धरती के नीचे मिट्टी की परतों में एक ऐसी अदृश्य दुनिया बसती है, जो चुपचाप पूरी मानव सभ्यता को सहारा देती है।
मिट्टी की एक छोटी-सी मुट्ठी में अरबों बैक्टीरिया, हजारों सूक्ष्म जीव, फफूंद, केंचुए और अनगिनत प्रजातियां रहती हैं, जो खेतों को उपजाऊ बनाती हैं, भोजन उगाने में मदद करती हैं और जलवायु संतुलन बनाए रखने के लिए कार्बन को मिट्टी में रोककर रखती हैं। लेकिन अब यही दुनिया तेजी से संकट में घिरती जा रही है।
कंजर्वेशन इंटरनेशनल और आईयूसीएन की नई रिपोर्ट के अनुसार, मिट्टी पर निर्भर 8,653 प्रजातियों में से 20.3 फीसदी यानी 1,758 प्रजातियां पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। 1,722 प्रजातियों के बारे में वैज्ञानिकों के पास इतना डेटा तक नहीं है कि उनके भविष्य का आकलन किया जा सके।
स्टडी रिपोर्ट बताती है कि मिट्टी पृथ्वी पर मौजूद करीब 59 फीसदी जीवन का घर है और दुनिया का 95 फीसदी भोजन किसी न किसी रूप में इसी पर निर्भर है।
वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि रसायनों के बढ़ते इस्तेमाल, बदलती खेती और भूमि क्षरण ने मिट्टी की जैव विविधता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है। यदि यह खामोश विनाश नहीं रुका, तो केवल सूक्ष्म जीव ही नहीं मरेंगे, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जलवायु संतुलन और मानव सभ्यता की जड़ें भी खतरे में पड़ जाएंगी।
हमारी पैरों तले धरती के नीचे भी एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसे हम देख नहीं पाते, लेकिन यही दुनिया हमारी जिंदगी को थामे हुए है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि मिट्टी की एक छोटी-सी मुट्ठी में अरबों बैक्टीरिया, हजारों सूक्ष्म जीव, फफूंद, केंचुए और अनगिनत जीव रहते हैं। यही अदृश्य संसार खेतों को उपजाऊ बनाता है, भोजन उगाने में मदद करता है, जलवायु को संतुलित रखने के लिए कार्बन को मिट्टी में रोककर रखता है और पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाता है।
लेकिन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह खामोश दुनिया अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है।
अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही 20 फीसदी प्रजातियां
पर्यावरण संरक्षण पर काम कर रहे संगठन कंजर्वेशन इंटरनेशनल और इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएएन) ने अपने नए अध्ययन में खुलासा किया है कि मिट्टी पर निर्भर हर पांचवीं प्रजाति पर विलुप्ति होने का खतरा मंडरा रहा है।
वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि असली संकट इससे कहीं बड़ा हो सकता है, क्योंकि हजारों प्रजातियों ऐसी हैं जिनके बारे में अब तक पर्याप्त जानकारी ही मौजूद नहीं है। इस अध्ययन के नतीजे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ कंजर्वेशन 'ओरिक्स' में प्रकाशित हुए हैं।invertebrates
मिट्टी पर निर्भर जीवों की स्थिति को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने सबसे पहले यह तय किया कि किन प्रजातियों को “मिट्टी पर निर्भर” माना जाए। इसके बाद उन्होंने पाया कि आईयूसीएएन की रेड लिस्ट में शामिल 8,653 प्रजातियां इस परिभाषा के दायरे में आती हैं, जिन्हें मिट्टी पर निर्भर जीव कहा जाता है।
इनमें अध्ययन के दौरान पहली बार आंकी गई 503 नई प्रजातियां भी शामिल हैं।
हजारों प्रजातियां से अनजान है विज्ञान
ये वे जीव हैं, जो अपने जीवन चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा मिट्टी के भीतर बिताते हैं या मिट्टी और सूखी पत्तियों की ऊपरी परत में रहते हैं। इनमें जमीन पर रहने वाले 5,010 कशेरुकी जीव, आर्थ्रोपोड और मोलस्क जैसे 3,133 अकशेरुकी जीव शामिल हैं। साथ ही फफूंद (फंगी) की 510 प्रजातियों को भी शामिल किया गया है। हालांकि, इस अध्ययन में पौधों को शामिल नहीं किया गया।
शोधकर्ताओं के मुताबिक पौधों को इसलिए शामिल नहीं किया गया, क्योंकि करीब-करीब सभी पौधे मिट्टी पर निर्भर हैं। ऐसे में अगर पौधों को भी शामिल किया जाता, तो यह अध्ययन पूरी तरह पौधों के विलुप्त होने के खतरे पर केंद्रित हो जाता।
अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि इनमें से 20.3 फीसदी यानी 1,758 प्रजातियां दुनिया भर में खतरे में हैं। वहीं करीब 19.9 फीसदी यानी 1,722 प्रजातियां ऐसी हैं जिनके बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। इनपर इतना कम शोध हुआ है कि वैज्ञानिक उनके खतरे का आकलन भी नहीं कर पा रहे हैं।
रसायनों और बदलती खेती ने बिगाड़ी मिट्टी की सेहत
इसके अलावा 5,138 प्रजातियां फिलहाल खतरे में नहीं हैं। हालांकि, आईयूसीएन के अनुसार मिट्टी पर निर्भर 35 प्रजातियां अब पूरी तरह दुनिया से विलुप्त हो चुकी हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार, खेती में रासायनिक पदार्थों का बढ़ता इस्तेमाल, भूमि उपयोग में हो रहा बदलाव और मिट्टी की बिगड़ती रासायनिक संरचना इस संकट की बड़ी वजह हैं।
अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक नील कॉक्स का कहना है, “मिट्टी मानव जीवन की लगभग हर जरूरी जरूरत को सहारा देती है, लेकिन इसे स्वस्थ रखने वाली हजारों प्रजातियों के बारे में हमें बहुत कम जानकारी है।" उनके मुताबिक हम पृथ्वी के सबसे अहम पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक को बिना ठीक से समझे और देखे ही नजरअंदाज करते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, मिट्टी पृथ्वी पर मौजूद करीब 59 फीसदी जीवों का घर है। यही जीव मिट्टी को उपजाऊ बनाए रखते हैं, पोषक तत्वों का चक्र चलाते हैं, कार्बन को संग्रहित करते हैं और जलवायु संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
95 फीसदी आहार का आधार है मिट्टी
आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया का 95 फीसदी भोजन किसी न किसी रूप में मिट्टी पर निर्भर है। स्वस्थ मिट्टी अपने भीतर बड़ी मात्रा में कार्बन जमा कर वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने में अहम भूमिका निभा सकती है। अनुमान है कि यह इसके लिए जरूरी कार्बन का करीब 27 फीसदी तक अपने अंदर समेट सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, मिट्टी में रहने वाली प्रजातियां पृथ्वी पर जीवन के कई जरूरी कामों को संभालती हैं। उदाहरण के लिए, फफूंद (फंगी) पौधों को पोषक तत्व ग्रहण करने में मदद करती है और जैविक पदार्थों के विघटन की प्रक्रिया को संभव बनाती है, जिससे पूरा पारिस्थितिकी तंत्र चलता रहता है।
इसी तरह अकशेरुकी जीव मिट्टी को स्वस्थ बनाए रखने में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। ये पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखते हैं और मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाते हैं।
फिर भी, जिन जीवों को आंखों से आसानी से देखा जा सकता है, उन्हीं पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। खरगोश या जमीन में बिल बनाने वाले दूसरे जीवों पर तो शोध होता है, लेकिन मिट्टी के भीतर काम करने वाले सूक्ष्म जीव आज भी विज्ञान की नजरों से लगभग ओझल हैं।
ऐसे में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो मिट्टी की जैव विविधता का पतन दुनिया की खाद्य प्रणाली को कमजोर कर सकता है और जलवायु संकट को कहीं ज्यादा भयावह बना सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट का समाधान खेती के तौर-तरीकों में बदलाव से निकल सकता है।
उदाहरण के लिए कृषि वानिकी (एग्रोफॉरेस्ट्री) जैसे तरीके, जिनमें फसलों के साथ पेड़ और मिट्टी को पोषण देने वाले पौधे उगाए जाते हैं, मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, कटाव रोकने और जैव विविधता बचाने में मदद कर सकते हैं।
शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि मिट्टी में रहने वाली प्रजातियों को भी उसी गंभीरता से संरक्षण सूची में शामिल किया जाना चाहिए, जिस तरह बाघ, हाथी या प्रवाल भित्तियों को किया जाता है। क्योंकि अगर मिट्टी की यह अनदेखी दुनिया खत्म हो गई, तो केवल कुछ सूक्ष्म जीव नहीं मरेंगे, बल्कि मानव सभ्यता की जड़ें भी कमजोर पड़ जाएंगी।