वन्य जीव एवं जैव विविधता

कबूतर से लेकर बंदर तक...क्यों इतने बोल्ड, बेखौफ और आक्रामक हो रहे हैं शहरों में रहने वाले जीव?

दुनिया भर के 133 जीवों पर हुई रिसर्च में सामने आया हैरान करने वाला सच

Lalit Maurya

  • दिल्ली के बंदरों द्वारा लोगों के हाथ से खाना छीनना हो या न्यूयॉर्क की बेखौफ गिलहरियां या सिडनी के सैंडविच ले उड़ने वाले ‘बिन चिकन’ पक्षी, यह महज संयोग नहीं है। एक नए वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि शहरीकरण दुनिया भर के वन्यजीवों के स्वभाव को बदल रहा है।

  • 28 देशों की 133 प्रजातियों पर आधारित 80 अध्ययनों के विश्लेषण में वैज्ञानिकों ने पाया है कि शहरों में रहने वाले जीव अपने ग्रामीण साथियों की तुलना में अधिक निडर, आक्रामक, सक्रिय और जोखिम उठाने वाले बन रहे हैं।

  • अध्ययन के अनुसार, शहरों के जीव अब इंसानों से कम डरते हैं, अपने क्षेत्र की रक्षा को लेकर अधिक आक्रामक हैं और नई परिस्थितियों व वस्तुओं को लेकर ज्यादा जिज्ञासु हो गए हैं।

  • यह बदलाव केवल कबूतरों, कौवों और चूहों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण इलाकों से शहरों में आने वाली कई प्रजातियों में भी दिखाई दे रहा है।

  • हालांकि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह बढ़ती बेखौफी इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव, काटने की घटनाओं, सड़क दुर्घटनाओं और जानवरों से फैलने वाली बीमारियों के खतरे को बढ़ा सकती है।

  • अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि भविष्य के शहरों की योजना बनाते समय वन्यजीवों के व्यवहार और उनके लिए सुरक्षित गलियारों को भी प्राथमिकता देनी होगी।

अगर आप दिल्ली के कनॉट प्लेस या किसी पार्क में बैठे हैं, तो मुमकिन है कि कोई बंदर अचानक आपके हाथ से समोसा या पानी की बोतल छीन ले। न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क में गिलहरियां आपके इतने पास आ जाती हैं जैसे पुरानी जान-पहचान हो, और सिडनी में तो 'इबिस' नाम के पक्षी को लोगों ने प्यार से 'बिन चिकन' नाम दे दिया है, क्योंकि वे बेधड़क लोगों के टिफिन से सैंडविच उड़ा ले जाते हैं।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि गांवो और जंगलों में इंसानों को देखते ही दुम दबाकर भागने वाले ये वन्यजीव, शहरों में आकर इतने निडर, बेबाक और कभी-कभी आक्रामक कैसे हो गए?

हाल ही में आई एक नई ग्लोबल रिसर्च ने इस बात पर मुहर लगा दी है कि शहरों की आपाधापी सिर्फ इंसानों का मिजाज ही नहीं बदल रही, बल्कि यहां रहने वाले जानवरों के व्यवहार को भी पूरी तरह बदल रही है। वे अब और साहसी, बेखौफ और 'जोखिम उठाने वाले' बन चुके हैं।

'शहर का चूहा बनाम गांव का चूहा', सिर्फ कहानी नहीं, वैज्ञानिक सच

जर्नल ऑफ एनिमल इकोलॉजी में छपी इस अनोखी रिसर्च के लिए दुनिया के 28 देशों के 133 शाकाहारी, मांसाहारी और कीड़े-मकोड़ों की प्रजातियों पर की गई 80 अलग-अलग स्टडीज का बारीकी से विश्लेषण किया गया।

स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक आप दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, शहरीकरण जानवरों के बर्ताव को एक ही ढर्रे पर बदल रहा है। इसका सबसे बड़ा नतीजा यह है कि शहर के जानवर अब डरना भूल चुके हैं। वे पहले से बहुत ज्यादा 'बोल्ड' हो गए हैं।

जंगल का डर गायब, शहरों का 'स्वैग' चालू

इसे एक साधारण उदाहरण से समझ सकते हैं, अगर आप जंगल में किसी पक्षी के पास जाएंगे, तो वह 10 मीटर दूर से ही उड़ जाएगा। लेकिन शहरों में रहने वाले कबूतर या कौवे के पास आप एक कदम की दूरी तक भी पहुंच जाएं, तो भी वह आराम से दाना चुगता रहता है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि शहरों में रहने वाले पक्षी इंसानों को अपने बेहद करीब आने देते हैं। जहां जंगल में कोई पक्षी इंसान को कई मीटर दूर देखकर उड़ सकता है, वहीं शहरों में वही पक्षी एक-दो मीटर की दूरी तक भी शांत बना रहता है।

यह बदलाव केवल कबूतरों, चूहों या कौवों जैसे परिचित शहरी जीवों तक सीमित नहीं है। वे प्रजातियां भी, जिन्हें पहले ग्रामीण इलाकों से जोड़ा जाता था, अब शहरों में बसने लगी हैं और उनका व्यवहार भी तेजी से बदल रहा है।

अब तक हम मानते थे कि सिर्फ चूहे, बिल्ली, गिलहरी, कौवे और कबूतर ही शहरों में दादागिरी दिखाते हैं। लेकिन इस रिसर्च में एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। गांवों के खेतों और झाड़ियों में रहने वाले बेहद शर्मीले और शांत पक्षी भी जब शहरों का रुख कर रहे हैं, तो उनकी अगली पीढ़ी पुरानी सादगी भूलकर पूरी तरह 'शहरी' और बिंदास हो रही है।

क्यों बदल रहा है शहरों में रहने वाले जीवों का व्यवहार

वैज्ञानिकों ने पाया कि शहरों में रहने वाले जीवों का व्यवहार धीरे-धीरे बदल रहा है। वे अब इंसानों से कम डरते हैं और कई बार हमारे बेहद करीब तक आ जाते हैं। अपने इलाके को लेकर भी वे अधिक आक्रामक हो रहे हैं और ग्रामीण इलाकों के जीवों की तुलना में अपने इलाकों को बचाने के लिए ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं।

इसके साथ ही उनका खोजी स्वभाव भी बढ़ रहा है। वे कचरे के डिब्बे, गाड़ियों और इंसानी सामान जैसी नई चीजों को भी बिना झिझक टटोलते और परखते हैं, मानो शहर उनके लिए एक लगातार बदलती हुई प्रयोगशाला हो।

यूरोप में पक्षियों पर सालों चली एक रिसर्च में देखा गया कि जब इंसानों ने शहर की एक चिड़िया (ग्रेट टिट) को हाथ में पकड़ा, तो उसने डरने के बजाय इंसान के हाथ पर जोर से चोंच मारी और गुस्से में चिल्लाई। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये जानवर अब डरते नहीं, बल्कि शहरों के हिसाब से खुद को ढाल चुके हैं।

बढ़ती नजदीकियां बन सकती हैं नई मुसीबत

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यह सब सुनने में भले ही दिलचस्प लगे, लेकिन इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

उनका अंदेशा है कि जानवरों का यह बढ़ता साहस भविष्य में नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। जब जानवर इंसानों से कम डरेंगे, तो दोनों के बीच संपर्क बढ़ेगा। इससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष, काटने की घटनाएं बढ़ जाएंगी। यह दोनों के लिए ही खतरनाक है।

इसी तरह जंगली जीवों से बेहद नजदीकी जूनोटिक बीमारियों के फैलने की भी वजह बन सकती है। इससे जानवरों से इंसानों में फैलने वाले वायरस और बैक्टीरिया का खतरा काफी बढ़ जाएगा। इसी तरह बेखौफ जानवर गाड़ियों के सामने आने से भी नहीं कतराते, नतीजन रोजाना दुनिया भर में हजारों बेजुबान अपनी जान गंवा रहे हैं।

अध्ययन में शामिल 70 फीसदी से अधिक आंकड़े पक्षियों से जुड़े थे। जबकि कीटों, उभयचरों और सरीसृपों पर बहुत कम शोध उपलब्ध हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि शहरों में रहने वाली अनेक प्रजातियों के व्यवहार पर अभी भी पर्याप्त जानकारी नहीं है।

शहरों को 'कंक्रीट का जंगल' नहीं, 'साझा घर' बनाना होगा

ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि तेजी से फैलते कंक्रीट के दौर में टाउन प्लानर्स और इंजीनियरों को शहरों की योजना बनाते समय वन्यजीवों के व्यवहार को भी ध्यान में रखना होगा।

शहरों के बीच में ऐसे 'ग्रीन कॉरिडोर्स' (हरे-भरे रास्ते और पार्क) बनाने होंगे, जो शहर के जानवरों को वापस जंगलों और ग्रामीण इलाकों से जोड़ सकें। इससे शहरों और गांवों के जानवरों के बीच संपर्क बना रहेगा, उनका डीएनए आपस में मिलता रहेगा और वे पूरी तरह से अपनी प्राकृतिक पहचान नहीं खोएंगे।

यह रिसर्च याद दिलाती है कि हम जिन शहरों को सिर्फ 'इंसानों का' समझते हैं, वहां की कंक्रीट, लाइटें और शोर बाजार बेजुबान जीवों के दिमाग को री-वायर कर रहे हैं। यह सच है शहर केवल इंसानों को नहीं बदल रहे, वे अपने साथ रहने वाले जीव-जंतुओं की प्रकृति भी बदल रहे हैं। प्रकृति अपना रास्ता ढूंढ रही है, लेकिन क्या हम इस बदलाव को संभालने के लिए तैयार हैं? सवाल यह है कि क्या हम ऐसे शहर बना पाएंगे, जहां इंसान और वन्यजीव दोनों सुरक्षित और संतुलित तरीके से साथ रह सकें?