बदलती जलवायु और हिमालय की मधुमक्खियां:  परागण तंत्र पर गहराता संकट

बदलती जलवायु और हिमालय की मधुमक्खियां: परागण तंत्र पर गहराता संकट

हिमालयी वादियों में तापमान वृद्धि, बदला वर्षा चक्र और फूलों के खिलने के समय में बदलाव से मधुमक्खियों का जीवन चक्र और परागण क्षमता गहराई से प्रभावित, फसल उत्पादन और वनस्पति प्रजनन पर गंभीर खतरा मंडराने लगा
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हिमालय की वादियों में वसंत का आगमन केवल रंग-बिरंगे फूलों का प्रस्फुटन नहीं होता, बल्कि यह एक जीवंत ध्वनि, मधुमक्खियों की गूंज के साथ प्रकृति के पुनर्जीवन का संकेत भी देता है। यह गूंज उस सूक्ष्म लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण प्रक्रिया का प्रतीक है, जिसे हम परागण कहते हैं। मधुमक्खियाँ इस प्रक्रिया की प्रमुख वाहक हैं और इनके बिना न तो पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन संभव है, न ही कृषि उत्पादन की स्थिरता। किंतु वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन ने इस संतुलन को गंभीर चुनौती दी है।

पारिस्थितिकी और खाद्य सुरक्षा में केंद्रीय भूमिका- मधुमक्खियाँ केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं हैं वे वैश्विक खाद्य प्रणाली की आधारशिला हैं। विश्व की लगभग 75 प्रतिशत प्रमुख फसलें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परागण पर निर्भर करती हैं। हिमालयी क्षेत्र में सेब, नाशपाती, बादाम, कीवी, राजमा और बकव्हीट जैसी फसलें मधुमक्खियों की सक्रियता पर निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त, जंगली पौधों के प्रजनन में भी इनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो संपूर्ण जैव विविधता को बनाए रखने में सहायक है।

हिमालय में बदलता जलवायु परिदृश्य- पिछले कुछ दशकों में हिमालयी क्षेत्र में तापमान में निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। ग्लेशियरों का तीव्र ह्रास, वर्षा चक्र में अनिश्चितता और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति इस परिवर्तन के प्रमुख संकेत हैं। एक महत्वपूर्ण अनदेखा पहलू है फूलों के खिलने के समय में बदलाव। कई पौधों में पुष्पन काल पहले या बाद में हो रहा है, जिससे परागण करने वाले जीवों के साथ उनका समय-संतुलन त्रीवता से प्रभावित हो रहा है।

मधुमक्खियों पर बहुआयामी प्रभाव

आवासीय विस्थापन- ठंडे वातावरण के अनुकूल भौंरे अब ऊंचाई वाले क्षेत्रों की ओर प्रवास कर रही हैं। इससे निचले इलाकों में उनकी उपस्थिति घट रही है, जबकि ऊँचाई पर नए पर्यवास में उनका अनुकूलन चुनौतीपूर्ण बन रहा है।

फेनोलॉजिकल असंतुलन- फूलों के खिलने और मधुमक्खियों की सक्रियता के बीच प्राकृतिक समन्वय में भी व्यवधान उत्पन्न हो रहा है। इस असंतुलन को “फेनोलॉजिकल मिसमैच” कहा जाता है, जो परागण की दक्षता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

प्रजातीय विविधता में गिरावट- स्थानीय मधुमक्खी प्रजातियाँ, विशेषकर एपिस सेरेना इंडिका की संख्या में गिरावट देखी जा रही है। साथ ही, कई एकाकी (सोलीटरी) मधुमक्खी प्रजातियाँ भी धीरे-धीरे विलुप्ति की और हैं, जिससे परागण तंत्र की स्थिरता प्रभावित हो रही है।

रोग एवं परजीवियों का प्रसार- तापमान और आर्द्रता में परिवर्तन के कारण वेरोरा माईट और नोसेमा जैसे परजीवियों का प्रसार तुलनात्मक रूप से बढ़ा है। यह मधुमक्खियों की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर उनकी जीवित रहने की संभावना को कम कर देता है।

व्यवहारिक परिवर्तन- कुछ प्रजातियाँ अपने पारंपरिक सक्रिय समय और प्रवास पैटर्न में परिवर्तन कर रही हैं। यह बदलाव पारिस्थितिकी तंत्र में दीर्घकालिक असंतुलन को जन्म दे सकता है।

परागण सेवाओं में कमी का प्रभाव कृषि और जैव विविधता पर  बहुआयामी है इससे फसल उत्पादन में गिरावट और सेब, बादाम जैसी अन्य बागवानी फसलों का उत्पादन 20-30 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकता है। हिमालय की वनस्पतियों की प्रजनन क्षमता में कमीरू जंगली पौधों के बीज उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। पौधों और परागणकर्ताओं के सह-अस्तित्व में व्यवधान बदलती जलवायु परिवर्तन के जोखिम को बढ़ाता है।

स्थानीय समुदाय और आजीविका पर असर- हिमालयी क्षेत्रों में मधुमक्खी पालन पारंपरिक रूप से आजीविका का एक महत्वपूर्ण आधार है। आंशिक रूप से 10 प्रतिशत लोग इससे रोजगार प्राप्त कर रहे है। हाल के वर्षों में शहद उत्पादन में गिरावट और बागवानी फसलों की उत्पादकता में कमी ने किसानों की आय को प्रभावित किया है। यह स्थिति न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था, बल्कि क्षेत्रीय खाद्य सुरक्षा के लिए भी चिंता का विषय है।

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आभार

लेखिका नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज एवं अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करती हैं, जिनके वित्तीय सहयोग एवं समर्थन के बिना यह अध्ययन संभव नहीं हो पाता। साथ ही, संस्थागत सहयोग एवं आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने के लिए ज्योलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया का भी विशेष धन्यवाद।

समाधान व संरक्षण और अनुकूलन की दिशा में कदम

इस संकट से निपटने के लिए समन्वित प्रयास आवश्यक हैं

·         स्थानीय मधुमक्खी प्रजातियों का संरक्षण और संवर्धन

·         वर्षभर पुष्प उपलब्ध कराने वाले पौधों का रोपण

·         टिकाऊ और जलवायु-संवेदनशील कृषि पद्धतियों को बढ़ावा

·         मधुमक्खियों के लिए कृत्रिम आवास का निर्माण

·         किसानों और स्थानीय समुदायों के लिए प्रशिक्षण एवं जागरूकता कार्यक्रम

·         मधुमक्खी संरक्षण को नीतिगत प्राथमिकता प्रदान करना

निष्कर्ष स्वरूप कह सकते है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में मधुमक्खियाँ एक मौन लेकिन अनिवार्य भूमिका निभाती हैं। जलवायु परिवर्तन ने इस भूमिका को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिसके दूरगामी परिणाम पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि और मानव जीवन पर पड़ रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि वैज्ञानिक अनुसंधान, नीतिगत हस्तक्षेप और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से एक समग्र रणनीति विकसित की जाए, ताकि इस अनमोल परागण तंत्र को संरक्षित किया जा सके।

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