875 में हुई थी, लेकिन भारत में व्यवस्थित मौसम संबंधी अवलोकन उससे कई दशक पहले शुरू हो चुके थे।
शोधपत्र के मुताबिक, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1792 में मद्रास (अब चेन्नई) में एक खगोलीय वेधशाला स्थापित की। वहां अगले ही वर्ष मौसम संबंधी अवलोकन शुरू हुए और 1796 से लगातार रिकॉर्ड रखे जाने लगे। इसके बाद बंबई (1823), कलकत्ता (1829), शिमला (1841) और त्रावणकोर (1841) में भी ऐसी वेधशालाएं स्थापित की गईं। लेकिन इन सभी स्थानों पर होने वाले अवलोकन किसी एक समान राष्ट्रीय प्रणाली के अंतर्गत नहीं किए जाते थे।
अपने दूसरे शोधपत्र "ए नीड टू रिविजिट एयर टेम्परेचर मेजरमेंट्स इन इंडिया इन द 19थ एंड अर्ली 20थ सेंचुरीज" में केलकर बताते हैं कि भारत मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना के बाद ही तापमान मापने वाले उपकरणों और अवलोकन पद्धतियों का पूरे देश में मानकीकरण शुरू हुआ। 1870 के दशक के उत्तरार्ध में मानकीकृत थर्मामीटर शेड लगाए जाने लगे और 1920 के दशक तक उनकी जगह धीरे-धीरे स्टीवेंसन स्क्रीन ने ले ली।
यही कारण है कि चार्ल्स जॉन ग्रिफिथ्स द्वारा दर्ज किया गया 112 डिग्री फारेनहाइट का तापमान ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्य तो है, लेकिन उसे आधुनिक आधिकारिक तापमान रिकॉर्ड के समकक्ष नहीं माना जा सकता।
1857 के अनुभव ने ब्रिटिश सरकार के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया था, भारत में यूरोपीय सैनिक इतनी बड़ी संख्या में आखिर मर क्यों रहे थे?
इस प्रश्न का उत्तर 1863 में प्रकाशित रिपोर्ट "रिपोर्ट ऑफ द कमिश्नर्स अपॉइंटेड टू इन्क्वायर इंटू द सैनिटरी स्टेट ऑफ द आर्मी इन इंडिया" में तलाशने की कोशिश की गई।
आयोग ने स्पष्ट किया कि असामान्य रूप से अधिक मृत्यु दर के लिए केवल भारतीय जलवायु को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
रिपोर्ट के अनुसार इसके पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे थे। अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था, दूषित पेयजल, भीड़भाड़ वाली बैरकें, खराब स्वच्छता, लगातार थका देने वाली सैन्य ड्यूटी और संक्रामक बीमारियां।
आयोग के सदस्यों में प्रसिद्ध सैन्य चिकित्सक सर रेनाल्ड मार्टिन भी शामिल थे। उन्होंने उस समय प्रचलित इस धारणा को चुनौती दी कि यूरोपीय सैनिक लंबे समय तक भारत में रहने के बाद यहां की जलवायु के अभ्यस्त हो जाते हैं।
उनका कहना था कि उपलब्ध सांख्यिकीय प्रमाण इस धारणा का समर्थन नहीं करते। बल्कि आंकड़े इसके विपरीत संकेत देते हैं। भारत में सेवा की अवधि बढ़ने के साथ सैनिकों में बीमारी और मृत्यु का खतरा कम नहीं, बल्कि अधिक दिखाई देता है।
इस प्रकार आयोग एक ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचा जो आज भी आश्चर्यजनक रूप से प्रासंगिक लगता है। जलवायु निश्चित रूप से महत्वपूर्ण थी, लेकिन उसके दुष्प्रभावों को खराब स्वच्छता, असुरक्षित पेयजल और कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था कई गुना बढ़ा देती थी।
यदि चार्ल्स जॉन ग्रिफिथ्स के संस्मरण और 1863 के सैनिटरी आयोग की रिपोर्ट को साथ पढ़ा जाए, तो दोनों मिलकर एक बेहद स्पष्ट तस्वीर सामने रखते हैं।
एक दस्तावेज़ उन परिस्थितियों को जीने वाले व्यक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव दर्ज करता है।
दूसरा यह समझाने की कोशिश करता है कि वे परिस्थितियां इतनी घातक क्यों साबित हुईं।
आज सार्वजनिक स्वास्थ्य के शोधकर्ता शायद अत्यधिक गर्मी को 'रिस्क मल्टीप्लायर', यानी 'जोखिम को कई गुना बढ़ाने वाला कारक' कहेंगे। अकेली गर्मी भी खतरनाक होती है, लेकिन जब उसके साथ दूषित पानी, संक्रामक रोग, लगातार शारीरिक श्रम और अपर्याप्त आश्रय जैसी समस्याएं जुड़ जाएं, तो उसके परिणाम कई गुना अधिक गंभीर हो जाते हैं।
1857 का दिल्ली रिज इस सिद्धांत का एक असाधारण ऐतिहासिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
फिर भी 1857 और आज की जलवायु बहस के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है।
1857 से जुड़े ऐतिहासिक स्रोत उस समय की भीषण गर्मी का तो वर्णन करते हैं, लेकिन वे जलवायु परिवर्तन का प्रमाण नहीं हैं। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह गर्मी दीर्घकालिक जलवायु रिकॉर्ड के संदर्भ में असाधारण थी।
इसके विपरीत, आज यूरोप में पड़ रही हीटवेव का विश्लेषण 150 वर्षों से अधिक पुराने मानकीकृत मौसम संबंधी अभिलेखों, उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों और उन्नत जलवायु मॉडलों की सहायता से किया जाता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक अब न केवल बदलते तापमान के रुझानों का अध्ययन कर सकते हैं, बल्कि यह भी अधिक भरोसे के साथ बता सकते हैं कि इन चरम मौसमी घटनाओं में जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका है।
इतना ही नहीं, आज भीषण गर्मी केवल यूरोप तक सीमित नहीं रह गई है। इसका असर भारत सहित दुनिया के लगभग हर हिस्से में महसूस किया जा रहा है।
इतिहास आज के जलवायु परिवर्तन से जुड़े सभी सवालों के जवाब नहीं दे सकता।
लेकिन वह यह जरूर दिखाता है कि जब भीषण गर्मी कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से टकराती है, तब उसका प्रभाव कितना विनाशकारी हो सकता है।
शायद यही दिल्ली रिज की सबसे बड़ी और सबसे स्थायी सीख भी है।
1857 में ब्रिटिश सेना का सबसे बड़ा दुश्मन केवल उसके सामने मोर्चा संभाले विद्रोही सिपाही नहीं थे। झुलसा देने वाली गर्मी, हैजा, दूषित पानी, बदहाल स्वच्छता व्यवस्था और सैनिक शिविरों की कठिन जीवन परिस्थितियों ने मिलकर एक सैन्य अभियान को मानवीय त्रासदी में बदल दिया था।
डेढ़ शताब्दी से भी अधिक समय बाद, जब अत्यधिक गर्मी 21वीं सदी की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में शामिल हो चुकी है, दिल्ली रिज की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि मौसम हमेशा इतिहास की केवल पृष्ठभूमि नहीं होता।
कई बार वही इतिहास का सबसे प्रभावशाली पात्र बन जाता है।