धरती से तेजी से गायब होती मधुमक्खियां, तितलियां और दूसरे परागणकर्ता अब केवल जैव विविधता के लिए नहीं, बल्कि इंसानी स्वास्थ्य, पोषण और किसानों की आजीविका के लिए भी बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।
एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि यदि परागण करने वाले कीटों की संख्या इसी तरह घटती रही, तो आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों की थाली से पौष्टिक भोजन गायब हो सकता है।
जर्नल नेचर में प्रकाशित इस अध्ययन में नेपाल के जुमला क्षेत्र के 10 गांवों में 776 लोगों के खानपान और खेती का विश्लेषण किया गया। शोध में सामने आया कि विटामिन ए, फोलेट और कई जरूरी पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा उन फसलों से आता है, जो परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक किसानों की आय का 44 फीसदी हिस्सा और पौष्टिक भोजन का बड़ा भाग इन्हीं कीटों की वजह से संभव हो पाता है।
अध्ययन ने यह भी चेताया है कि जलवायु परिवर्तन, कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग और जंगली फूलों की कमी के चलते परागणकर्ता तेजी से घट रहे हैं। यदि यह संकट बढ़ा, तो कुपोषण, बीमारियां और खाद्य असुरक्षा गंभीर रूप ले सकती है।
धरती से तितलियां, मधुमक्खियां और दूसरे परागण करने वाले कीट धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। इसका असर केवल खेतों, फसलों और जैव विविधता तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह सीधे इंसानी स्वास्थ्य और किसानों की आजीविका के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।
ऐसे में वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि परागणकर्ताओं की संख्या इसी तरह घटती रही, तो आने वाले वर्षों में करोड़ों थालियों से पौष्टिक भोजन गायब हो सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए अध्ययन में पहली बार विस्तार से दिखाया गया है किस तरह परागण करने वाले कीट सीधे इंसानी भोजन, पोषण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं।
खेतों से थाली तक, हर कड़ी पर संकट
वैज्ञानिकों के मुताबिक फल, सब्जियां, दालें और कई पौष्टिक फसलें इन्हीं परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि ये कीट कम होते हैं, तो फसलों की पैदावार घट जाती है, किसानों की कमाई कम होती है और लोगों के भोजन में जरूरी पोषक तत्वों की कमी बढ़ जाती है।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर में प्रकाशित हुए हैं।
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने नेपाल में जुमला के दस गांवो में एक साल तक 776 महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के खानपान और खेती का अध्ययन किया। उन्होंने पोषक तत्वों की उपलब्धता का विश्लेषण करने के साथ-साथ यह भी जांचा कि कौन-कौन से कीट फसलों का परागण कर रहे हैं।
अध्ययन में सामने आया है कि परागण करने वाले कीट किसानों की आय और पोषण दोनों के लिए बेहद जरूरी हैं। लोगों को मिलने वाले विटामिन ए, फोलेट, विटामिन सी, कैल्शियम और विटामिन बी12 जैसे कई जरूरी पोषक तत्वों का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा स्थानीय तौर पर उगाई गई फसलों और पशु उत्पादों से आता है। यानी स्थानीय जैव विविधता सीधे लोगों की सेहत से जुड़ी है। इसमें परागण करने वाले जीवों की बड़ी भूमिका है।
फसल, पोषण और कमाई-सब कुछ दांव पर
वैज्ञानिकों के मुताबिक, किसानों की कुल कृषि आय का 44 फीसदी हिस्सा परागणकर्ताओं की वजह से मिलने वाली फसलों से आता है। वहीं, लोगों के भोजन में मिलने वाले विटामिन-ए, फोलेट और विटामिन-ई का 20 फीसदी से ज्यादा हिस्सा भी इन्हीं कीटों की मदद से पैदा होने वाली फसलों से मिलता है।
हालांकि चावल और गेहूं जैसे अनाज भोजन का बड़ा हिस्सा थे, लेकिन फल, सब्जियां और दालें जैसी परागण-निर्भर फसलें पोषण और आय दोनों के लिए बेहद अहम साबित हुईं। ये फसलें लोगों को मिलने वाले विटामिन ए, फोलेट और विटामिन ई का 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा देती हैं, जबकि किसानों की कुल आय में इनकी हिस्सेदारी 90 फीसदी तक है।
अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता थॉमस टिम्बरलेक का कहना है, “जैव विविधता कोई विलासिता नहीं, बल्कि हमारे स्वास्थ्य, पोषण और आजीविका की बुनियाद है। परागणकर्ता केवल प्रकृति के लिए नहीं, बल्कि इंसानी जीवन के लिए भी बेहद जरूरी हैं।“
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि मधुमक्खियों और दूसरे परागणकर्ताओं की संख्या घटती रही, तो फल, सब्जियां और दालों का उत्पादन प्रभावित होगा। इससे लोगों के भोजन में जरूरी पोषक तत्व कम होंगे और कुपोषण, संक्रमण तथा बीमारियों का खतरा बढ़ जाएगा।
जुमला ने दिखाई दुनिया को आने वाले संकट की तस्वीर
जुमला के स्थानीय मधुमक्खी पालकों का कहना है कि हाल के वर्षों में शहद उत्पादन तेजी से घटा है और कई छत्ते पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। इसके पीछे बदलता मौसम, बेहद ज्यादा चराई से जंगली फूलों की कमी और कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग बड़ी वजहें हैं।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे, तो 2030 तक किसानों की आय करीब 15 फीसदी तक घट सकती है। साथ ही लोगों के भोजन में विटामिन ए और फोलेट की मात्रा करीब 10 फीसदी कम हो सकती है।
अनुमान है कि यदि स्थानीय परागणकर्ता पूरी तरह गायब हो जाएं, तो परिवार अपनी खेती से होने वाली करीब आधी आय खो सकते हैं और जरूरी पोषक तत्वों की उपलब्धता में 20 फीसदी से ज्यादा गिरावट आ सकती है।
वैज्ञानिकों पाया कि यहां आधे से ज्यादा (51 फीसदी) बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से ठिगने थे, जबकि 24 फीसदी कम वजन से जूझ रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह पोषण की कमी है। ऐसे में यदि परागणकर्ता घटे, तो बच्चों के भोजन में विटामिन-ए, प्रोटीन और फोलेट की कमी और गंभीर हो सकती है, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होगा।
गौरतलब है कि विटामिन ए की कमी आंखों की रोशनी और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकती है, जबकि फोलेट की कमी गर्भावस्था में गंभीर जटिलताओं और नवजात शिशुओं में जन्म संबंधी विकार के खतरे को बढ़ाती है।
200 करोड़ लोगों पर मंडराता संकट
यह संकट केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। दुनिया के 84 फीसदी खेत छोटे किसानों के हैं और करीब 200 करोड़ लोगों का पेट इन्हीं खेतों से भरता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट का सबसे ज्यादा असर भी इन्हीं किसानों पर पड़ रहा है। इन खेतों पर निर्भर परिवार पहले ही गरीबी, कुपोषण और कमजोर खाद्य व्यवस्था से जूझ रहे हैं, ऐसे में परागणकर्ताओं का घटता संकट उनकी मुश्किलों को और गहरा सकता है।
एक अन्य अध्ययन से पता चला है कि वैश्विक स्तर पर जिस तरह से परागण करने वाले जीवों में कमी आ रही है, उसके चलते करीब 90 फीसदी जंगली पौधों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
गौरतलब है कि परागण करने वाली यह मधुमखियां और दूसरे कीट वैश्विक स्तर पर करीब 35 फीसदी खाद्य उत्पादन में योगदान देते हैं। रिसर्च की मानें तो परागण का फायदा सिर्फ फलों की पैदावार तक ही सीमित नहीं है, यह उनकी गुणवत्ता के लिए भी बेहद मायने रखता है।
रिसर्च दर्शाती है कि परागण की कमी के चलते वैश्विक स्तर पर जहां फल उत्पादन में पांच फीसदी की गिरावट आ रही है, वहीं इसकी वजह से सब्जियों में 3.2 फीसदी और नट्स के कुल उत्पादन में 4.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। आशंका है कि यह गिरावट हर साल और 427,000 लोगों की जान ले रही है।
अध्ययन से यह भी पता चला कि छोटे और आसान कदम हालात बदल सकते हैं। खेतों के आसपास जंगली फूल लगाना, कीटनाशकों का कम से कम इस्तेमाल करना और स्थानीय मधुमक्खियों को संरक्षण देना परागणकर्ताओं की संख्या बढ़ाने में मददगार हो सकता है। इससे फसल उत्पादन, किसानों की आय और लोगों का पोषण बेहतर हो सकता है।
जुमला के किसान भी इसी तरह के उपाय अपना रहे हैं। इसके सकारात्मक परिणाम भी दिखने लगे हैं। जहां परागणकर्ताओं की संख्या बढ़ी, वहां पौष्टिक भोजन और किसानों की आमदनी दोनों में सुधार देखा गया है।
स्पष्ट है कि जैव विविधता को हो रहा नुकसान अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सीधे मानव स्वास्थ्य, पोषण और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा संकट बन चुका है। ऐसे में यदि दुनिया ने समय रहते परागणकर्ताओं को बचाने के कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में इसका असर लोगों की थाली से लेकर उनकी जिंदगी तक दिखाई देगा।