

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) ने चेतावनी दी है कि भारत में लगभग हर बच्चा एक साथ कई तरह के जलवायु जोखिम जैसे खतरों का सामना कर रहा है। यूनीसेफ की नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में 97 प्रतिशत बच्चे कम से कम दो जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं, जिनमें एक है सूखा और दूसरा है अत्यधिक गर्मी। सूखा और अत्यधिक गर्मी जैसे जलवायु जोखिम से देश भर में 15.8 करोड़ से अधिक बच्चे प्रभावित हैं।
गत 16 जून 2026 को जारी रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत में 41.16 करोड़ बच्चे कम से कम दो जलवायु संबंधी आपदा का सामना कर रहे हैं, जिनमें सूखा, नदियों और तटीय इलाकों में बाढ़, उष्णकटिबंधीय तूफान, लू (हीटवेव), अत्यधिक गर्मी, जंगल की आग और धूल भरी आंधियां शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार 23.4 करोड़ से अधिक बच्चे ( ये भारत की बाल जनसंख्या का लगभग 55 प्रतिशत है) कम से कम तीन जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सुरक्षा अधिक जोखिम में है।
यूनीसेफ का कहना है कि सूखा और अत्यधिक गर्मी से सबसे अधिक यानी 158.8 मिलियन बच्चे प्रभावित होते हैं। कम से कम 8.41 करोड़ बच्चे उष्णकटिबंधीय तूफान, सूखे और अत्यधिक गर्मी का सामना कर रहे हैं, जबकि 3.85 करोड़ बच्चे नदियों में बाढ़, सूखे और अत्यधिक गर्मी का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार सूखा भारत में बच्चों को प्रभावित करने वाला सबसे व्यापक जलवायु खतरा है। 96 प्रतिशत से अधिक बच्चे (लगभग 410.2 मिलियन) ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां सूखा पड़ने की आशंका रहती है। इससे भोजन की सुरक्षा, पोषण और रोजी-रोटी पर खतरा मंडरा सकता है।
लगभग 15.57 करोड़ बच्चे ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां ट्रॉपिकल तूफान आते हैं। साथ ही यहां भारी बारिश और तेज हवाओं से घरों को नुकसान पहुंच सकता है और स्कूल व स्वास्थ्य सेवाएं बाधित हो सकती हैं। भारत में लगभग हर पांच में से एक बच्चा (करीब 89.3 मिलियन) लू की चपेट में आता है, जबकि 66.9 मिलियन बच्चे यानी बच्चों की कुल आबादी का लगभग 16 प्रतिशत बच्चे नदियों में आने वाली बाढ़ के जोखिम वाले इलाकों में रहते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह के खतरे अक्सर एक साथ आते हैं, जिससे परिवारों और समुदायों के लिए इनसे निपटना मुश्किल हो जाता है। बाढ़, सूखा, तूफान और भीषण गर्मी एक साथ या एक के बाद एक आ सकते हैं, जिससे बच्चों पर खतरा बढ़ जाता है और हालात से उबरने के लिए कम समय मिलता है।
यूनिसेफ का कहना है कि जब कोई जलवायु संबंधी खतरा लोगों के जीवन और रोजी-रोटी को बाधित करता है तो वह आपदा बन जाता है। रिपोर्ट में वायु प्रदूषण और मलेरिया की भी जांच की गई है। ये सिर्फ जलवायु परिवर्तन की वजह से नहीं होते लेकिन जलवायु परिवर्तन से इनकी स्थिति और बिगड़ सकती है।
भारत में बच्चों के लिए वायु प्रदूषण सबसे गंभीर खतरों में से एक बना हुआ है। यूनिसेफ का अनुमान है कि लगभग 421 मिलियन बच्चे (देश के कुल बच्चों का लगभग 99 प्रतिशत) वायु प्रदूषण के खतरनाक स्तर के संपर्क में हैं। मलेरिया भी जलवायु से प्रभावित होने वाली बीमारी है। इसके फैलने में तापमान और बारिश की प्रमुख भूमिका होती है। रिपोर्ट का अनुमान है कि भारत में लगभग 294.1 मिलियन बच्चे (लगभग 10 में से सात बच्चे) मलेरिया के जोखिम वाले इलाकों में रहते हैं।
सूखा और बाढ़ फसलों को बर्बाद कर सकते हैं, भोजन की आपूर्ति में बाधा डाल सकते हैं और कुपोषण की समस्या को बढ़ा सकते हैं। भारत में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे गंभीर खाद्य की कमी में जी रहे हैं। यूनिसेफ का कहना है कि जलवायु संबंधी खतरों से पोषण से जुड़े मौजूदा जोखिम और बढ़ सकते हैं। रिपोर्ट में भारत को खाद्य की कमी के मामले में दिए गए स्कोर में 6.31, पोषण जोखिम का स्कोर में 6.41 और स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) स्कोर में 6.51 अंक दिए गए हैं। यह जलवायु संबंधी खतरों से जुड़े बड़े जोखिमों को दर्शाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार अगर जल्दी ही कदम नहीं उठाए गए तो आगामी 2050 तक दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन की वजह से 2.8 करोड़ और बच्चे वेस्टिंग (उम्र के हिसाब से कम वजन) और 4 करोड़ बच्चे स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) का शिकार हो सकते हैं। जलवायु से जुड़े खतरों का असर पानी और साफ-सफाई की सुविधाओं तक पहुंच पर भी पड़ रहा है। बाढ़ से पानी के स्रोत दूषित हो सकते हैं जबकि सूखे से वे सूख सकते हैं। इससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है और परिवारों के लिए सुरक्षित पानी मिलना मुश्किल हो जाता है। भारत में जलवायु से जुड़े खतरों की वजह से बच्चों की पढ़ाई पहले से ही प्रभावित हो रही है। 2024 में जलवायु से जुड़ी आपदाओं ने 85 देशों में कम से कम 24.2 करोड़ छात्रों की पढ़ाई में रुकावट डाली और इनमें से 5.478 करोड़ प्रभावित छात्र अकेले भारत से थे।