अत्यधिक गर्मी से कृषि पर गहरा संकट, एक अरब लोगों की आजीविका पर खतरा: रिपोर्ट

अर्थ डे के मौके पर विश्व मौसम संगठन और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन यानी एफएओ की ओर से एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की गई
फाइल फोटो: निधि जामवाल
फाइल फोटो: निधि जामवाल
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सारांश
  • रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक गर्मी वैश्विक कृषि और खाद्य प्रणालियों के लिए गंभीर संकट बन चुकी है, जिससे एक अरब से अधिक लोगों की आजीविका, स्वास्थ्य और श्रम उत्पादकता पर खतरा मंडरा रहा है।

  • पिछले 50 वर्षों में हीटवेव की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि बढ़ी है, जिससे फसलें, पशुधन, मत्स्य संसाधन और वन तथा उन पर निर्भर समुदाय गहरे जोखिम में हैं।

  • रिपोर्ट बताती है कि 25-30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पशुओं में हीट स्ट्रेस और प्रमुख फसलों की उत्पादकता में गिरावट शुरू हो जाती है, समुद्री हीटवेव से मछलियों पर भी दबाव बढ़ रहा है।

  • दक्षिण एशिया सहित कई क्षेत्रों में साल के सैकड़ों दिन काम करना मुश्किल होगा, इसलिए जलवायु अनुकूल फसलें, बेहतर प्रबंधन, प्रारंभिक चेतावनी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग अनिवार्य बताए गए हैं।

दुनिया भर में बढ़ती अत्यधिक गर्मी (एक्सट्रीम हीट) अब एक बड़े वैश्विक संकट के रूप में सामने आ रही है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफओ) और विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, यह संकट एक अरब से अधिक लोगों की आजीविका, स्वास्थ्य और श्रम उत्पादकता को प्रभावित कर रहा है। सबसे अधिक असर कृषि श्रमिकों और कृषि-खाद्य प्रणालियों पर पड़ रहा है, जो इस चुनौती की अग्रिम पंक्ति में हैं।

रिपोर्ट “एक्सट्रीम हीट एंड एग्रीकल्चर” में बताया गया है कि पिछले 50 वर्षों में अत्यधिक गर्मी की घटनाओं की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि में तेजी से वृद्धि हुई है। आने वाले समय में इसका असर और गंभीर होने की आशंका है, जिससे कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र दोनों पर दबाव बढ़ेगा।

रिपोर्ट अर्थ डे के अवसर पर जारी की गई है, जिसमें जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र के आपसी संबंधों को रेखांकित किया गया है।

एफएओ के महानिदेशक क्यू डोंग्यू ने कहा कि अत्यधिक गर्मी एक “रिस्क मल्टीप्लायर” बन गई है, जो फसलों, पशुधन, मत्स्य संसाधनों और वनों के साथ-साथ उन पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं और समुदायों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है।

डब्ल्यूएमओ के महासचिव के अनुसार, अब अत्यधिक गर्मी यह तय कर रही है कि खेती कैसे चलेगी। यह एक ऐसा खतरा है जो पहले से मौजूद कमजोरियों को और बढ़ा देता है। उन्होंने कहा कि इससे निपटने के लिए समय पर चेतावनी और मौसम संबंधी जानकारी बहुत जरूरी है।

कृषि और पारिस्थितिकी पर असर

रिपोर्ट के अनुसार, 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर अधिकांश पशुओं में हीट स्ट्रेस शुरू हो जाता है, जबकि मुर्गियों और सूअरों में यह सीमा और कम है। इससे दूध उत्पादन में कमी और पशुओं के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है।

मछलियों पर भी इसका प्रभाव दिख रहा है, क्योंकि गर्म पानी में ऑक्सीजन की कमी से उनके जीवित रहने की क्षमता घट जाती है। 2025 में वैश्विक महासागरों के 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सों में समुद्री हीटवेव दर्ज की गई।

फसलों की बात करें तो 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर अधिकांश प्रमुख फसलों की उत्पादकता घटने लगती है, जबकि आलू और जौ जैसी फसलें इससे भी कम तापमान पर प्रभावित होती हैं।

श्रमिकों पर बढ़ता दबाव

अत्यधिक गर्मी का असर कृषि श्रमिकों पर भी गंभीर है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया सहित कई क्षेत्रों में साल के करीब 250 दिन ऐसे हो सकते हैं, जब अत्यधिक गर्मी के कारण काम करना मुश्किल हो जाएगा।

बढ़ते संयुक्त खतरे

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अत्यधिक गर्मी केवल सीधे नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जल संकट, अचानक सूखा, जंगल की आग और कीट-रोगों के प्रसार जैसे खतरों को भी बढ़ाती है।

समाधान और सिफारिशें

रिपोर्ट में जलवायु के अनुकूल फसलों का चयन, बुवाई के समय में बदलाव, बेहतर कृषि प्रबंधन, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और किसानों के लिए वित्तीय सहायता जैसे उपायों पर जोर दिया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि का भविष्य सुरक्षित रखने और वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल स्थानीय स्तर पर प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जोखिम साझा करने की नीतियाँ और उच्च उत्सर्जन वाले विकास मॉडल से दूर जाने की आवश्यकता होगी।

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